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कहानी

नक्श फरियादी है
अनघ शर्मा


इस यथार्थ से अतीत के शिलालेखों तक...

अतीत के शिलालेखों से बादलों की तरतीब तक...

बादलों की तरतीब से आगामी भविष्य तक...

उसे सिर्फ अँधेरा ही नजर आता था। हर दिशा में व्याप्त अंधकार। अँधेरे के इस दिग्दर्शन से ये उसका पहला साक्षात्कार था। उसने करवट ले कर पाँव सिकोड़ लिए, टाट के बोरे पर उसका पूरा शरीर पैर मोड़े बिना एक सीध में नहीं आ सकता था। बबूल के छितराए हुए पत्तों के बीच में से चाँदनी की एक धुँधली रेखा मवाना शुगर मील के टाट के बोरे से सरक कर उसके मुँह पर आ गई तो उसने मुँह फेर लिया।

थोड़ी देर में उसे झींगुरों के शोर ने सुला दिया। मीठी नींद के पुल को पार करता हुआ वो घर के दरवाजे पर पहुँच गया। दरवाजे पर दो कनेर के पेड़ एक दूजे के गलबहियाँ डाले खड़े थे। गर्मियों में इसी के नीचे पापा की खटिया बिछती थी। अंदर की गैलरी के पार उसकी बुलेट खड़ी है। धूल की एक पतली पर्त उसके ऊपर चढ़ी हुई है। गैलरी के पार के बरामदे में सुलगते चूल्हे पर दूध की हंडिया चढ़ी हुई थी। धुएँ और उबलते दूध की महक उसके नथुनों को महका गई। बरामदे के पार उसका कमरा था। जिस पर माधवी की पुरानी साड़ी का पर्दा टँगा था। पर्दा हटा कर उसने अंदर झाँका सामने उसका पलंग पड़ा था। वो जा कर पलंग पर लेट गया। कितना पास था माधवी का चेहरा। जरा जोर से साँस ले तो चेहरे से चेहरा टकरा जाए। दूध की धुएँ घुली महक में जलने की बदबू कैसे आ गई? क्या जल रहा है? ये माधवी रोज चूल्हे में लकड़ियाँ ठूँस आती है। ये लकड़ियों की बदबू नहीं है। क्या है ये? ये तो घर में रखा सामान जल रहा है। वो उठ कर बैठ गया। ये तो घर नहीं है। एक नजर घुमा कर उसने चारों तरफ देखा। पत्तों से छनती हुई ओस बूँद-बूँद कर के उसके ऊपर गिर रही थी। उसने थूक निगल कर सूखे गले को गीला किया और फिर लेट गया।

नींद के दूसरे किनारे पर सुगबुगाहटें थीं।

"आज से तू हमारा नेता सुख्खी। हाँ सुखबीर तू ही हमारा नेता है। तू पढ़ा-लिखा है, समझदार है, होशियार है"। हम क्या जाने कुछ? जमीन को सरकारी खाते में जाने से कैसे रोकें?

रोकेगें ताऊ, अपनी जमीन है। किसी के बाप का माल थोड़े है। जो चार टुकड़े फेंक कर हथिया लेगा। उसने थूकते हुए कहा। पूरा पैसा देगी सरकार, जितना हमारी माँग है। तभी अपने खेत जाएगा।

चिलचिलाती धूप में वो सब सड़क के किनारे बैठे हुए थे। सुखबीर, बृजवीर, मदनपाल, भूपेंद्र, और भी अनगिनत। थोड़ी देर पहले सेक्शन इंजिनियर की पिटाई की थी सुखबीर ने। गुस्से के मारे भीड़ ने जे.सी.बी. में आग लगा दी थी। उसका धुआँ अभी थमा की एक के बाद एक करके पुलिस की चार जीपें दनदनाती हुई गाँव में घुसी तो भगदड़ मच गई। आमने-सामने की लड़ाई थी अब ये। पुलिस बनाम गुंडागर्दी, हक बनाम हुकूमत, सरकार बनाम जनता और सब में सरकार का पलड़ा ही भारी था। पुलिस ने उतरते ही हवाई फायर दागने शुरू कर दिए, लाठी चार्ज हो गया। हवाओं की तरह काफूर हो गया उनका हौंसला। हवा में लहराती एक लाठी

