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कहानी

किस्सा एक त्रासद फंतासी का
धीरेंद्र अस्थाना


वह एक निर्जन जगह थी, जहाँ तूफान की तरह उन्मत्त दौड़ती राजधानी एक्सप्रेस एकाएक रुकी थी। रात के दो बजे थे। चारों ओर अँधेरा और सन्नाटा था - एकदम ठोस। न कोई आहट, न रोशनी की कोई फाँक। राजधानी के किसी डब्बे की खिड़की से किसी संपन्न आदमी ने शक्तिशाली टॉर्च की रोशनी बाहर फेंकी - तभी दिखा था, दूर तक फैला बीहड़। टॉर्च की रोशनी का संतुलन बिगड़ गया। वह ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ थरथराई और फिर बुझ गई। शायद टॉर्च-मालिक का जिस्म भयातुर हो लड़खड़ाया था।

यूँ दोनों बातों में कोई ताल्लुक नहीं था, पर वक्त एक ही था। जिस वक्त राजधानी उस बीहड़ में अचानक रुकी थी, ठीक उसी वक्त राजधानी की एक पिछड़ी बस्ती में अपने किराए के मकान की छत पर उद्विग्न घूमते एक आदमी ने अपने अवसाद के घने अँधेरे में चीत्कार करते हुए सोचा था - बस, बहुत हो चुका। फिर वह अचानक थम गया था।

आदमी पिछले चौदह बरस से दौड़ रहा था - अकेला। इन चौदह बरसों में उसने खुद को थककर गिरने से कई बार बचाया था - इस सपने के तहत कि एक दिन आएगा, जब कोई और भले ही उसकी सुध न ले, लेकिन वह खुद इस फुरसत और साहस के बीच जरूर खड़ा होगा कि अपने पाँव के जख्मों और दिल-दिमाग में उतरते सूने अंधकार के बीच एक चीख की तरह उपस्थित हो और बेरहम संबंधों के मकड़जाल को छिन्न-भिन्न कर दे।

पर इन चौदह बरसों में यह क्षण कभी नहीं आया। इस बीच उसके इस छोटे-से सपने ने आघात सहते-सहते किसी मरे हुए कुत्ते की तरह अपनी आँखें फाड़ दी थीं और जीभ बाहर फेंक दी थी। अपेक्षाओं की भीड़ में अकेले पड़ गए कमजोर आदमी के एकालाप की तरह वह लगातार 'ट्रेजिक एकांत' में बदल रहा था।

वह एकांतप्रिय लोगों में से नहीं था। चौदह बरस पहले का उसका कॉलेज-जीवन जिंदादिली, ठहाकों और हंगामों की ऐसी स्मृति था, जिसके सहारे उसने अब तक का समय जी-जीकर फेंका था। पर अब यह स्मृति भी नष्ट हो रही थी। इस स्मृति को याद भर करने से मन तिक्त होने लगता था। जैसे शहंशाहों की तरह रहने वाले किसी आदमी को अचानक आई स्थायी गरीबी में अपना अतीत एक निर्मम मजाक-सा याद आता है, वैसे ही वह अपने अतीत को याद करते ही खुद को एक विद्रूप की तरह पाने लगता था। ऐसे में आम लोगों की तरह वह अपनी पत्नी या बच्चों पर अपनी झुँझलाहट नहीं उतारता था, बल्कि उनसे छिटककर अपनी खाट पर चुप पड़ जाता था, उनकी उपस्थिति के बावजूद।

ये वही दिन थे, जिन दिनों उसने पाया कि वह शोर और दूसरों की उपस्थिति से कतराने लगा है। पर थमा वह तब भी नहीं। अपने में गुम चलता रहा, ताकि दूसरे इस भयावह अकेलेपन और निर्मम विषाद से बच सकें... धीरे-धीरे उसने पाया कि क्रमशः अकेले पड़ते जाने की प्रक्रिया अब उस बिंदु पर है, जहाँ वह लगभग अकेला है - लोगों की बातचीत, चुहल और गीतों से दूर, उनकी नींद और सपनों से बहिष्कृत। यह रीढ़ की हड्डी को ऐंठ देनेवाला एहसास था। तकलीफ से विकृत हो आए चेहरे पर काबू पाते हुए उसने तब अपनी पत्नी की दुनिया पर आस बँधी निगाह दौड़ाई और लड़खड़ा गया। वह आत्मीयता और लगाव के तमाम एहसास से एकदम रीत चुकी थी। वहाँ सिर्फ चंद औपचारिक वाक्य भर बचे रह गए थे। ऐसा क्यों हुआ, आदमी ने चलते-चलते सोचा, कि अपनी अपरिहार्य मौजूदगी के बावजूद वह लोगों की दुनिया में अप्रासंगिक है?

