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कविता

पेशावर के बच्चों के प्रति
प्रदीप त्रिपाठी


बच्चों ने नहीं पढ़ी थी
कोई ऐसी 'मजहबी' किताब
अथवा 'धर्म-ग्रंथ'
जिसमें लिखा हो
बम, बारूद अथवा अचानक अँगुलियों से फिसल जाने वाली
संवेदनहीन, बंदूक की गोलियों की अंतहीन कथा
ऐसी कोई भी किताब नहीं पढ़ी थी,
अब तक, बच्चों ने
बच्चों ने नहीं बूझी थी ऐसी कोई जिहादी-पहेली
ऐसा कुछ भी, नहीं सीखा था
इन बच्चों ने।
बच्चों में बहुत 'भय' था
सिर्फ इसलिए कि
बच्चे जानते थे
कि
वे 'बेकसूर' हैं...

 


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