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कहानी

बेगम एक हुकुम की उर्फ ब्लैक क्वीन
अनघ शर्मा


ताश के पत्ते की गड्डी की तरह जिंदगी ने उसे फेंट कर जोकर सा बाहर फेंक दिया था। ये लड़का जो किसी भी खेल में किंग मेकर की भूमिका निभा सकता था, जिंदगी के इस अजब खेल में जोकर बना मैदान के बाहर पड़ा था। इस खेल का नाम प्यार था और वो इस खेल में बुरी तरह हार चुका था। उसने तो अब तक यही सुना था कि प्रेम में प्रतिद्वंदिता नहीं होती, पर सामने वाला पक्ष उसे प्रतिद्वंद्वी मान सबक सिखाने को उतारू था। कब मौका लगे और उसे पटखनी दी जा सके।

कैक्टस के झुर्रियाँ नहीं पड़ती कभी, किसी भी प्रजाति के नहीं। बस उम्र के निशान छोटी-छोटी कीलों की शक्ल में निकल आते हैं कैक्टस के चेहरे पर... और ग्वारपाठे की चिकनाई सारा खुरदरापन सोख लेती है। काश कोई ऐसा इलाज होता जो समाज में उपजे खुरदरेपन को मिटा पता। कभी पेड़ों को तो देखा नहीं यूँ लड़ते, कि तू फलाँ पेड़ है कि तू फलाँ... ये बुरी लत इनसानों में ही क्यों पाई जाती है? गोल सड़क से उतरते हुए अजीत ने सोचा। पुरानी कमीज से जितना पानी टपक चुका था, उससे कही ज्यादा पानी उसकी आँख में था। तेज बारिश के बाद जमीन और भी भभक रही थी। मानो जैसे सूखे पत्तों को अभी और पतझड़ झेलना हो। उसे लगा अगर वो वहाँ और रुका तो पागल हो जाएगा। भाड़ में गई उर्मिला, उसने बुदबुदाते हुए कहा। वो पलटा और सड़क पर बेतहाशा भागने लगा। उर्मिला दूसरी जात की थी और यही चीज अब उन दोनों के भविष्य में फाँस सी थी।

वो जब घर में घुसा तो पेट्रोमेक्स के हल्के पीले उजाले में घर की बारिश में भीगी दीवारें अजीब सा भय पैदा कर रही थी। ये उसके शहर की खासियत थी की जरा बूँदाबाँदी हुई नहीं की बत्ती गुल। उसने टिमटिमाते हुए उजाले में गौर से देखा बरामदे के एक कोने में खटोले पर पड़ी अम्मा सो रही थी। अपनी दादी उसे हमेशा डाकखाने की इमारत सी लगती थी। दोनों ही अपनी जर्जर अवस्था में कभी भी भरभरा कर गिरने के अंदेशे से ग्रसित थी।

लंबे बरामदे को पार कर जब वो अपने कमरे में पहुँचा तो माँ पहले से ही वहाँ उसका इंतजार कर रही थी।

चल खाना खा ले, बत्ती का तो कोई भरोसा नहीं।

पापा कहाँ हैं?

कारखाने, अभी कहाँ से आ जाएँगे।

तो छोटे वाले कमरे में कौन है?

मैनपुरी वाली जीजी, कल चले जाना उन्हें छोड़ने और कुछ दिन वहीं रुक जाना। माँ ने थाली पकड़ाते हुए कहा। क्यों?

यहाँ माहौल ठीक नहीं है तुम्हारे लिए। कुछ दिन रह आओ, मामला ठंडा पड़े तो लौट आना। और फिर जीजी अकेली हैं तुम रहोगे तो कुछ दिन घर में जवान आदमी का सहारा रहेगा उन्हें। घर-बाहर के काम तो निबटा सकते हो उनके कम से कम, हमारे तो किसी काम आए नहीं तुम।

बिजली चमकी आँगन में खड़ा हरसिंगार घड़ी भर को दिखा और फिर अँधेरे में गुम हो गया।

माँ जूठे बर्तन समेट कर चली गई थी और अब वो अकेला था अपने कमरे में। इन दिनों ये अकेलापन उसे बहुत भाता था। उसने अँधेरे में टटोल कर अपना रेडियो उठाया। विविध भारती के स्टेशन पर लता की मीठी अवाज में गाया गाना आ रहा था।

"मिले तो फिर झुके नहीं नजर वही प्यार की"

