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सिनेमा

जीरो बजट फिल्में यानी फिल्मों की दूसरी दुनिया
महेश्वर


इन दिनों दिनों सुजॉय घोष की शार्ट फिल्म 'अहिल्या', जयदीप सरकार की 'नयनतारा'ज नेकलेस' और फराज अली की ' मखमल' ने खूब वाहवाही बटोरी है। 2004 में जब अश्विन कुमार की शार्ट फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार के लिए लाइव एक्शन शार्ट फिल्म कैटेगरी में नामांकित किया गया था तो हमें देश में बननेवाली शार्ट फिल्मों के प्रभाव का पता चला था। इधर के दिनों में बड़े पर्दे पर कामयाब निर्देशक भी शार्ट फिल्मों में रुचि दिखा रहे हैं। अनुराग कश्यप, करण जौहर आदि ने भी कई शार्ट फिल्में बनाई हैं। अनुराग कश्यप तो इसे पॉकेट सिनेमा की संज्ञा देते हैं। इधर के दिनों में मुहम्मद आसिम क़मर की 'हमसफर', रामचंद्र गावंकर की 'सेल्फी', लव पाठक का 'जूता' संदीप कुमार का ' पीओवी', अनुराग कश्यप का 'डे आफ्टर एव्रीडे', नीजो जॉनसन की 'कैमरा', शैलेंद्र की 'इनबॉक्स ' आदि कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्होंने इस विधा को समृद्ध किया है।

क्या है शार्ट फिल्म

व्यवहारिक स्तर पर देखें तो यह बात सामने आती है कि शार्ट फिल्म और फीचर फिल्मों में वही अंतर है जो कहानी और लघुकथा में है। कम के कम शब्दों में जिस तरह लघुकथा बहुत बड़ी बात कर जाती है लगभग उसी तरह शार्ट फिल्में कम से कम समय में कम से कम संवादों में, कभी-कभी तो संवाद विहीन होते हुए भी बड़ी बात कह जाती है। शार्ट फिल्में हमारा ध्यान उस ओर ले जाती हैं सामान्यतः जिसे हम देखते हुए भी नजरअंदाज कर जाते हैं। शार्ट फिल्मों का यह तेवर हमेशा से रहा है कि वे हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। शायद यही कारण है कि शार्ट फिल्मों के विषय में हमारी समस्याएँ, हमारी संवेदनाएँ और जागरूकता शामिल होती हैं। शार्ट फिल्में अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण हमेशा से हमारा ध्यान खींचती रही हैं। इधर के दिनों में यह विधा इतनी लोकप्रिय हुई है कि इस क्षेत्र में बड़े-बड़े सफल फिल्मकार भी आने लगे हैं। उपरोक्त तीनों फिल्में कामयाब निर्देशकों ने बनाई हैं जिन्होंने बड़े पर्दे पर भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रखी है।

शार्ट फिल्में वास्तव में फीचर फिल्मों की तरह ही छोटी फिल्म होती हैं जो 2 मिनट से लेकर अधिकतम चालीस मिनट तक की हो सकती है। 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी फिल्म स्टडीज' में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट ऐंड साइंस ने लघु फिल्म को परिभाषित करते हुए कहा है कि वह फिल्म जो चालीस मिनट से कम की हो जो फीचर फिल्म की तुलना में यह काफी छोटी होती है। लघु फिल्मों में ऐनीमेटेड शार्ट फिल्म और लाइव एक्शन शार्ट फिल्म आती है।''

देश में मात्र हिंदी में ही एक लाख से ज्यादा शार्ट फिल्में बन जाती होंगी। इस में मीडिया से जुड़े विद्यार्थियों की संख्या अधिक है। शार्ट फिल्म खासकर महिलाओं की समस्याएँ, बच्चों की समस्याएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, जन-जागरूकता और मनोवैज्ञानिक होते हैं। जो इन विषयों के पीछे छिपे पहलू पर रोशनी डालते हैं। हमें सतर्क करते हैं, जागरूक करते हैं।

शार्ट फिल्मों का भविष्य

यू ट्यूब, सोशल नेटवर्क, मोबाइल आदि के कारण इस विधा को बहुत बल मिला है। यह विधा न सिर्फ समस्याओं को सामने लाने का का माध्यम है बल्कि अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का भी। सिनेमा के क्षेत्र में आनेवाले लोगों के लिए एक पाठ की तरह है जहाँ वे इसकी बारीकियों को सीखते हैं। दो से लेकर 40 मिनट तक के ये फिल्म हमें सोच की उस धरातल पर ला खड़ा करते हैं जहाँ से आगे की यात्रा हमें अकेले ही तय करनी पड़ती है। शार्ट फिल्मों के व्यावसायिक पक्ष को देखा जाए तो देश में इसकी कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखती। न तो इसकी बिक्री होती है और न ही इसको प्रदर्शित करनेवाला कोई सिनेमा हॉल। इन्हें न ही कहीं से फंड ही मिलता है। ये जीरो बजट फिल्में होती हैं जिसे दो-चार लोग मिलकर बनाते हैं। जो खुद ही स्क्रिप्ट लिखते हैं, एक्टिंग करते हैं, निर्देशन करते हैं और एडिट करते हैं।

