डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

बरगद
फहीम अहमद


इतना हुआ पुराना बरगद
नाना का भी नाना बरगद।

तोता चील गिलहरी कोयल
सबका बना ठिकाना बरगद।

लंबी दाढ़ी रोज हिलाता
है जाना-पहचाना बरगद।

दाढ़ी पकड़ झूलते बंदर
कभी बुरा न माना बरगद।

राहगीर को देता छाया
पंखा झले सुहाना, बरगद।

आंधी-पानी तूफानों से
सीख चुका टकराना बरगद।

डटा रहा चट्टानों जैसा
हार कभी न माना बरगद।

लाख थपेड़े सहकर भी है
जान गया मुस्काना बरगद।


End Text   End Text    End Text