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कहानी

एक कप कॉफी
मनोज कुमार पांडेय


मंच पर सुषमा बेहद मनमोहक लग रही थी। जादुई दुनिया रचती हुई एक जादूगरनी। वही हममें अकेली थी जो पैसे और शोहरत दोनों कमा रही थी। कई बार यूरोप में अपनी प्रस्‍तुतियाँ करके आ चुकी थी और दो दिनों बाद ही अमेरिका जा रही थी। आज की प्रस्‍तुति दरअसल उसी की ग्रैंड रिहर्सल थी। वह दुनिया के तमाम देशों में उड़ रही थी और हमारे लिए नेपाल भी अभी तक विदेश बना हुआ था।

सुषमा की प्रस्‍तुति अच्‍छी रही, झमाझम। प्रस्‍तुति खत्‍म होने के बाद मैंने सोचा कि चलूँ सुषमा से मिल लूँ, तब चलूँ। मैं उससे मिलने के लिए बढ़ा तो देखा कि वह लोगों के एक हुजूम से घिरी हुई थी। ऐसे में मुझे अपने गुम हो जाने का डर सताने लगता है सो मैंने उससे तुरंत मिलने का इरादा मुल्‍तवी किया और सोचा कि बाद में मोबाइल जिंदाबाद।

इसके बाद भी मेरा बार-बार मन होता रहा कि मैं जाऊँ और उससे मिलूँ। उसे उसकी सफलताओं के लिए मुबारकबाद दूँ। आखिर उसने हमें याद तो किया। बुलाया तो। पर मैं कमतरी के एक बेचैन एहसास से घिरा रहा। फिर मैंने इस एहसास से मुक्ति का उपाय खोज निकाला। मैंने सोचा कि मैं चलकर उससे मिलूँ और भरतनाट्यम तथा फिल्‍मी गीतों के बेमेल गठबंधन के लिए उसका मजाक उड़ाऊँ। यह कुंठा से उपजी क्रूरता थी। मैं ऐसा कर भी गुजरता पर मुझे लगा कि वह समझ जाएगी कि मैं ऐसा क्‍यों कर रहा हूँ। सो मैं बाहर निकल आया, जेब से सिगरेट निकाली और धुआँ धुआँ होने लगा।

सामने ही गरिमा, बीनू और नबीला थीं। सुषमा की चौकड़ी की बाकी तीन कड़ियाँ। इस चौकड़ी की पाँचवीं कड़ी कभी मैं हुआ करता था। मैंने मन ही मन में सुषमा को शुक्रिया कहा कि उसने हम चारों को बुलाया। दरअसल मैंने उन तीनों को बहुत दिनों के बाद देखा था यानी कहानी कॉफी की तलब से बहुत पहले से शुरू होती है।


सुषमा, नबीला, गरिमा, बीनू और मैं। हमारी दोस्‍ती पूरे विभाग में मशहूर थी। दीन-दुनिया से एकदम अलग हम आपस में ही गुम रहते। हमको दोस्‍ती के लिए कभी किसी और की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। हम हमेशा साथ में मगन रहते। साथ पढ़ते, साथ उठते-बैठते, साथ में चाय-कॉफी पीते, साथ में फिल्‍म जाते, विंडो शॉपिंग करते, आर्चीज की गैलरी में कार्ड छाँटते - भला किसके लिए। ऐसे ही अपने लिए, हम सबके लिए।

मैं अपनी इन प्‍यारी दोस्‍तों के साथ इतना रहता कि विभाग के लड़के मुझे भी लड़की ही मानकर चलते और उन चारों के साथ मुझे भी छेड़ते। मुझे कभी कोई एतराज न हुआ। सच ही मैं अपनी इन दोस्‍तों के ही रंग-रूप में ढल गया था और उन दिनों उन चारों ने मुझे शायद ही कभी अपने से अलग माना हो। मेरे सामने किसी भी तरह की परेशानी शेयर करने में उन्‍हें कभी कोई दिक्‍कत नहीं हुई। हम जितनी सहजता से आमिर खान और अभिषेक बच्‍चन के बारे में बातें कर सकते थे उतनी ही सहजता से पीरियड के दौरान होनेवाली परेशानियों पर भी। हम एक-दूसरे के हाथों में हाथ डालकर ही नहीं घूमते थे बल्कि एक-दूसरे के सिर, हाथ और पैर भी दबाते रहते थे।