इधर के दिनों में शार्ट फिल्में बनाना बहुत ही आसान हो गया है, आपके पास यदि एक डीएसएलआर कैमरा हो तो आप भी फिल्म बना सकते हैं। कायदे से शार्ट फिल्में एडिटिंग टेबल पर बनती हैं। कोई नया कन्सेप्ट हो, एक कैमरा हो तो फिल्म बनाना आसान है। शार्ट फिल्में कन्सेप्ट के कारण ही पसंद की जाती है और विभिन्न माध्यमों से होती हुई जन-जन तक पहुँचती है।

आने वाले दिनों में शार्ट फिल्मों के क्षेत्र में क्रांति आनेवाली है इस बात का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ तो बात है इस विधा में वरना बड़े पर्दे पर कामयाब जैकी श्रॉफ, कोंकणा सेन शर्मा, राधिका आप्टे, इरफान, नवाजुद्दीन जैसे कलाकार इनमें काम क्यों करते।

इतना होने के बावजूद भी देश में शार्ट फिल्मों का भविष्य कैसा है इस पर विचार किया जाना बहुत आवश्यक है। हमने देश में सिनेमा ने सौ वर्ष का सफर तय कर लिया है। हमारा सिनेमा एक अलग स्थान पर खड़ा है। हमने विश्व स्तर की फिल्में भी बनाई हैं। विदेशों में हमारे सिनेमा के करोड़ों दर्शक मौजूद हैं। बावजूद इनके हम कोई ऐसी संस्था कायम नहीं कर पाए हैं जो शार्ट फिल्मों को संरक्षण दे। हाँ सरकारी स्तर पर राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना सरकार ने जरूर की है और। निजी स्तर पर कुछ संस्थाएँ अवश्य शार्ट फिल्म को प्रश्रय और प्रोत्साहन देती हैं, लेकिन वे भी सिर्फ शार्ट फिल्म फेस्टिवल करा कर ही अपना कर्तव्य पूरा हुआ मान लेती हैं।

कुछ चुनिंदा शार्ट फिल्में

अश्विन कुमार की 'लिटल टेरेरिस्ट' खेल-खेल में बॉल के लिए सीमा पार आए एक पाकिस्तानी बच्चे की कहानी है जिसे भारतीय सैनिक आतंकवादी मानकर सीमा से सटे गाँव में खोज करते हैं। उसे गाँव का एक शिक्षक अपने घर में पनाह देता है और रात में उसे सीमा पार कराने का सफल प्रयास करता है।

नीजो जॉनसन की शार्ट फिल्म 'कैमरा' हमें मुस्कराना सिखलाती है। 17 मिनट की यह फिल्म कूड़ा बुननेवाले बच्चे अर्जुन की कहानी है जिसे एक दिन कूड़े में कैमरा मिल जाता है। वह और उसका दोस्त उस कैमरे की नजर से सारी दुनिया को देखने का प्रयास करते हैं। कहानी यह बतलाती है कि हमारे जीवन में चाहे जितने भी कष्ट हों जब हम कैमरे के सामने आते हैं तो हम सब कुछ भूलकर मुस्करा ही पड़ते हैं। इस फिल्म को नेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल, नागपुर में पुरस्कार भी मिला है। इसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवलों में भी सम्मानित किया गया है। इसी तरह दूसरी फिल्म है 'सेल्फी', रामचंद्र गावंकर की इस फिल्म में सामान्य लोगों के खुद को तलाशने की कोशिश की गई है, फैशन और दिखावे की इस दौड़ में हर व्यक्ति अपने को बेहतर समझता है। आम आदमी की दैनिक समस्याएँ भी किस तरह उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करती है यह दिखाने का सफल प्रयास है यह फिल्म।

'थ्री शेड्स' विवेक जोशी की 5 मिनट की फिल्म है जिसमें यह दिखाने की कोशिश की गई है कि जिस तरंगे झंडे को हम 26 जनवरी और 15 अगस्त को खरीद कर देशभक्ति का सबूत पेश करते हैं वही अगले दिन हमारे किसी काम का नहीं। फिल्म में एक बच्चा रेड लाइट पर झंडे बेचता है, 26 जनवरी को तो सारे लोग झंडे खरीदते हैं। उसी के साथ एक अधेड़ आदमी भीख माँगता है, उसे कोई भीख नहीं देता। अपनी मेहनत से वह झंडे बेचकर काफी पैसा कमा लेता है लेकिन वह अधेड़ नशेड़ी उसका पैसा छीन लेता है। वह बच्चा हिम्मत जुटाकर 27 जनवरी को फिर झंडा बेचने की कोशिश करता है जिसमें उसे नाकामी मिलती है। वह एक भी झंडा नहीं बेच पाता। वह समझ नहीं पाता है कि जो झंडा कल पाँच रुपये में लोग खरीद रहे थे आज उसे दो रुपये में भी कोई नहीं खरीद रहा। छद्म देशभक्ति पर चोट करती यह फिल्म माथे पर शिकन छोड़ जाती है।

