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कविता

इनकलाब के नाम एक खत...
प्रदीप त्रिपाठी


फिर से सुनना चाहता हूँ, मैं
तुम्हारे उन बुलंद इनकलाबों को
सिर्फ इतिहास की खातिर नहीं,
वर्तमान के लिए भी नहीं,
थोड़ा भविष्य के लिए भी।
मेरे सारे पैमाने आज दिशाहीन हैं
आज सन्नाटे की हर एक चीख
इनकलाब न होकर
इतिहास के पन्ने में सिमटती हुई,
अनायास बेवक्त
हँसी की तरह फूट पड़ती है।
मैं निराश होकर
बार-बार देख लिया करता हूँ
तुम्हारी तस्वीरों की तरफ
दीवार की उस छोटी सी
जगह को भी बार-बार
हर-बार
तुम्हारे लौटने की आस लगाए...
अब मैं रोज नया खत लिखता हूँ
भेज देना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
एक नए इनकलाब के लिए...

 


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