यह थी हमारी दोस्‍ती। हमारी छोटी-छोटी रुचियाँ जैसे मुझे पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशित ब्रह्मांड से जुड़ी तस्‍वीरें और थोड़ी अजब-गजब किस्‍म की तस्‍वीरें इकट्ठा करने का शौक था। चारों में से जो कोई ऐसी तस्‍वीरें कहीं पाता काटकर मेरे लिए सुरक्षित कर लेता। नबीला खूब फिल्‍में देखती थी। सुषमा को फिल्‍मों का कोई शौक नहीं था फिर भी ऐसी एक भी फिल्‍म नहीं होती थी जो हम देखते और हमारे साथ वह न देखती। ऐसे ही सुषमा के साथ हम भरतनाट्यम और कथक भी देख आते, भले ही हमें वहाँ कुछ खास समझ में नहीं आता था। बीनू को उसके भाई ने गुटखे की लत लगा दी थी। वह जब भी गुटखा खाने लगती हम चारों गाते - भाई नहीं कसाई है गुटखे की लत लगाई है। हारकर बीनू ने गुटखा छोड़ ही दिया। यह और बात है कि बाद के दिनों में हमने सिगरेट के सुट्टे भी मारे।

लेकिन वक्त बदलता है और अपने साथ वह हमें भी बदलता जाता है। हम ऐसा कोई इंतजाम नहीं कर सके कि हम ताजिंदगी साथ रह पाते सो हम धीरे-धीरे बिछड़ने लगे। सबसे पहले बीनू ने साथ छोड़ा। वह रिसर्च के लिए इलाहाबाद चली गई क्‍योंकि उसके पापा का ट्रांसफर इलाहाबाद हो गया था उसकी रिसर्च भी नहीं पूरी हो पाई थी कि उसके पापा ने उसकी शादी कर दी और वह मिस बीनू से मिसेज शर्मा बनकर लखनऊ वापस आ गई। उसने रिसर्च बीच में छोड़ दिया और बी.एड. के लिए बनारस चली गई। बी.एड. करके लौटी तो फिर से रिसर्च ज्‍वाइन किया। ऐसे ही उसने नेट भी किया और अब प्राइमरी पाठशाला से लेकर विश्‍वविद्यालय तक नौकरी के लिए हाथ-पाँव मार रही है। सुषमा हमारी दोस्‍ती के बहुत पहले से ही भरतनाट्यम सीख रही थी। अब वही भरतनाट्यम उसके काम आ रहा है। उसने भरतनाट्यम के साथ कुछ लोकप्रिय फिल्‍मी गीतों का फ्यूजन तैयार किया और देखते-ही-देखते बाजार में एक खुमार बनकर छा गई। देश-विदेश में एक के बाद एक शो। अभी पिछले महीने ही उसका दूसरा एल्‍बम बाजार में उतरा जो जैसे जादू के जोर से देखते-ही-देखते गायब हो गया। गरिमा शादी करके दिल्‍ली चली गई और हाउस वाइफ बन गई। नबीला ने पिछले तीन सालों में यूनीक से लेकर यूनिवर्स तक सब कुछ चाट डाला है। प्रतियोगिता दर्पण, प्रतियोगिता किरण, योजना, कुरुक्षेत्र, द हिंदू से लेकर रोमिला थापर, इरफान हबीब और श्‍यामाचरण दुबे तक उसने सब कुछ इस तरह हजम कर डाला है कि उसका हाजमा खराब हो गया है। वह केंद्रीय सिविल परीक्षाओं से लेकर एस.एस.सी. तक की तैयारियाँ एक साथ कर रही है। कभी प्रि, कभी मेन्‍स, कभी इंटरव्‍यू, बस इसके आगे कुछ भी नहीं। कभी की हाजिरजवाब चुलबुली नबीला, पहले वाली नबीला लगती ही नहीं। कभी हम दोनों की तुर्की-ब-तुर्की खूब जमती थी पर आज हम दोनों की ही चमक गायब हो चुकी है। नबीला की आँखों के नीचे काली झाँइयाँ पड़ रही हैं। चेहरे पर हमेशा दिखनेवाला उल्‍लास पता नहीं कहाँ गुम हो चुका है। वही मैं, जो पहले बात-बात पर भड़क उठता था अब 'कूल' हो गया हूँ क्‍योंकि मैं एक तरह की फ्रीलांसिंग कर रहा हूँ जिसके लिए 'कूल' होना पड़ता है। इसके बिना कोई पास भी नहीं फटकने देता।

मैं आजकल एक के बाद एक एन.जी.ओ. की सैर कर रहा हूँ। छोटे-छोटे प्रोजेक्‍ट्स और अस्‍थायी नौकरियाँ। ना बेरोजगारी स्‍थायी है ना बारोजगारी, बस किसी तरह जीवन चल रहा है घिसट रहा है। उधर घर पर पिताजी मेरी किसी तरह से घिसट रही गाड़ी में एक और डिब्‍बा जोड़ने पर तुले हैं।

