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कविता

साँकल
मुकेश कुमार


अब बजती नहीं साँकल

बजाने के ढंग से पता चल जाता था कौन है
हड़बड़ाहट में बजाई गई है साँकल
या फिर जोर से बजाने वाला कौन हो सकता है
घर का कोई आदमी, कोई अनजान
या डाकिया

साँकल बजाने वाला भी पढ़ सकता था
दरवाजे के उस पार से आने वाली पदचाप
अनुमान लगा सकता था कौन आ रहा है द्वार खोलने

रात में बजने का एक अर्थ होता था
और तड़के बजने का कोई और
साँकल बताती थी किसी अतिथि के आगमन की सूचना
या कोई अमंगल संदेश

साँकल अपने आप में पूरा संवाद थी
वह टकराती थी दरवाजे से मगर बजती थी मन के अंदर
संदेशवाहक थी बजाने और सुननेवाले के बीच

हर बार एक ही तरह से बजने वाली कॉल बेल
महज एक सूचना है किसी के आने की

 


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