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कविता

मैं क्या चाहूँ
फहीम अहमद


कोई भी मुझसे न पूछे
कि आखिर मै क्या चाहूँ।

मेरे इस नन्हे-से मन में
छिपी हुई हैं बातें खूब।
मन करता खरगोश बनूँ मैं
चरता फिरूँ मुलायम दूब।

पंख लगाकर उड़ने वाला
सुंदर-सा सपना चाहूँ।

पापा कहते हैं वकील बन
तुम्हीं बढ़ा सकते हो शान।
मम्मी कहें डॉक्टर बनकर
रख लेना तुम मेरा मान।

कभी किसी ने यह न पूछा
कि मै क्या बनना चाहूँ।

होमवर्क जब करने बैठूँ
दीदी बतला देतीं काम।
मचल उठे मन दौड़ूँ-खेलूँ
जैसे ही आती है शाम।

रोक लगाते हैं सब, पर मैं
नदिया-सा बहना चाहूँ।


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