हम जो एक समय उड़ते रहते थे। बड़ी-बड़ी ऊँचाइयाँ-गहराइयाँ नापने का ख्‍वाब देखा करते थे। अब उनके बारे में सोचकर भी हमारा जी घबराता है। उल्‍टी आती है। जैसे हमारी आँखों में दम ही नहीं बचा। जैसे हमारे पास पैर ही नहीं रहे। जैसे हम मरी हुई मछलियाँ हों जो मरने के बाद गहराइयों से ऊपर सतह की तरफ उछाल दी गई हों सड़ने के लिए। जैसे हम खूब-खूब ऊपर उड़ रहे हों और किसी ने हमारा पंख ही काट दिया हो। गिरना हम सबकी नियति है। ज्यादा यह हो सकता है कि नबीला आई.ए.एस. की कुर्सी पर गिर जाय पर इस बीच जो कुछ हमारे भीतर का मर चुका है वह तो मरा ही रहेगा।


सामने तीनों खिलखिला रही थीं और खुश लग रही थीं जबकि मैं अपने भीतर उदासी का एक स्‍ट्रोक मार चुका था। मुझमें साहस नहीं हुआ कि मैं उन लोगों के पास जाऊँ। मैंने गेट की तरफ अपने कदम बढ़ाए ही थे कि पीछे से आवाज आई, 'अरे हुजूर ऐसी भी क्‍या बेरुखी। जरा एक नजर इधर भी डालते जाओ।' यह नबीला थी। हमेशा से ऐसी ही।

अब बचकर निकलना मुमकिन नहीं था। पहले मैंने सोचा कि कह दूँ कि मैंने उन सबको देखा ही नहीं था पर तुरंत ही लगा कि यह घिसा-पिटा अंदाज तो यहाँ चलने से रहा सो उन्‍हें उन्‍हीं के अंदाज में जवाब देते हुए बोला कि, 'एक साथ तीन-तीन परियों से टकराने की हिम्‍मत नहीं थी ना इसलिए।'

'डरो मत, हम अपनी बारी आपस में तय कर लेंगे।' यह बीनू थी।

'ये तो ठीक है, पर यह भी सोचा है कि मेरा क्‍या होगा?'

'चुप कर बेशरम लड़के।' फिर से बीनू। 'चलो कहीं बाहर चलते हैं।'

'कहाँ?'

'कहीं भी।'

'तू सामने खड़ा सिगरेट पी रहा था। मेरा भी बहुत मन कर रहा है। महीने भर तो हो गए होंगे कम-से-कम।' फिर से नबीला।

'चल कार में बैठकर पीते हैं।' बीनू।

'नहीं बाबा कार में नहीं।' यह मिसेज गरिमा हैं।

'क्‍यों?' बीनू।

'घर जाते ही पापा को कार ले जानी है।' गरिमा।

'अरे चल, अंकल को पता थोड़े न चलेगा और चल भी गया तो तू भी तो एक बच्‍चे की मम्‍मी बन चुकी है।' बीनू।

'अंकल कुछ कहेंगे थोड़े ही।' नबीला।

'ना बाबा। पापा वैसे भी कहाँ कुछ कहते हैं। उनका एक नजर डालना ही काफी होता है।' गरिमा।

'कोई प्रॉब्‍लम न हो तो तुम लोग मेरे कमरे पर चल सकते हो। यहीं बगल में ही है।' मैं।

'हुजूर बंदापरवर हुआ क्‍या है आपको? हमें भला क्‍यों प्रॉब्‍लम होने लगी। हाँ हुजूर को हो तो...।' नबीला।

रास्‍ते में सिगरेट का पैकेट और स्‍वीटी सुपारी लेते हुए हम कमरे पर पहुँचे। थोड़ी देर बाद कमरे के भीतर धुआँ-ही-धुआँ दिखाई पड़ रहा था।

'आहा! मुझे तो दो फूँक में ही चढ़ गई। आज कितने दिनों बाद पी रही हूँ।' नबीला बोली, 'सुनील तुम भी लो ना।'

'नहीं मेरा मन नहीं है। मैंने अभी तो पी थी।' मैंने कहा।

'अरे छोड़ ना उसे। तीन-तीन लड़कियों के बीच में है तो सिगरेट क्‍यों लेगा! लड़की लेगा ना।' बीनू।