मदनपाल के सर पर लगी तो खून की धार पगड़ी से रिसती हुई सफेद बुर्राक कुरते पर फैली, तो उनका हौसला वापस आ गया। सारा गाँव इकट्ठा हो गया। पुलिस की एक जीप भी आग के हवाले हो गई। उसके घंटे भर में ही सब मैदान खाली। पुलिस के सामने कोई भी नहीं टिक पाया। रह गए सिर्फ बच्चे और औरतें। खाली मैदान में रह गई सिर्फ उड़ती हुई हवा और खून मिली धूल। भागते में सिर्फ उसने इतना ही देखा कि भूपेंद्र ट्यूबवेल की हौज में कूद रहा था।

किसी ने उसका कंधा झकझोर कर हिला दिया। बेवकूफ ऐसे ही सोता रहेगा तो कभी भी पुलिस की पकड़ में आ जाएगा। तेरी तलाशी में पुलिस जगह-जगह दबिश दे रही है। ले ये अखबार पढ़, भूपेंद्र ने उसे अखबार पकड़ाते हुए कहा। पहले ही पन्ने पर लिखा था।

"किसान नेता सुखबीर पर सरकार ने पच्चीस हजार का ईनाम रखा"

वो रातों-रात मशहूर हो गया है। अखबारों में उसका नाम छपता है। लोग उसकी खबर दिलचस्पी से पढ़ते है। पर वो तो बिरादरी से अलग हो गया। और आदमी तो चोरी-छुपे रातों को गाँव चले जाते हैं, घर वालों से मिल लेते हैं। एक वो ही नहीं जा सकता।

नया सी.ओ. आ गया है। भूपेंद्र ने उसकी सोच तोड़ते हुए कहा।

कौन?

जे.एस. सिंघल। औरतों को बुलाता है थाने बयान के बहाने। सुना है कल भाभी को बुलाया है उसने। बयान दर्ज कराने के लिए।

तो तू चला जइयो साथ भैया।

मैं कैसे जा सकता हूँ? दरोगा ने मुझे जेनरेटर फूँकते हुए देख लिया था। वहीं धर लेगा।

सुखबीर ने डबडबाई आँखों से उसे देखा तो भूपेंद्र ने चेहरा फेर लिया। ये वही सुख्खी है जो बाप के साथ रातों में कभी खेतों में पानी देने नहीं गया कि साँप-बिच्छू निकल आते हैं। ये वही सुख्खी है जो बल्ला ले कर निकल जाए तो गाँव की टोलियों की टोलियाँ अकेले उसके दम पर जीत जाएँ। इसी को देख कर गाँव के लड़कों ने अपने-अपने बापों से बुलेट के लिए जिद की थी। और आज ये ही टाट के बोरों पर सोता है। बीहड़ों-बीहड़ों मारा-मारा फिर रहा है। भूपेंद्र ने धीमी साँस छोड़ते हुए सोचा। वो उठ खड़ा हुआ तो चंद्रगुप्त से अशोक तक और बिंदुसार से आज तक के राजाओं की कुलीनता और अकुलीनता के सारे परिदृश्य का बिंब सुखबीर की आँखों में धूमकेतु की तरह गुजर गया।

कहाँ होगी माधवी? उसने सोचा।

सुबह की चढ़ती हुई धूप के साथ-साथ पारा भी चढ़ता जा रहा था। बूढ़े ससुर की बाँह थामी हुई माधवी ने रिक्शे से उतरते हुए सरसरी निगाह से थाने को देखा। भय और आतंक ने दोनों तरफ से आ कर उसकी एक-एक बाँह थाम ली। चारदीवारी के भीतर एक अधजली जीप खड़ी थी। जो उसके पति की शौर्य-गाथा का एक नमूना बनी हर आते-जाते से जैसे अपनी कहानी कह रही थी।

दूर से ही एक सिपाही ने उन्हें आते देख लिया। आओ नेताइन सी.ओ. साब तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं।

अपने आस-पास इतनी पुलिस देख कर माधवी के हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए। साड़ी के पल्ले से चेहरे पर आया पसीना पोंछ माधवी ने बूढ़े ससुर की ओर देखा और आँखों ही आँखों में सांत्वना दे डाली। कि तुम घबराना मत पापा मैं हूँ ना सब ठीक हो जाएगा। वो कभी बैठ जाती तो कभी उठ कर दीवार के सहारे खड़ी हो जाती। करीब तीन घंटे के इंतजार के बाद सी.ओ. ने उसे अंदर बुलाया।