पर इसी प्यार की नजर के चक्कर में उर्मिला के घर वालों ने उसे पिछले हफ्ते कितना पीटा था। सेंट्रल टॉकीज के चौराहे पर लोग मजमा सा लगाए उसकी पिटाई देख रहे थे। कितनी शर्म आ रही थी उसे। अपने पिटने पर नहीं, पिटना तो प्यार में लाजिमी है। बल्कि अपनी छोटी जात का दुख था उसे। वो जात ही क्या जो प्यार में बाधा बने, उसने सोचा। उसने करवट ली तो मुँह से एक टीस निकल गई।

यदि मैं भारत का प्रधानमंत्री होता तो...।

आज कल ऐसे दार्शनिक ख्याल बहुत आने लगे थे उसे, जो उसे खुद में एक हीरो पैदा करने के लिए झंझोड़ते थे।

वो पहले ऐसा नहीं था, आम लड़कों की तरह मस्तमौला था, पर पिछले दो सालों से जब से उर्मिला से मिला था तब से ऐसा दार्शनिक सा हो गया था। यूँ भी प्रेम में पड़ा हर लड़का दार्शनिक ही होता है, अपना खुद का एक दर्शन शास्त्र लिए, एक अनोखी आइडियोलॉजी लिए।

उर्मिला शहर के उस स्कूल में पढ़ती थी जिसके विद्यार्थी पीले-नीले रंग की यूनिफार्म पहन कर जाया करते थे। जो शहर की धारणा में सबसे महँगा था और इंग्लिश माध्यम स्कूल या कान्वेंट कहलाता था। जो सिर्फ अमीर बच्चों के पढ़ने के लिए बना था और वो छोटे लाल इंटर कॉलेज में पढ़ता था।

साथ वाले कमरे में किराएदार का कोई बच्चा कुनमुनाया तो उसकी माँ ने थपकियाँ दें कर उसे फिर से सुला दिया। माओं की आधी जिंदगी अपने बच्चों को थपकाने में ही गुजर जाती है उसने सोचा।

रात की चुप्पी को तोड़ती बूँदाबाँदी फिर शुरू हो गई थी। जब आधी रात गए बत्ती आई तो अम्मा ने अपने काँपते स्वर में आवाज लगाई... नैक मेरा पंखा चला जा रामसरन की बहू। माँ नहीं आई तो उसने बाहर आ कर पंखा चलाया। पूरा घर उसने देखा गहरी नींद में डूबा पड़ा था। वो अपने कमरे में लौटा और दिन भर की थकान से चूर तख्त पर लेटते ही सो गया।

2 .

जुगनू या पटबीजने बरसात के गहरे अँधेरों में बहुत चमकते हैं। बीजना (हाथपंखा) हिलाती हवा इन्हें चौखाने या चारखाने में बँटी रात में इधर-उधर फेंक देती है। ये गिरते हैं, भीगते हैं, फिर उठ कर जगमगाने लगते हैं। ताँबे के रंग सा दिल जब उदासी के गहरे खून में डूबता है तो फिर न सँभल पाता है, न धड़क पाता है, न जगमगाता है। दिल की नसें हमेशा की तरह खून की आवाजाही बनाए रखती हैं। कोई एक बड़ी नस चोरी से एक जुगनू छुपा कर रख लेता है, मौका-बेमौका जब कभी ये जगमगा जाता है तो लोगों को लगता है कि दिल के मरीज की धड़कने लौट आई है। जुगनुओं को बारहों महीने जगमगाना चाहिए, उसने ढलते हुए सूरज को देखते हुए सोचा।

उसे मैनपुरी आए तीन महीने हो गए थे। और वो बुरी तरह ऊब गया था। अब यहाँ उसका मन नहीं लगता था घर की याद आती थी। घर जो उसके लिए जवानी के मंडराते खतरे लिए बैठा था। उर्मिला की याद आ रही थी उसे और बड़ी जोरों की आ रही थी। उसने सोच लिया था कि अब वो वापस चला जाएगा चाहे जो हो। अब यहाँ और रुकना पागलपन होगा।

मैं कल वापस चला जाऊँ बुआ?

क्यों?