'तीन-तीन लड़कियाँ। वो भी नशे में।' नबीला।

'सिगरेट का नशा?' मैं।

'नशा तो नशा है जानेमन। अपने साथ हमेशा बहकने की गुंजाइश लेकर आता है।' नबीला।

'सुनील खुश रह। तेरे बाल-बच्‍चे जिएँ। तूने तो मस्‍त कर दिया।' बीनू।

'ओय, बाल-बच्‍चों के लिए एक अदद बीवी की जरूरत होती है। वो कहाँ है?' मैं।

'अरे चिंता काहे को करता है पुत्‍तर आ ही जाएगी।' बीनू।

'ऐसे ही देवियों को चढ़ावा चढ़ाता रह।' नबीला।

'अच्‍छा चलो उठो भी तुम लोग। अब चलते हैं। अभी रास्‍ते में भी कुछ काम है और आठ बजे तक पापा को गाड़ी भी देनी है।' गरिमा।

'इतनी जल्‍दी?' मैं।

'और क्‍या अभी तो हम बैठे ही हैं।' नबीला।

'तो?' गरिमा।

'आज इतने दिनों बाद हमें एक साथ मिलने की खुशी मिली है, बस धुआँ उड़ाकर ही अलग हो जाएँगे?' बीनू। 'चलो कहीं कॉफी-वॉफी पीते हैं।'

'कॉफी! कहाँ?' गरिमा।

'कहीं भी। आसपास किसी भी अच्‍छी जगह।' बीनू।

'देर नहीं होगी।' गरिमा।

'चुप कर। पहले ही बहुत देर हो चुकी है।' नबीला।

पल भर बाद हम कार में थे। और मनहर कैफे कपूर‍थला की तरफ बढ़ रहे थे।


'एइ बीनू, सामने उस आदमी को देख न, एकदम भूत लग रहा है।' नबीला।

'कहाँ मुझे दिखाओ, मैंने बहुत दिनों से कोई भूत नहीं देखा।' मैं।

'क्‍यों, मैं हूँ तो सामने।' नबीला।

'तुम तो चुड़ैल हो। मैं भूतों की बात कर रहा था।' मैं।

'तो कभी-कभी आईना देख लिया करो। वैसे तुम यह बताओ कि क्‍या कोई चुड़ैल मेरी जितनी हसीन हो सकती है?' नबीला।

'और क्‍या। बल्कि चुड़ैलें ही इतनी हसीन हो सकती हैं कि शिकार अपना लहू टपकाता जिगर लिए खुद-ब-खुद उनके आगे-पीछे घूमे।'

'ऐ गरिमा, देख के गाड़ी चला। तेरे तो बच्‍चा भी हो गया। मेरा तो अभी कन्‍यादान भी नहीं हुआ।' नबीला।

'कौमार्यदान तो हुआ है ना।' बीनू।

'चुप बत्‍तमीज।' नबीला।

'नबीला तू पिक्‍चर चल ना किसी दिन। कोई फिल्‍म देखे कितना दिन हो गया।' बीनू।

'यार ऐसी बातें पब्लिकली क्‍यों कहा करती है। कान में कहा कर।' नबीला।

'नबी, तू पब्लिक किसे कह रही है?' मैं।

'मैंने कुछ नहीं सुना।' गरिमा।

'तब ठीक है।' नबीला।

'क्‍या ठीक है, तुम लोग सनीमा जाने का प्रोग्राम बना रहे हो, मुझे पूछा भी नहीं।' मैं।

'सनीमा!' ये क्‍या है?' गरिमा।

'वही जिसमें सनम के बारे में बातें होती हैं और अँधेरे से हॉल में बहुत सारे लोगों के साथ बैठकर बड़े से सफेद पर्दे पर देखा जाता है।'

'बोर मत कर पुत्‍तर बता ना क्‍या देखना है तुझे।' बीनू।

'मुझे 'गरम मसाला' देखनी है।' मैं।

'तुझे हो क्‍या गया है सुनील? तुझे और कोई फिल्‍म नहीं मिली। तुझे पता है ना कि मुझे अक्षय कुमार को देखकर भी उल्‍टी आती है।' नबीला।

'पता नहीं, पर आज सुबह से ही मेरे साथ कुछ गड़बड़ है। सुबह सुडोकू भी पूरा नहीं भर पाया।' मैं।

'सुधर जा बेटा, अब भी सुधर जा।' नबीला।


मनहर कैफे के सामने कहीं कार पार्क करने ही जगह नहीं थी। गरिमा थोड़ा आगे बढ़ गई और आर्यन के सामने कार जा लगाई। कार से उतरकर हम मनहर की तरफ आ ही रहे थे कि 'ऐ दीदी जोड़ी सलामत रहे' कहता हुआ एक लड़का हम लोगों के सामने आ खड़ा हुआ। उसके हाथ में स्‍टील का एक कैन था जिसमें सरसों का तेल पड़ा हुआ था। सरसों के तेल में नीचे दो-चार सिक्‍के चमक रहे थे। लड़का बार-बार मना करने के बावजूद रिरिया रहा था। नबीला से उसकी रिरियाहट बर्दाश्‍त नहीं हुई तो उसने एक सिक्‍का उस लड़के की कैन में डाल दिया और बोली, 'अब चलता बन।'

