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कविता

जुड़ाव
आभा बोधिसत्व


अभी मैं सो रही हूँ
यह कविता लिखते हुए कि
अन्न के लिए नहीं
जल के लिए नहीं
नन्हीं हथेलियों को सहलाने
के लिए नहीं बल्कि
दुश्मनों ने कितना तारा मुझे
उन्हें तारने के लिए नहीं
बल्कि धता बताने के लिए निर्थक सुख...
और ताकत जुटाने के लिए

जुड़ने के लिए जीवन

लिख रही हूँ
सोते हुए जागते हुए कविता,

ना ना ना मैं अब तमाम ढकोसलों से
उकता गई हूँ


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