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कविता

स्त्रियाँ
आभा बोधिसत्व


स्त्रियाँ घरों में रह कर बदल रही हैं
पदवियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्रियाँ बना रही हैं
उस्ताद फिर गुरु, अपने ही दो चार बुझे-अनबुझे
शब्दों से,

दे रही हैं ढाँढ़स, बन रही हैं ढाल,
सदियों से सह रही हैं मान-अपमान घर और बाहर
स्त्रियाँ बढ़ा रही हैं मर्यादा कुल की खुद अपनी ही
मर्यादा खोकर,

भागमभाग में बराबरी कर जाने के लिए
दौड़ रही हैं पीछे-पीछे,

कहीं खो रही हैं
कहीं अपनापन,
कहीं सर्वस्व

 


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