'बाप रे, लखलऊ तो लगता है अब भिखारियों का ही शहर हो गया है। जिधर जाओ उधर भिखारी ही भिखारी।' गरिमा।

'लखनऊ ही क्‍यों यह देश ही भिखारियों का हो गया है। देखती नहीं हो, हमेशा कोई-न-कोई मिनिस्‍टर कटोरा लेकर अमेरिका या विश्‍वबैंक के सामने खड़ा घिघियाता रहता है।' तुम तो दिल्‍ली में रहती हो, सारे भिखारियों के सरताज वहीं रहते हैं।' मैं।

'बोर मत करो सुनील।' नबीला।

'मैं बताऊँ, एक बार मैं भाई के साथ अमीनाबाद जा रही थी। भाई एक जगह ट्रैफिक पर रुका तो शनि की काली मूरत और सरसों का तेल लिए एक लड़का पास आ गया।

...ऐ बाबू, जोड़ी सलामत रहे। सनीचर महाराज के लिए एक रुपया दान...'

'अरे दूर फेंको इसे। शनि तुम पर सवार हो रहा है। देखो कितने काले हो गए हो तुम। पिछली बार मिले थे तो कितना साफ रंग था तुम्‍हारा।' भाई जोर से डाँटनेवाले अंदाज में बोला। लड़का सकपका गया और तेल का कटोरा उसके हाथ से गिरते-गिरते बचा। वह अपने हाथों को देखने लगा, जैसे इस बीच सचमुच और काला हो गया हो। इस बीच ट्रैफिक खुली और भाई आगे बढ़ गया। भाई बहुत देर तक उस लड़के पर हँसता रहा। पर मैं तो उदास हो गई। पता नहीं क्‍यों वह लड़का मुझे कई दिनों तक याद आता रहा।' बीनू।

'और तो और तुझे एक दिन वह सपने में भी दिखा था न।' नबीला।

'चुप स्‍टुपिड।' बीनू।

'अरे पागल मैं तेरी ही बात तो आगे बढ़ा रही हूँ।' नबीला।

अगल में पाल की गुमटी पर हिप्पियों के ताने-बाने में चार लड़के खड़े थे। अंदाजन सोलह से बीस के बीच की उमर के। एक की दाढ़ी-मूँछ अंखुवाती हुई, बाकी एकदम चिकने, चारों लड़के सिगरेट पी रहे थे और आती-जाती लड़कियों को देखकर पता नहीं क्‍या-क्‍या बातें कर रहे रथे। विस्‍मय और हर्ष भरी अश्‍लीलता से उनके चेहरे फैल-सिकुड़ रहे थे और उनके खड़े होने का अंदाज कुछ इस तरह का था कि इसके लिए उन्‍हें शर्तिया काफी रिहर्सल करनी पड़ी होगी।

किसी का जींस काटा हुआ, कोई उल्‍टी टी-शर्ट पहने। कोनों में इयररिंग और बुंदे और हाथों में मोटी चेन जैसी चीजें उनकी अदाओं को निखारने में सहायक सिद्ध हो रही थी। उनके होठ सिसकारी लेने के अंदाज में लगातार गोल और लंबे हो रहे थे। इस क्रम में उनके सूख रहे होठों को जीभ बार-बार तर रही थी।

'लखनऊ में कितने लोफर बच्‍चे पैदा हो गए हैं। क्‍या होगा इन सबका?' नबीला।

'होगा क्‍या, वही होगा जो हमारा हो रहा है। कुछ को तो वक्त की मुश्किलें सुधार देंगी, जो नहीं सुधरेंगे वे नेताओं और पुलिस के चमचे बनकर हमें लूटेंगे और ऐश करेंगे।' मैं।

'सुनील यही दिक्‍कत है तुम्‍हारी। हमेशा पॉलिटिकल कमेंट्स देने लगते हो और हमेशा नेताओं की तरह सतहीं बातें किया करते हो। क्‍या ऐश करेंगे ये, ज्यादा-से ज्यादा ये सिस्‍टम की बिसात पर कुछ गोटियाँ भर बन सकते हैं। और सिस्‍टम जब चाहेगा, इनका सर कलम कर देगा।' नबीला।

'कॉफी आ गई। लो कॉफी पियो और चुप करो। इतने दिनों बाद मिले हैं तो यही लड़ाई करने के लिए।' बीनू।