लोगों की दुनिया में अपनी जरूरत को स्वार्थी होता देख उसका मन भीतर तक रुआँसा हो आया। उसके तेज कदम सुस्त पड़ने लगे। कदमों का सुस्त पड़ना था कि पत्नी के पास सुरक्षित चंद औपचारिक वाक्यों की पूँजी भी मानो लूट गई। क्यों? उसने दुखते अचरज में सोचा और बेतरह डर गया। तब पहली बार उसके कदम रुक-रुक कर पड़ने लगे।

कदमों के इस तरह थकते ही वह एकदम तन्हा था। ऊपर आसमान था, अपने अट्टहासों के साथ। नीचे धरती, अपने रुदन को थामे। वह न आसमान के अट्टहास में शामिल था, न धरती के रुदन में। चीजें क्रांतिकारी छलाँगवाले नियम के तहत सिरे से ही बदल गई थीं। उसे लगा, अब थम जाना चाहिए, ऐसी दौड़ का कोई अर्थ नहीं, जिसे न कोई महसूस कर रहा हो, न ही उसे लेकर चिंतित या आभारी हो। सब अपनी-अपनी नींद में और अपने-अपने सपनों में थे, उससे बेखबर, जबकि यह नींद और सपने उसकी दौड़ ने ही लोगों को सौंपे थे।

वह रुका। रुकते-रुकते भी उसने पूरी ईमानदारी से सोचा कि कहीं उसका विक्षोभ एक आत्महंता प्रतिशोध में तो नहीं ढल रहा। भीतर से एक रोता हुआ स्वीकार निकला। पर मैं अवश हूँ, उसने बड़बड़ाते हुए सोचा, बस बहुत हो चुका। उसने अपने-आपको सुनाया और इसके बाद वह पूरी तरह रुक गया।

यह वही क्षण था जब राजधानी बीहड़ में रुक गई थी। राजधानी में जीवन क्रमशः अस्त-व्यस्त हुआ। सबसे पहले बेचैन होनेवाला वही शख्स था, जिसकी टार्च की रोशनी ने बीहड़ को देखा था। वह कुछ देर ठिठका रहा, फिर उसने अपनी पत्नी को भी जगा दिया। पत्नी ने झल्लाकर कहा, रुकी है, तो चल भी जाएगी, मुझे सोने दो। लेकिन जब काफी देर के बाद भी राजधानी रुकी ही रही, तो उसने फिर अपनी पत्नी को जगा दिया। अब पत्नी भी आशंकित हो गई और अपना सामान सँभालने लगी। इस बीच बाकी डब्बे भी बीच नींद में तड़क गए।

राजधानी को रुके पर्याप्त देर हो चुकी थी। छोटे बच्चों ने रोना शुरू कर दिया था और बड़े बच्चों ने सवाल पूछने आरंभ कर दिए थे कि क्या राजधानी भी रुक सकती है? क्या राजधानी के लोगों को भी लूटा जा सकता है? राजधानी बीहड़ में क्यों रुकी है? बीहड़ किसे कहते हैं? आदि-आदि। स्त्रियाँ उबासी, आतंक और आश्चर्य के बीच थिर थीं। पुरुषों के चेहरों पर बच्चों के सवालों से उपजी झुँझलाहट और राजधानी के रुकने से पैदा हुआ क्रोध बिखरा हुआ था।