मुहम्मद आसीम क़मर की 'हमसफ़र' प्रेम की एक रोमांटिक प्रेम कहानी है। कुल अठारह मिनट की इस फिल्म में प्रेम को कई कोणों से परिभाषित किया गया है।

फ़राज अली की 'मखमल' टूटते दांपत्य को बहुत ही संवेदनशीलता से सामने लाती है। जैकी श्रॉफ और दिव्या शर्मा अभिनित यह फिल्म अंत में इतना भावुक कर देती है कि आप शायद ही अपने आँसू रोक पाएँ। तलाक के बाद पिता और बच्ची का भावनात्मक लगाव कम नहीं हो पाता। बेटी से मिलने के लिए मखमल के कपड़े में कशीदाकारी का व्यवसायी मुख्य पात्र बेटी के मनपसंद पीले रंग के मखमल के कपड़े से जोकर बन कर उससे मिलने उसके पहुँच जाता है। बच्ची उसके साथ खेलती है लेकिन गलती से जब उसके जेब से कार की चाबी नीचे गिरता है तो वह अपने पिता को पहचान लेती है और उससे लिपट जाती है।

राधिका आप्टे अभिनीत 'अहिल्या' और सुजॉय घोष द्वारा निर्देशित 14 मिनट की यह फिल्म सस्पेंस, थ्रिलर और बेहतरीन कहानी से भरपूर है। इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि एक्ट्रेस राधिका आप्टे के पास जो भी व्यक्ति जाता है वह पत्थर बन जाता है। आपको याद दिला दें कि यह फिल्म पौराणिक कथा अहिल्या की कहानी से प्रेरित है। फिल्म अभिनेत्री तिलोत्तमा शोमे को आमतौर पर फिल्मों में गंभीर किरदार निभाने के लिए जाना जाता है लेकिन लघु फिल्म ' नयनताराज नेकलेस' उनके लिए एक अच्छा बदलाव लेकर आई है क्योंकि इसमें उन्होंने दिल्ली की एक भोली-भाली महिला का किरदार निभाया है।

जयदीप सरकार के निर्देशन में बनी शार्ट फिल्म 'नयनतारा का नेकलेस' में बड़े शहरों के लोगों में बढ़ रही असुरक्षा और उनका अपने स्टेटस को बढ़ा-चढ़ाकर दिखावे के साथ पेश करना दिखाया गया है। कोंकणा सेन शर्मा, तिलोतमा शोमे, गुलशन देवैया अभिनीत इस फिल्म की कहानी एक ही बिल्डिंग में रहने वाली दो सहेलियों की है जो एक दूसरे से एकदम जुदा हैं। जहाँ एक तरफ कोंकणा का किरदार एक मॉर्डन घराने की महिला का दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ तिलोतमा एक मध्यम वर्ग की महिला का किरदार निभा रही हैं जिसका सारा ध्यान अपने परिवार की देख-रेख में ही लगा रहता है। यह दिखाने की कोशिश की किस तरह मध्यमवर्ग की महिला मॉर्डन बनती चली जाती है। आखिर इसकी परिणति आत्महत्या में बदल जाती है।

संदीप कुमार की आशीष और विमलचंद्र पांडेय अभिनित पी ओ वी (प्वाइंट ऑफ व्यू) दो भाइयों के सोच पर आधारित है। एक ही माहौल में रहते हुए किस तरह दो अलग-अलग सोच के वाहक बन जाते हैं। इसी तरह लव पांडेय की 'जूता' निराशा से आशा की तरफ आने की कहानी है। बेरोजगार पात्र अपने दोस्त से अपमानित होकर आत्महत्या करने जाता है और फिर वहीं उसको बेरोजगारी दूर करने की तरकीब मिल जाती है। इस तरह शार्ट फिल्मों के बारे में कहा जा सकता है कि 'देखन में छोटन लागे घाव करे गंभीर'।

शार्ट फिल्म फेस्टिवल

दिल्ली, बैंगलोर, गोवा, चेन्नई आदि में समय समय पर शार्ट फिल्म फेस्टिवल आयोजित होते रहते हैं। मुंबई का कालाघोड़ा फिल्म फेस्टिवल इसके लिए बहुत ही प्रसिद्ध है।


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