'पता है नबी पिछली बार दिल्‍ली आई तो इसके पास सिर्फ दो दिन थे। जिसमें से एक दिन तो ऐसे ही बोलते बतियाते निकल गया और दूसरे दिन के लिए हमने तीन विकल्‍पों पर विचार किया। राजेश अपने ऑफिस टूर पर था सो हमने सोचा कि हम डिस्‍को जाएँगे और जी भर के नाचेंगे या फिर हम लालकिला जाएँगे...' गरिमा।

'और झंडा फहराएँगे।' मैं।

'तुम तो बीच में मत ही बोलो।' गरिमा। 'फिर हम कहीं नहीं गए। हम घर पर ही रहे। जी भर के दारू पी। उससे ज्यादा जी भर के बातें कीं। फुल वॉल्‍यूम में गाने लगाकर नाचे। नाचते-नाचते गिरे और सो गए।'

फिर वे तीनों आपस में बातें करने लगीं। पता नहीं क्‍यों मेरा मन कर रहा था कि मैं वहाँ से उठूँ और निकल जाऊँ। हम बेहद अटपटी बातें कर रहे थे। हम आपस में एक-दूसरे के इतने करीब रहे थे और आज हम आपस में ढंग से बात भी नहीं कर पा रहे थे। बातचीत के नाम पर लगातार इधर-उधर घूम रहे थे और वल्‍गर हो रहे थे।

मैं उन तीनों के परे इधर-उधर देखने लगा। मेरे सामने एक सत्रह-अठारह साल की मासूम-सी लड़की स्‍कूटी पर बैठी थी। उसके बाल छोटे थे और दोनों तरफ कानों पर चढ़े हुए थे। वह जींस और जैकेट पहने हुए थी। कभी-कभार वह यहाँ-वहाँ देखती फिर सामने शून्‍य में देखने लगती। मैं बहुत देर तक उस लड़की को देखता रहा और थाह पाने की कोशिश करता रहा कि लड़की क्‍या सोच रही होगी। आखिर में मैंने एक आसान से जवाब पर टिक किया कि वह अपने प्रेमी की राह देख रही होगी पर तुरंत ही मैंने अपने इस जवाब को खारिज कर दिया। अब मैंने सोचा कि हो सकता है कि कोई उसे ब्‍लैकमेल कर रहा हो, शायद इसीलिए वह घड़ी भी नहीं देख रही है। चेहरे पर किसी तरह के इंतजार की उत्‍सुकता नहीं, कोई झल्‍लाहट नहीं बस एक मासूम-सी मायूसी। जरूर यही बात होगी। उसे इंतजार तो होगा पर किसी ऐसे व्‍यक्ति का जिससे कि वह मिलना नहीं चाहती बल्कि वह तो चाहती होगी कि वह आए ही नहीं। कभी न आए। उसका एक्‍सीडेंट हो जाए। उसके ऊपर बिलजी गिरे। कहीं से एक गोली आए और उसके सीने के पार हो जाए। उसका बेड़ा गर्क हो। पर शायद वह अपनी इन कामनाओं की हकीकत जानती हो इसीलिए इतनी चुप, इतनी मायूस।

मैं उस लड़की के लिए दुखी हो गया। दुखी होते ही वह मुझे और भी मासूम और प्‍यारी लगने लगी। ठीक इसी क्षण पता नहीं कहाँ से मेरे मन में ये खयाल आया कि वह लड़की न होती या फिर इतनी हसीन और मासूम न होती तब भी क्‍या मुझे उसके लिए दुख होता?

'सुनील तुम लड़कियों को कब से घूरने लगे। घूरना ही है तो हम तीन कम हैं क्‍या?' नबीला।

'चुप करो। मैं लड़की को भला क्‍यों घूरूँगा।'

'क्‍यों, तुम लड़की को नहीं घूरोगे तब भला किसे घूरोगे? बाइ द वे तुम उधर देख क्‍या रहे थे?' नबीला।

'मैं... मुझे लग रहा है कि इसकी स्‍कूटी के पिछले पहिए में हवा कम है। ऊपर से इसने हेलमेट भी नहीं ले रखी। इसका चालान कट गया तो...'