किसी डब्बे में 'काम करनेवाली सरकार' की असफलता पर चर्चा गरम हो गई थी, तो किसी में राजधानी के रुकने का रिश्ता उग्रवादी कार्रवाईयों से जोड़कर देखा जाने लगा था। काफी लोग राजधानी से बाहर आ गए थे और जुलूस की शक्ल में ड्राइवर की दिशा में बढ़ने लगे थे। राजधानी को रुके तीन घंटे हो गए थे। रात का सीना उघड़ने लगा था कि तभी इस अलस्सुबह एक हादसा हुआ। बीहड़ के, पता नहीं किस कोने से दो तीन आदमी निकले और राजधानी से थोड़ी दूर घूमती एक युवती को घसीट ले गए। लड़की की चीख से, जब तक लोग चौंके, तब तक वहाँ कुछ नहीं था - न चीख, न युवती, न ही वे आदमी। बाहर खड़े लोगों में भगदड़ मच गई। सब गिरते-पड़ते राजधानी के भीतर समाने लगे। खिड़कियाँ और दरवाजे बंद किए जाने लगे। अपने-अपने लोगों और सामान की गिनती की जाने लगी। कुछ ही देर में पूरी राजधानी दहशत की गिरफ्त में थी।

माँओं ने अपने बच्चे छातियों से चिपटा लिए थे। अगवा की गई युवती की बूढ़ी माँ को दिल का दौरा पड़ गया था। नवविवाहिता स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों से सटकर सहमी हुई कबूतरियों की तरह काँपने लगी थीं। बूढ़ों की खाँसी उखड़ गई थी और अलग-अलग कंपनियों के अधिकारी बड़ी-बड़ी चिंताएँ भूल अपने-अपने परिवार को ढाँढ़स बँधाने में जुट गए थे। राष्ट्रीय दैनिक का एक विशेष संवाददाता अपनी सीट पर धँसा सिगरेट के कश खींचता हुआ इस समस्या में मुब्तिला था कि कैसे वह इस 'एक्सक्ल्यूसिव समाचार' को फौरन से पेश्तर अपने अखबार तक पहुँचाए। दहशत और अनिश्चय के तीन या चार या पाँच घंटों पर वह मन ही मन मर्मस्पर्शी रपट बुनने में तल्लीन था। अगवा युवती और उसे लेकर राजधानी की नपुंसकता पर उसने दो बॉक्स आइटम भी बना लिए थे। अब वह तीसरे बॉक्स आइटम के लिए 'झलकियाँ' देख और सोच रहा था।

तभी दूसरे किसी डब्बे से एक आर्तनाद गूँजा। राजधानी क्योंकि भीतर-ही-भीतर पूरी जुड़ी हुई थी, इसलिए कुछ लोग आर्तनाद की दिशा में दौड़ पड़े, कुछ को उनकी पत्नियों ने उठने से पहले ही आँख के इशारे से रोक लिया। आर्तनाद एक अधेड़ औरत का था। उसका पति इस दहशत को झेल न पाने के कारण हार्ट अटैक से मर गया था। सुबह के साढ़े सात बजे थे। राजधानी की गड़बड़ी पता नहीं चल पा रही थी। ड्राइवर, टी.सी. और राजधानी के पुलिसकर्मी हताश और चकित थे। पुलिस को देख विशेष संवाददाता जिरह करने लगा था कि जिस वक्त लड़की का अपहरण हुआ, वे क्या कर रहे थे। लोगों का गुस्सा क्रमशः एक कातर दयनीयता में बदल रहा था।

सबसे पहले आदमी की माँ चकित हुई। माँ ने कहा, घर में आटा खत्म हो गया है। आदमी ने जवाब दिया, 'तो?' माँ ने सूचना दी, तुम्हारे दोनों छोटे भाइयों को मास्टर ने स्कूल से लौटा दिया है और कहा है, जब तक ड्रेस न बन जाए, स्कूल मत जाना। आदमी ने कहा, 'पैसे होंगे, तो देखा जाएगा।' उसके जवाबों को सुन पत्नी पहले तो चौंक गई, फिर खुश हुई कि आदमी सुधर रहा है। लेकिन जब वक्त गुजर जाने पर भी आदमी दफ्तर के लिए तैयार नहीं हुआ तो उसे लगा, कोई गड़बड़ है। उसने वजह पूछी, आदमी ने कहा, 'मन नहीं है।' उसने फिल्म का प्रस्ताव रखा, आदमी ने खाली जेब दिखा दी। वह झल्लाकर ऊँची आवाज में बोली कि उसका जीवन नरक हो गया है। आदमी बाथरूम चला गया। बाथरूम में साबुन नहीं था, आदमी बिना साबुन के नहाने लगा।