बस मन नहीं लग रहा, बहुत दिन हो गए हैं।

उस लौंडिया की याद आ रही होगी तुम्हें। भैया जी ने भेजा है तुम्हें हमारे साथ जो वो वापस बुलाएँगे तो हम भेज देंगे। यादव की लौंडिया है वो और हम कुम्हार, मार-मूर के कहीं फेंक देंगे तो माँ-बाप का बुढ़ापा मिट्टी में मिल जाएगा। पढ़ो-लिखो कुछ बनो तो माँ-बाप को आस बँधे। दो साल से इंटर में फेल हो रहे हो, महतारी ने मोटरसाइकिल और दिला दी... ऊपर से ये चक्कर। कोई और कसर रह गई हो तो वो भी कर लो। सब महतारी की शह है तुम्हें। सही कहती हैं अम्मा कि रामसरन की बहू के ऐसे लच्छन हैं - "कि तन पै नहीं लत्ते, बीबी खाएँ पान के पत्ते"

वो कुछ नहीं बोल, चुपचाप उठा और कमरे में चला गया। अकेले कमरे में एक बार को उसकी रुलाई छूट गई फिर अगले ही पल उसने खुद को सँभाल लिया। उर्मिला को भूलने की एक झूठी कसम खाई और जा कर सो गया। रात के अँधेरे और सन्नाटे को सिर्फ सड़कों पर दौड़ने वाले ट्रकों की हेड लाइट्स की रोशनी और होर्न की आवाजें चीर रही थी। कभी-कभी रात की चुप्पी में कोई नागिन धुन लहराती और फिर खो जाती थी। सुबह जब वो तैयार हो सामान ले कर बुआ के सामने खड़ा हुआ तो उन्होंने कुछ न कहा। मन ही मन सोचा, इतना समझाने पर भी नहीं समझा तो अच्छा है चला ही जाए। वैसे भी सास-ससुर वाला भरा पूरा परिवार था। पति कई बार नाराजगी दबे लहजे में जता भी चुके थे। जब वो पैर छू कर उठा तो बुआ ने उसे सौ-सौ के दो नोट पकड़ा दिए।

****

पता है वडेजा मिस कहती हैं की मेरी आँखों का रंग उन्हें हजेल नट जैसा लगता है। कितना फैसीनेटिंग है ना हजेल कलर की आँखें होना, उर्मिला ने कहा। उसने ऐसे सर हिलाया जैसे सब समझ गया हो। घर आ कर सबसे पहले उसने शब्दकोश में हजेल का मतलब ढूँढ़ा। उसका मानना था कि अपने से ऊँचे स्तर की लड़की से प्यार कर रहे हो तो उसकी हर छोटी-बड़ी बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भले ही सरकारी आँकड़ों में यादव ओ.बी.सी. की श्रेणी में आते हों पर उसके इलाके में ये कौम दबंग मानी जाती है और वो नए जमाने के चलन में दबंगों की लड़की से प्यार कर बड़ी हिम्मत का काम कर रहा था।

****

जिस वक्त दीवार के रोशनदान से धूप अंदर आने की कोशिश में थी। किवाड़ के सूराख में छुपी हवा हाँफ रही थी। चुंगी के नल पर बूँद-बूँद टपकते पानी के लिए औरतें लड़ रही थी। जिस वक्त रामसरन की बहू धीमी आवाज में 'रानी तुमसी तो बेहा हमने देखी नहीं, ओ राजा जो मैं होती ना बेहा तो तुमसे मेरी निभती नहीं' गा रही थी। और जिस वक्त चोरी-छुपे उर्मिला और अजीत नई उम्र के सपनों में तार पिरो रहे थे। ठीक उसी वक्त कुछ लोगों ने कारखाने से रामसरन को खींच कर एक पुरानी मारुती वैन में डाल दिया था।

शाम को जब अजीत धूल उड़ाता घर में घुसा तो रामसरन सामने बरामदे में लेटा हुआ था, शरीर पर जगह-जगह पट्टियाँ और पुल्टिस बाँधी थी। अजीत ने देखा आस-पड़ोस की औरतें छोटे-छोटे घूँघट निकाले माँ को घेरे बैठी थी। वो अपने कमरे में जा रहा था कि पीछे से अम्मा की आवाज कानों में पड़ी,

"इन अहीरों ने तो उत्पात मच रखा है, आए दिन जान पर सवार रहते हैं", और ये अजीत किसी की सुनता नहीं।

ठीक कह रहीं है आप ताई जी कोई भीड़ में से बोला। वैसे भी जवान बेटा और बिन-नकेल का बैल पीठ पर हाथ रखते ही सींग मारने को दौड़ता है।