'ओय-होय... बड़ी चिंता रही है हुजूर को उसकी। हुजूर बंदापरवर कभी-कभी इस बंदी की भी चिंता कर लिया करें।' गरिमा।

'सुनील क्‍या तुम अब भी विचित्र किंतु सत्‍य टाइप की तसवीरें जमा करते हो?' गरिमा।

'कभी-कभी। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं खुद 'विचित्र किंतु सत्‍य' बनता जा रहा हूँ।'

'कौन-सी नई बात कर रहे हो। मैं तो तुम्‍हें जब से जानती हूँ तब से ऐसे ही हो।' नबीला।

'अच्‍छा तू बता नबी, तेरा क्‍या हाल? अब भी तू आमिर खान की वैसी ही दीवानी है?' मैं।

'नहीं। अब फिल्‍में देखने थियेटर नहीं जा पाती। कभी-कभी घर में ही डी.वी.डी. लाकर देख देती हूँ पर अब वैसा क्रेज नहीं रहा। बाहर निकलना पैसे और समय दोनों की बर्बादी है। अब इतना समय कहाँ कि बर्बाद करें।' नबीला।

'नबी हो क्‍या गया है हम लोगों को? इस सुनील को देख कैसी मनहूसों-सी बात कर रहा है। तेरे पास आमिर खान के लिए भी समय नहीं बचा। खुद मैं... मुझे याद नहीं पिछली बार कब आर्चीज गई थी... कब आइसक्रीम खाई थी... और कब हँसी थी। उधर सुषमा को देख कहाँ-से कहाँ पहुँच गई। उसमें ऐसा क्‍या था जो हम लोगों में नहीं था... क्‍या है उसमें ऐसा सुनील जो हम चारों में किसी के पास नहीं?' बीनू।

'छोड़ ना बीनू, तू जैलस हो रही है।' मैं।

'नहीं मैं जैलस नहीं हो रही हूँ। मैं समझना चाहती हूँ। आज जैसे और जो हम हैं यह तो नहीं होना चाहते थे... फिर ऐसे क्‍यों हैं हम?' कभी-कभी तो मुझे लगता है कि सुषमा के बारे में लोग जो कुछ भी कहते हैं, वह सच है।'

'क्या कहते हैं?' मैं, नबीला।

'कि वह ब्‍यूरोक्रेट्स और मिनिस्‍टर्स के लिए उनके बेडरूम में भी भरतनाट्यम करती है।'

'बीनू माइंड योर लैंग्‍वेज। तुम जलन में वल्‍गर हो रही हो और वाहियात बातें कर रही हो। तुम अपनी असफलता की फ्रस्‍टेशन सुषमा पर क्‍यों निकाल रही हो। हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें उसकी क्‍या गलती।' नबीला।

'गलती है। आज उसके पास हमारे लिए समय नहीं है। कल को वह हमें पहचानना भी बंद कर देगी।'

'तो... हो सकता है सचमुच उसके पास समय कम हो। तू ही बता... वो लखनऊ में कितना रहती है और ये बता बीनू कि क्‍या हम सब अपने लिए सुषमा जैसी स्थिति नहीं चाहते?' नबीला।

'नबी, सुषमा को छोड़, वो तो अभी साथ भी नहीं है ना।' बीनू।

'तो?' नबीला।

'लेकिन हम साथ हैं। कितने दिनों के बाद आज साथ हैं। चल किसी दिन फिल्‍म चलते हैं। हम सब साथ-साथ। अभी गरिमा भी आई है। ...जो बीच में है ही नहीं, चाहे जेनुइनली चाहे जान-बूझकर... हम क्‍यों करें उसकी इतनी बातें। मैंने की, मुझसे गलती हुई। सुषमा का क्‍लास बदल गया है अब। पर हम तो अभी एक जैसे हैं। चल न किसी दिन हम पूरा दिन साथ-साथ बिताते हैं।' बीनू।

'पंद्रह दिन बाद ही मुझे सिविल का मेन्‍स देना है। दे लूँ फिर चलते हैं किसी दिन।' नबीला।

'छोड़ नबी ये मेन्‍स-वेन्‍स का चक्‍कर...।' मैं।

'क्‍यों छोड़ दूँ, वही एक रास्‍ता है जो मुझे अपने मन की जिंदगी दे सकता है। रोज दस-दस घंटे पढ़ाई कर रही हूँ मैं। घर के काम अलग। अब्‍बू लगातार कहने लगे हैं कि बंद करो पढ़ाई-वढ़ाई। निकाह करो और अपने घर जाओ। सारे कजिन्‍स की शादियाँ हुई जा रही हैं। उनको लगता है कि कल को मुझे कोई शौहर ही नहीं मिलेगा। आजकल किताबों और मैगजीन्‍स के लिए भी अब्‍बू से पैसा माँगने में डर लगता है कि फिर वही शादी-ब्‍याह का रोना शुरू कर देंगे। चलो शादी करो और कैद हो जाओ घर, मियाँ और बच्‍चों के बीच।'

'सचमुच समय ने कितना बदल दिया हमें। आज के पाँच साल पहले हम इक्‍जाम के दो दिन पहले भी दिन भर मटरगश्‍ती कर सकते थे और आज...' मैं।