देखे हम ये बहुत देर से खड़ी थी, पूछ लो इससे बैठेगी। उसने दरोगा से कहा।

बैठेगी शब्द की छुपी हुई व्याख्या उसे अंदर तक कँपकँपा गई। उसकी पिंडलियों में एक झनझनाहट सी दौड़ गई।

कहाँ है तेरा आदमी? उसने सिगरेट सुलगाते हुए पूछा।

पता नहीं साब, मैं क्या जानूँ? उस दिन से वो आए ही नहीं।

साली झूठ बोलती है पुलिसवालों से। हमें सब पता है। वो साले रातों-रात आते हैं, रोटी खाते हैं, और तुम्हारी देह टटोल कर सुबह कहाँ निकल जाते हैं। सरकार का हुक्म है नरमी बरतनी है वर्ना सब मादर... की खाल में भुस भरवा देता। हरामजादों के हलक में ही उतार देता सब खेत। बिठाए रखो साली को जब तक सच ना बताए। रात के आठ बजे तक बिठाए रखने के बाद उसे छोड़ दिया गया। जा अब कल आना साब ने कहा है। सिपाही ने उससे कहा। क्यों जी अब नेताजी को पानपत्ती नहीं बना कर खिला रही तू आजकल, सुना उस दिन तो भाग-भाग कर रोटी खिला रही थी। किसी दूसरे ने कहा। माधवी ने सर उठा कर देखा। आँखों के पानी में हजार प्रश्न तैर रहे थे। क्या होगा भगवान? जब रक्षकों की भाषा-शैली ऐसी हो।

दूसरे, तीसरे, चौथे दिन दरोगा ने उसे दुबारा सी.ओ. से मिलवाया। अबके आवाज में तल्खी कम थी। बैठ जा आराम से उसने एक सरसरी नजर फेरते हुए कहा तो उसने साड़ी के पल्ले को दोहरा कर बदन से लपेट लिया।

आया तेरा आदमी?

नहीं साब।

क्यों झूठ बोलती है हमसे? हमें सब पता है किस घर में क्या चल रहा है? क्यों चाहती है सख्ती करें हम? बता कहाँ है सुखबीर? अबके आवाज में सख्ती थी।

कसम से साब मुझे नहीं पता वो कहाँ है?

अच्छा-अच्छा। चाहती है वो वापस आ जाएँ।

हाँ साब। आपका अहसान होगा।

उसके लिए तुझे हमारा एक काम करना होगा।

क्या साब?

पच्चीस हजार का ईनाम है तेरे आदमी पर। तू और तेरा ससुर किसी की शिनाख्त कर दे सुखबीर बता के। पाँच हजार तुम्हारे। तू सोच ले आराम से, दो-तीन दिन में बता जइयो ऐसी भी कोई जल्दी नहीं है। जैपाल पानी पिला इसे, उसने घंटी बजा कर सिपाही को बुलाया और बात खत्म कर दी।

सारी रात खाट पर पड़े-पड़े माधवी ने गुजार दी। सुबह से कुछ पहले उसने बगल में सो रही सास को जगाया और सारी बात बता दी। ऐं मम्मी-पापा नहीं माने तो। उसकी आवाज में भय का अंकुर था।

मानेंगे क्यों न, जवान बेटा है। आज इतने दिन हो गए घर में पैर नहीं रखा उसने। तू सो जा मैं बात करुँगी उनसे। उसने माधवी के माथे पर हाथ रखा तो वो चौंक पड़ी। उसने पलट कर हाथ लगाया तो देखा कि भूदेई का सारा पिंडा बुखार से जल रहा था।

ऐं मम्मी तुमने नहीं ली?

हाँ, खा तो ली हरी पन्नी बाली, थोड़ी देर में उतर जाएगा।

भूपेंदर भैया से बात करूँ मम्मी?

