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कविता

माया-पुराण
मुकेश कुमार


जीवन के इस भेद को जानैं सुमति सुजान
माया काहू ना ठगै, ठगते मायावान

मैं माया काहे तजूँ, जीवन का ये सार
जो कहैं मिथ्या इसे लूट खाएँ संसार

माया मेरी इष्ट है नित करूँ उसे प्रणाम
राम तो मिथ्या भये बसे कौन से धाम

माया कबहूँ न तजैं जीवै को आधार
बिन माया न सधै घर बाहर संसार

माया को सब कोसते, जपैं राम का नाम
राम तैं माया भली, संकट में आवै काम

माया एकौ सत्य है राम हैं मायाजाल
भक्तों को मिलते नहीं मारैं मौज दलाल

माया माया में रहै माया हो ना उदास
जो माया से दूर भगैं वे माया के दास

माया बल सम बल नहीं माया सबकी आस
भजते माया को सभी क्या स्वामी क्या दास

साधौ माया राखिए ज्यौं सुकंठ में हार
माया जो रूठि गई रूठैं मित्र परिवार

माया रचती राम को, रामौ दूजो नाम
जो तू माया साध ले सध जाएँगे राम

 


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