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कविता

शब्द...
प्रदीप त्रिपाठी


मैंने शब्दों से ही सीखा है सब कुछ
हँसना, बोलना, चलना, उठना, बैठना,
खेलना, घूमना, गाना... और कुछ लिखना भी
सीखा है मैंने शब्दों से ही।

कुछ भी सोचता हूँ मैं
इन्हीं से शुरू होना पड़ता है मुझे
यहाँ तक कि जब मैं कभी लड़ने की कोशिश करता हूँ इनसे
तब भी
कभी-कभी तो झुंड के झुंड ये मिलते हैं मुझसे
पर कभी-कभी सख्त जरूरत पड़ने पर ये हो जाते हैं बिलकुल नदारद
यह जब भी मुझे देखते हैं तो
वही... शंका, संदेह और संशय भरी दृष्टि से ही
आज भी
हमेशा डरा-डरा सा रहता हूँ मैं
कब-कहाँ ओले की तरह बरस पड़ेंगे मुझ पर
कोई भरोसा नहीं है इनका
फिर भी
नहीं छोड़ना चाहता हूँ इनका साथ
क्योंकि मुझे अभी इनके साथ बहुत देर तक
खेलना, हँसना, बोलना, गाना और घूमना बाकी है...

 


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