तू मती करियो, तेरे पापा से करवाऊँगी।

डर की धड़कन अगले पूरे दिन रह-रह कर माधवी के कानों में गूँजती रही। सुखबीर का चेहरा बार-बार उसकी आँखों के सामने फिर जाता था। कभी दूल्हे के सेहरे में, कभी बुलेट चलाता हुआ, कभी गली के बच्चों के साथ गेंद-बल्ला खेलता हुआ... और कभी पुलिस की लाठियों से खुद को बचाता हुआ, भागता हुआ। आखिरी बार उसने सुखबीर की पीठ देखी थी और कान के पीछे से बहती खून की धार। उसने घबरा कर अपनी आँखें खोल दी।

पोस्टमार्टम रूम में से बूचड़खाने सी उठती गंध ने माधवी का सर चकरा दिया। उसने पलट कर दरवाजे पर खड़े ससुर को देखा और फैली हुई पुतलियों का खालीपन उसे अवसाद से भर गया। उसने आँखें बंद कर के कफन ढके एक शरीर पर अपना हाथ रख दिया तो अचानक से दोनों पैरों की जान सी निकल गई। पसीने की कुछ बूँदें माधवी के माथे से टपक कर उसके हाथों पर गिर पड़ी। जब वो कमरे से बाहर आई तो चौतरफा फैले अँधेरे ने उसे आकर लपेट लिया। बड़ी भयावह रात गुजारी माधवी ने वो। कभी सुलगते बिटोरों का धुआँ दम घोंट देता था। कभी खाली पड़े खेतों में सुलगती आँच बदन जलाने लगती। कभी सफेद कपड़ों में लिपटी लाश दोनों हाथ बढ़ाए उसकी तरफ आती दिखती।

मुँह अँधेरे मोटर साइकिल पर बैठा एक सिपाही आया और कारेलाल को हजार-हजार के तीन नोट पकड़ा दिए।

साब बात तो पाँच हजार की हुई थी। कारेलाल ने पूछा।

और जो तेरे बेटे ने सरकारी जीप फूँक दी उसकी मरम्मत का हर्जा क्या दरोगा जी की लुगाई भरेगी। और हाँ कल सुखबीर की औरत को थाने भेज दियो, लखनऊ से कुछ लोग आए हैं इसका बयान दर्ज होगा।

दरवाजे की आड़ से उसने देखा वो रुपये ससुर की धोती की अंटी में जा बँधे। एक साँस छोड़ कर उसने सोचा पति भी गया और रुपये भी।

पीपल के पत्ते आवारा लड़कों की तरह गाँव कि गलियों में यहाँ-वहाँ उड़ते फिर रहे थे। जलते सूरज के माथे पर बादल का एक भी टुकड़ा न था। शाम के चीत्कार करते सन्नाटों के मुँह में भी कोई रोटी का टुकड़ा नहीं ठूँसता था कि घड़ी भर को ही सही उसका मुँह तो बंद हो। हर तरफ मुँह उठाए चीखता-फिरता अँधेरा था और ऐसे अँधेरे में सिर्फ दो लोगो को नींद नहीं आती थी।

आज से तू हमारा नेता सुख्खी, ये आवाजें अब उसका गला दबाती हैं। धूप, लू, गर्मी सब शरीर के रोम से अंदर का खून धीरे-धीरे चूस रही हैं। न खाने को भरपेट खाना, न कपड़े, न बिस्तर। वो जिस शौक और मशहूरियत के लिए बैठा था उसने तो इन तीन महीनों में दम तोड़ दिया।

रात के अँधेरे में एक सिपाही उसे गाँव के मुहाने पर छोड़ गया। वहाँ से चुपचाप भूदेई उसे घर तक ले आई। चूँकि सास-बहू दोनों साथ थी इसलिए किसी ने कुछ न पूछा। गए अँधेरे भूदेई ने उसकी साड़ी उठा कर सरसों के तेल का फाया लगा दिया। उसने नींद में डूबे माधवी के उतरे चेहरे और सूजी हुई आँखों को देखा और सोचा सत्ता ने जमीन का एक और टुकड़ा निगल लिया। भूदेई ने अपनी आँखों पर हाथ रख लिए।

सत्ता और उसके साईस उन सामानांतर रेखाओं की तरह है जो कभी कहीं टकराती नहीं है पर अपनी राह में आने वाली हर चीज निगल लेती हैं।

सुरसा सा मुँह फाड़े रात कहीं खत्म ही नहीं होती। उसके बदन पर सुबह-शाम रेंगती यादें चीटियों की तरह उसे काटती फिरती हैं। जख्म-दर-जख्म देती रहती हैं। उसने अपने हाथ चेहरे पर फेरे। हफ्तों से उसने शीशा नहीं देखा था। बाल बढ़ कर कानों के नीचे तक आ गए थे।