बंद कमरे में अजीत ने सोचा अब पानी उतरने तक उसे कदम फूँक-फूँक कर रखने होंगे। पिता के कंधों का भार अब उसके ऊपर ही था। माँ की गृहस्थी चलाने के लिए अब उसे ही काम से लगना पड़ेगा।

उसकी जरा सी भूल का ये नतीजा था कि पिता के दोनों पाँव जाते रहे, उसकी पढ़ाई छूटी और चूड़ी के एक कारखाने में नौकरी का आसरा रहा। एक-एक कर के छ महीने निकल गए। जब वो सुबह कारखाने जाता और शाम ढले धूल में लिपटा मोटरसाइकिल से उतरता तो माँ का दिल भर आता था। चूड़ियों पर चढ़ने वाली हिल की हल्की पर्त चेहरे-हाथों पर चढ़ी रहती थी। बल्ब की हल्की रोशनी में उसका चेहरा ऐसे जगमगाता था जैसे किसी दुल्हन का सुनहरा आँचल हो। उस पर जब वो हर महीने अपनी तनख्वाह देता तो रामसरन की बहू की गर्दन तन जाती थी,कि बेटा हो तो ऐसा। पर वो ये भूल जाती थी की इसी बेटे के कारण उसका घर परेशानियों की शरणस्थली बना। वो ये भी भूल जाती थी कि शांत समंदर में अनाड़ी मल्लाह की नाव हवा के एक हल्के झोंके से पलट सकती है। और वो यह भी न भाँप सकी कि ये चुप्पी तूफानों से पहले की है।

आज खाना मत रखना मम्मी। अजीत ने बाथरूम से निकलते हुए आवाज लगाई।

क्यों?

मैं आज आगरा जा रहा हूँ मैच खेलने, कल शाम तक लौटूँगा।

और कारखाने?

दो दिन की छुट्टी पर हूँ।

वो चुप रही सोचा लड़का पिछले सात-आठ महीने से खून जल रहा है अपना। अभी कोई उम्र है इसकी फैक्ट्री-कारखाने जाने की।

वो जब बन-सँवर के घर से निकला तो रामसरन की बहू ने पीछे से चुपचाप उसकी बलैयाँ ले ली।

****

अगले दिन तड़के ही पुलिस रामसरन के घर जा पहुँची।

लौंडा कहाँ है तेरा?

साब वो तो आगरे गया है मैच खेलने, शाम तक लौटने की बोल कर गया है।

कुछ हुआ क्या साब? रामसरन की बहू ने ओट से पूछा।

लड़की भगा ले गया तेरा लौंडा। सोलह साल की है। नाबालिग है। तगड़ा केस बने ही बने समझी।

रामसरन की बहू को ऐसा लगा जैसे पैरों की जान निकल जाएगी। गिरने से बचने के लिए उसने किवाड़ का पल्ला थाम लिया।

रोज मिलता था लड़की से मौका लगते ही ले उड़ा।

वो तो रोज कारखाने जाता था साब रामसरन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

साल सब झूठ, एक दिन नहीं गया फैक्ट्री। कितने ही यार-दोस्तों से पैसा उधार ले रखा है उसने पता है।

आजकल सरकार तुम्हारी है तो सालों पर ही निकल आएगा क्या? एक पुलिसवाला बोला, जल्दी बता कहाँ है लौंडा?

साब हम से तो आगरे की बोल के गया था।

जवाब पर किसी ने रामसरन का गिरेबान पकड़ कर तीन-चार थप्पड़ लगा दिए। उसके गले से एक घुटी सी चीख निकल कर रह गई। उधर दरवाजे की आड़ में खड़ी रामसरन की बहू कब की बेहोश हो कर गिर पड़ी थी।

अगले तीन महीने तक पुलिस हर दूसरे दिन रामसरन के घर दबिश देती रही, फिर एकाएक आना बंद कर दिया। पता चला लड़की वापस लौट आई है तीन महीने बाद। कहाँ थी? किस के पास थी? कौन लौटा के लाया? या अपने आप आई? इन सवालों के जवाब किसी के पास नहीं थे। सब अपने-अपने हिसाब से अंदाजा लगा रहे थे।

उर्मिला तो लौट आई पर अजीत नहीं लौटा। माँ-बाप की आस टूटने लगी। महीनों दौड़ते-फिरते रहे पर नतीजा सिफर। फिर जब सरकार बदली तो रही-सही उम्मीद भी चुक गई। सूरज उगा और डूबा, फिर उगा और फिर डूबा और यूँ ही चार साल का वक्त बीत गया। रामसरन और उसकी बहू अब इस अंदेशे को सच मान चुके थे कि उनका लड़का जान से जाता रहा।

3 .