'तुम पाँच साल पहले के ही समय पर क्‍यों झूलते रहते हो? हमारी वही लापरवाही हमें आज भारी पड़ रही है। तुम जो दो-दो पैसे के कामों के लिए एक से दूसरे एन.जी.ओ. का चक्‍कर लगाया करते हो... छोड़ो जमाना बहुत बदल गया है मेरी जान। उस पुरानी मस्‍ती की बात करने में भी आज जोखिम है।' नबीला।

मेरे भीतर कुछ टूट-सा गया। नबी उन पलों को लापरवाही कह रही थी जो हमारे जीवन के सबसे खूबसूरत पल रहे हैं। क्‍या हमारी दोस्‍ती गलत थी। या साथ में की गई हमारी मस्तियाँ, बदमाशियाँ, पूरे किए शौक सब कुफ्र थे? क्‍या हम आज इसीलिए तबाह हो रहे हैं क्‍योंकि हमने भारत सरकार के तमाम पाठ्यक्रमों का गहराई से अध्‍ययन नहीं किया। नबी ऐसा समझती हो तो समझे... मैं नहीं मानता।

गरिमा का फोन आ गाया था। वह तुरंत जाने के लिए उठी। नबी का घर गरिमा के रास्‍ते में पड़ता है। गरिमा ने नबी से कहा कि वो भी साथ चले, वह उसे घर छोड़ती हुई निकल जाएगी। नबी तुरंत तैयार हो गई। हमने एक-दूसरे से बॉय किया और अलग हो गए। नबी और गरिमा निकल गए तो मैं और बीनू भी कपूरथला चौराहे की तरफ बढ़े। हम दोनों चुप थे। एक घनी उदासी हम पर तारी हो चुकी थी। दोनों ही अपने भीतर घुसे हुए थे।

'रिक्‍शा कर लें?' मैंने पूछा।

'नहीं आओ, थोड़ा पैदल चलते हैं। पहले खूब पैदल चलती थी। अब कोई साथी नहीं मिलता।' बीनू।

सुनील, थोड़ा धीरे चलो ना। तुम लड़के कितना तेज चलते हो। पंकज के साथ भी ऐसा ही है। साथ चलते हुए वह बार-बार आगे निकल जाता है। उसे बार-बार टोकना पड़ता है और टोकने पर कहता है कि धीरे ही तो चल रहा हूँ।

'क्‍या हाल हैं पंकज के?' मैं।

'ठीक ही है। ...सुनील कहीं कुछ हो तो बताना। मेरी रिसर्च भी अब पूरी हो गई है। कोई फैलोशिप या ओर कोई काम, किसी एन.जी.ओ. में ही सही। तुम्‍हारा परिचय तो तमाम एनजीओज में होमा। शादी के बाद अब पापा से कुछ माँगते नहीं बनता। पंकज को तुम जानते ही हो। इनलाज को भी लगता है कि रोज-रोज सजधज कर जाती है। कमाना कुछ नहीं खर्चे हजार। कम-से-कम अपना खर्च तो मुझे उठाना ही चाहिए।'

मैं भी अपनी स्थितियों पर आ गया।

'घर में सबसे बड़ा हूँ। पिताजी इसी साल रिटायर हो रहे हैं। अभी उन्‍हें दो बहनों की शादी भी करनी है। भाइयों की पढ़ाई का खर्च अलग। सीधे तो नहीं कहते पर इशारों में कई बार कह चुके हैं कि कम-से-कम भाइयों की पढ़ाई का खर्च उठा लूँ। तुम्‍हीं बताओ, मेरे लिए यह मुमकिन है क्‍या?

'सिर्फ छ हजार पाता हूँ। उसी में मकान का किराया, खाना-पीना, रोज-रोज के खर्चे। अपना ही खर्च पूरा नहीं पड़ता, घर की मदद कहाँ से करूँ। दो महीने बाद ये प्रोजेक्‍ट भी खत्‍म हो रहा है। कुछ नया काम हाथ में नहीं आया तो ये छ हजार भी हाथ से जा रहे हैं।'

हम दोनों फिर से चुप हो गए। महानगर आया तो हम ऑटो में बैठ गए। मुझे लगा कि मुझे अपनी पीड़ा उससे नहीं कहनी चाहिए थी। शायद वह भी ऐसा ही कुछ सोच रही हो।

एच.एल. आया तो वह बॉय सुनील फिर मिलते हैं बोलती हुई उतर गई।

मैंने भी बॉय कहा।

अभी थोड़ी देर बाद अरावली मोड़ आएगा और मैं भी उतर जाऊँगा।


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