सफेद हाथी पर बैठ कर इंद्र देवता उसकी पूँछ में बादलों को बाँध कर दिन में तीन-तीन बार गुजरते थे पर फिर भी सूखे का सूखा। पोखर में फैली सिंघाड़े की बेल सूख चली थी साथ में माधवी भी। साडी पत्तियाँ पीली पड़ने लगी थीं जब जा कर कहीं आकाश से पहली बूँद गिरी। टप-टप, टप-टप सब सूखे खेत पानी में डूब गए।

ये जाने कहाँ होंगे? माधवी ने चूल्हा ढकते हुए सोचा। घर का आकाश बादलों से ढका हुआ था। आज फिर पानी पड़ेगा उसने कहा। पानी के बोझ से पीले अमलतास, लाल गुलमोहर टूट-टूट कर जमीन पर गिर रहे थे। मिट्टी में सने हुए एक दूसरे में गड्ड-मड्ड। बीहड़ों में फैले गुडहल, कनेर और शहतूत नाक में पानी भरने की वजह से दम तोड़ रहे थे। शहतूत की डाल पर एक चौखाने की काली-सफेद टँगी कमीज से पानी टपक रहा था। वो नंगे बदन बैठा दूर तक फैली पगडंडी को देख रहा था। बादलों से दो घड़ी के लिए चाँद सरक के उसके पास आ पहुँचा। अब ये भी पहले जैसा चाँद नहीं है, उसने सोचा। जो शाम ढले निकल आया करता था। अब तो ये भी आने से डरता है। क्या पता इससे भी सड़क बनाने के लिए जमीन माँग ली जाएँ।

देखते-देखते दो महीने और बीत गए। बादलों से घिरा अगस्त भी गया पर वो नहीं लौटा। महीनों इधर-उधर चक्कर लगा कर अब माधवी लखनऊ जा रही है। सरकार के दरवाजे पर ही दुहाई दी जाएगी अब। ले लो जमीन पर वापसी के दरवाजे खोल दो माई-बाप। जिस रात वो लखनऊ की गाड़ी में बैठी, उसी सुबह वो लौट आया। धुआँ छोड़ती ढिमरी उठाए मुँह-अँधेरे भूदेई ने किवाड़ खोले तो वो सामने खड़ा था। सुबह तक सारा गाँव उसके कमरे में चला आया था। मदनपाल, भूपेंद्र, ओमपाल और भी न जाने कौन-कौन बस एक वही नहीं थी।

हफ्ते बीत गए पर वो लखनऊ नहीं पहुँची। कोई कुछ कहता कोई कुछ। जितने मुँह उतनी बातें।

चौथे-पाँचवे या शायद किसी अखबार के छठे पन्ने पर लिखा था। "सियालदा एक्सप्रेस से कट कर तेईस-चौबीस साल की युवती की मृत्यु, शिनाख्त का अनुरोध"। अखबार में छपी खबर को पढ़ने वालों ने पढ़ा भी, पर कौन जाने जिला आगरा के शंसाबाद की माधवी कौन है?

कंपाउंडर अभी-अभी सुखबीर के बोतल लगा के गया था। बाहर सानी लगाती भूदेई ने कारेलाल से कहा। छोड़ दो यह जमीन, जो जितना मिल रहा है उसी पर राजी हो जाओ। बहू गई, बेटे की हालत ऐसी है। मुझ पर अब और नहीं झेला जाता।

अंदर लेटे सुखबीर की पलकें झपकी ही थी कि माधवी का चेहरा सामने आ गया। उसने उसके रूखे चेहरे पर हाथ फेरा और बोली। मेरे लिए दुखी मत होना। वहाँ बहुत सुख है। मुझे चाँद पर एक सौ दस गज का प्लॉट मिला है। पीछे के हिस्से में अमीर देशों की तरफ। वहाँ सूरज भी सीधी धूप नहीं फेंकता। नीम का पेड़, गुलमोहर, शहतूत, हरी घास सब है वहाँ।

सुखबीर ने कुछ कहना चाहा पर बात आह में डूब गई। और उस आह में बस यही था।

"ये रास्ता, ये गाँव, ये खेत, ये जमीन हमारी है। किसी और की नहीं। कोई हमें यहाँ से अलग नहीं कर सकता। हममें से कोई भी अब जिलावतनी नहीं जाएगा"

नींद ने फिर आ कर उसकी पलकों को झुका दिया।


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