झालरों की जगमगाहट दूर ही से बता देती थी कि ये शादी के उत्सव की चकाचौंध है। पूरी गली के सर पर पंडाल तना था। अप्रैल की चढ़ती गर्मी में शादी थी। उदास सी शाम हल्के-हल्के हाँफ रही थी और ऐसा लगता था जैसे आँधी आने के आसार हों।

किसी ने आवाज लगाई, अरे भई राजू जल्दी-जल्दी जाओ कल के लिए जनवासे का इंतजाम देखो। भई जितेंदर कहाँ है अब? पता है किसी को।

अरे गोल कमरे में पत्ते खेल रहे हैं सब वही है।

अच्छा।

एक लड़की ने दरवाजा धकेला और कमरे में घुस गई। उर्मिला सामने पलंग पर बैठी थी।

अरे सुधा! व्हाट ए सरप्राइज, उर्मिला ने पलंग से कूदते हुए कहा। शादी कल है और तू आज आ रही है।

रिजर्वेशन ही बड़ी मुश्किल से मिला, वो भी अकेली का। सुधा ने कहा।

और जीजाजी?

कैसे आते, एक ही टिकट मिला कंफर्म।

हाय!

जब - तक उसने हाथ-मुँह धोए तब-तक उर्मिला चाय ले आई।

तुझे आज पूरे चार साल बाद देख रही हूँ, सुधा ने कहा।

हाँ, उन दिनों बड़े रेस्ट्रिक्शन हो गए थे मुझ पर।

दोनों सहेलियाँ बहुत देर तक बातें करती रहीं, नीचे से तैरते हुए आवाजें ऊपर चली आ रहीं थी।

वो मारा, ये लो बेटा अब तो गई हुकुम की बेगम तुम पर, 12 पॉइंट्स का दंड लगेगा, फाईन लगेगा तुम पर।

क्या खेला जा रहा है भाई?

ब्लैक क्वीन, इसमें हुकुम की बेगम जिस पर जाती है उसकी हार हो जाती है।

चाय का प्याला ट्रे में रखते हुए सुधा ने पूछा। और वो लड़का?

उसका तो कांड जितेंदर भाई ने वहीं कर दिया था बंगलौर में। उर्मिला ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

और पुलिस को क्या कहा तूने?

मैं मुकर गई, कह दिया मौसी के घर थी। मामला बिगड़ गया था बड़ा।

तू मुकर कैसे गई उर्मिला?

जान से मार देते मुझे भी। देख आज भी शरीर पर निशान हैं मेरे, उर्मिला ने कोहनी की तरफ इशारा कर के कहा।

पर वो बेचारा तो जान से गया।

अब गया सो गया। अरे मुझे अपनी जान प्यारी थी। तू जानती नहीं क्या जितेंदर भाई को। आँधी का सा मौसम हो रहा है, मैं एक-एक कप चाय और लाती हूँ तू जरा खिड़की बंद कर ले। इतना कह कर उर्मिला कमरे के बाहर चली गई।

सुधा उठी और खिड़की पर जा खड़ी हुई। हवा में तेजी आ गई थी, अगले तीन-चार मिनट में आँधी का आना निश्चित था। वो जब तक खिड़की बंद करती तब तक हवा का एक तेज झोंका कमरे में घुस आया। उसने धूल-मिट्टी से बचने के लिए अपना मुँह फेर लिया। हवा के साथ कूड़ा-कर्कट भी फड़फड़ाता हुआ कमरे के अंदर चला आया था। सुधा ने खिड़की बंद की तो देखा कि ताश का एक फटा पत्ता उड़ कर ड्रेसिंग टेबल के आईने से चिपक गया है। उसने जा कर पत्ता उठाया तो देखा की ये एक हुकुम की बेगम थी।

हठात उसके दिल से निकला तुम जिसके भी पास रहीं उर्मिला उस पर दंड लगाती रहीं, फाईन लगाती रहीं। उर्मिला तुम भी एक हुकुम की बेगम हो उर्फ ब्लैक क्वीन, उसने कहा।

क्या? पीछे खड़ी उर्मिला ने पूछा।

कुछ नहीं, बस यूँ ही...


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