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सिनेमा

मानवाधिकार का पैरोकार सिनेमा
महेश्वर


सिनेमा सिर्फ वह नहीं जो आपके चेहरे पर हँसी छोड़ जाए, सिनेमा वह भी है, जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर दे कि आखिर ऐसा क्यूँ होता है। मानवीय संवेदनाओं से लबरेज कुछ फिल्मों के बारे में जानते हैं।

द ब्लैक पैंथर्स : वैनगाड ऑफ द रेवुलुशन (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) - कैलिर्फोनिया के ऑकलैंड में लगभग 50 वर्ष पूर्व स्वरक्षा हेतु ब्लैक पैंथर पार्टी स्थापित की गई थी। यह 1960 और 70 के दशक में उग्र बदलाव के लिए जानी गई। इसमें पुलिस अधिकारी, लेखक, वकील, पत्रकार आदि शामिल थे जिन्होंने ब्लैक पैंथर को अपने उद्देश्यों के साथ आगे बढ़ाया। फिल्म यह दिखलाने की कोशिश करती है कि आखिर 80 के दशक आते-आते यह क्यों अपने नस्लवादी भेदभाव, पुलिस की क्रूरता आदि उद्देश्यों से भटक गई। मानवाधिकार की पैरवी करती इस फिल्म के निर्देशक हैं - स्टैनली नेल्सन।

व्हॉट टूमॉरो ब्रिंग्स (अफगानिस्तान) - बर्थ मरफी द्वारा निर्देशित यह फिल्म दो शिक्षिकाओं और तीन विद्यार्थियों की कहानी है। अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर लगे प्रतिबंध के बावजूद गाँव में ज़ाबुली स्कूल स्थापित कर लड़कियों में शिक्षा के लिए जागरूकता पैदा करने की कोशिश की गई है। लंबे समय तक तालिबानी शासन से ग्रस्त अफगानिस्तान में यह प्रयास सराहनीय रहा है।

बर्डेन ऑफ पीस (गुआटेमाला) - जॉय बोयंक द्वारा निर्देशित यह फिल्म गुआटेमाला की प्रथम अटॉर्नी जनरल क्लाउडिया पाज वाई पाज की प्रशासन कुशलता पर केंद्रित है। यह फिल्म क्लाउडिया के संघर्ष और उनकी मानवाधिकारों की पक्षधरता को प्रदर्शित करती है।

वांटेड 18 (फिलिस्तीन) : फिलिस्तीन कलाकार आमेर शोमाली और कनाडियाई निर्देशक पॉल कोवान ने बहुत ही मनोरंजक ढंग से यह फिल्म बनाई है। मात्र 18 गायों की बदौलत चल रहे डेयरी फार्म जो बेइत सहोर में है, पर राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा बताकर उस पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। फिर भी छुपकर वे 'इंतिफादा दूध' का उत्पादन जारी रखते हैं। इसके माध्यम से कई अन्य मानवाधिकारों पर भी रोशनी डालती यह फिल्म विश्व सिनेमा में अपना विशेष स्थान रखती है।

नो लैंड' स सांग (इरान) : अयात नजाफ़ी द्वारा निर्देशित यह फिल्म 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद महिला कलाकारों और गायिकाओं पर लगाए गए प्रतिबंध पर है। वहाँ महिला कलाकारों पर इतनी सख्त पाबंदी लगाई गई कि ये महिलाओं के सामने भी अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर सकती थीं। पूर्व निर्मित सीडी'ज और कैसेट'स आदि भी चोरी छुपे बेचे-खरीदे जा रहे थे। ऐसे माहौल में सारा नज़ाफ़ी नामक महिला साहस दिखलाती है और कुछ ईरानी और फ्रेंच महिलाओं के साथ एक संगीत दल तैयार करती प्रतिबंध के बावजूद प्रस्तुति देती है।

कारटेल लैंड (मैक्सिको व संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) - मैथ्यू हाइनमैन द्वारा निर्देशित यह फिल्म मैक्सिकन ड्रग वार पर आधारित है। अस्तित्व के लिए लड़ रहे दो लोगों - दलों, पहला एरीजोना बॉडर रीकॉन जिसे अमरीकी टीम नेलर फिलॉय और दूसरा दल ऑटोडिफेनसास का डॉ. जोस मिरालेस प्रतिनिधित्व कर रहे थे। मानव हित में इसके माध्यम से उठाए सवाल गंभीर हैं।

द ट्रायल ऑफ स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, इजिप्त, लीबिया, यमन, बहरीन और सीरिया) - यह इन राष्ट्रों की छह शॉर्ट फिल्मों का कोलाज है जो 2011 में अरब राज्यों में संपन्न आंदोलनों को दिखाता है। इन इस फिल्म में स्वास्थ्य, शिक्षा, मानवाधिकार आदि को लेकर जागरूकता फैलाने तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए ब्लॉग व अन्य सोशल मीडिया का उपयोग कर उसे सशक्त स्वर बनाने की कोशिश दिखाई गई है। निर्देशक गिनी रेटीकर का यह प्रयास मानवाधिकारों के आंदोलन को नया आयाम देता है।

लाइफ इज सैकर्ड (कोलंबिया) - आंदेस दल्सगार्द द्वारा निर्देशित यह फिल्म मकाऊ के हक के लिए लड़े जा रहे युवा आंदोलन को दिखलाती है। कहा जा सकता है कि मकाऊ आंदोलन का यह फिल्मी दस्तावेज है।

बीट्स ऑफ द अंतोनोव (सूडान) : हवाई हमलों से त्रस्त ब्लू नील और न्युबा पहाड़ों के बीच बसे गाँवों के किसान, मजदूर आदि खुशी पाने के लिए संगीत की तरफ रुख करते हैं। निर्देशक हजूज कुका द्वारा बनाई गई यह फिल्म दिखलाती है कि चाहे कुछ भी हो जाए मानव का अंतिम अधिकार उसकी शांति ही है।

द लुक ऑफ साइलेंस (इंडोनेशिया) - 1965 में हुए जातीय-संहार से गहरे रूप से प्रभावित एक परिवार अपना बेटा खो चुका है। एक परिवार जिसका एक बेटा आशावादी है उसे आशा है कि हालात बदलेंगे और यह वर्ग-भेद, जातीय संहार आदि खत्म हो जाएँगे। जोशुआ ओप्पेनहेइमर द्वारा निर्देशित यह फिल्म हमें इतिहास की सच्ची तस्वीर से परिचित कराती है। मानवाधिकार को गहरे तक उतारती यह फिल्म काबिले तारीफ है।


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