बाहर आदमी की माँ के चेहरे पर कुतूहल और पत्नी के चेहरे पर एक हताश क्रोध उभर आया था। वे दोनों आदमी को लेकर किसम-किसम की शंकाएँ प्रकट करने लगी थीं।

न जंजीर खींची गई थी, न पटरियाँ उखाड़ी गई थीं। न इंजन में कोई खराबी थी, न राजधानी से कटकर कोई मरा था। इसके बावजूद राजधानी रुकी हुई थी, मानो काला नाग अपने जहर से उसे नीला कर गया हो।

अब तक पूरे देश में तहलका मच चुका था। समूचे देश की ट्रेन-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी। जिस पटरी पर राजधानी खड़ी थी, उससे होकर आने और जानेवाली सभी गाड़ियाँ रद्द कर दी गई थीं। हेलीकॉप्टरों से यात्रियों के लिए भोजन के पैकेट गिराए जा रहे थे। बीहड़ दो प्रदेशों की सीमा पर था, इसलिए दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री बयान जारी कर चुके थे। रेलमंत्री हेलीकॉप्टर से मुआयना कर गए थे और उन्होंने राजधानी में दहशत से मरने वाले अधेड़ आदमी के परिवार को दस हजार रुपए और गायब युवती के परिवार को पाँच हजार रुपए देने की घोषणा कर दी थी। राजधानी के पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया था और गायब युवती को खोजने का काम केंद्रीय जाँच ब्यूरो के जिम्मे आ पड़ा था। बीमारों की देखभाल के लिए डॉक्टरों का एक दल पहुँचने ही वाला है, ऐसी घोषणा भी हुई थी। प्रधानमंत्री रंगभेद की अंतरराष्ट्रीय समस्या हल करने विदेश गए हुए थे - उनसे संपर्क साधा जा रहा था। उन्हें इस दुर्घटना में विदेशी ताकत का हाथ साफ दिखाई पड़ गया था। विरोधी दल बंद और धरनों की तैयारी में लग गए थे, चंद्रशेखर ने पदयात्रा की घोषणा कर दी थी। छात्रों ने बसें जला दी थीं और कॉलेज अनिश्चित काल के लिए बंद हो गए थे। संसद और विधानसभाओं में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किए जाने की मुहिम तेजी पर थी।

अविश्वास प्रस्ताव मुहल्ले के नुक्कड़ों पर आदमी के खिलाफ भी पेश किए जा रहे थे। मुहल्ले में आदमी को लेकर तरह-तरह की अफवाहें जन्म ले चुकी थीं।

आदमी दस दिन से न दफ्तर गया था, न पार्ट टाइम काम पर। आटे, दाल, चावल, घी, चीनी, दूध और मिट्टी के तेल को लेकर घर में हाहाकार मच गया था। मुहल्ले के दुकानदार ने उधार देने से साफ मना कर दिया था। उसे शक था कि आदमी पागल हो चुका है। कुछ बूढ़ी औरतों का खयाल था कि आदमी पर किसी ने टोना-टोटका कर दिया है। कुछ बूढ़े इस बात पर सहमत थे कि यह हद दर्जे की गैर जिम्मेदारी है। एक उदाहरण श्रवणकुमार का है, जिसे सोच भर लेने से आँखें मारे खुशी के उछलने लगती हैं और एक उदाहरण यह है, मन होता है कि मारे जूतों के साले की अक्ल ठिकाने कर दी जाए। भिखारी और कोढ़ी तक अपने परिवार के लिए जान हलकान किए रखते हैं और एक यह शख्स है। औरतों का विश्वास था कि आदमी बैरागी हो गया है, क्योंकि उसकी औरत बदचलन है।

आदमी इन सब अफवाहों से निरपेक्ष अपनी खाट पर चुप पड़ा रहता। उसकी आँखें दूर तक खाली हो गई थीं और चेहरे की लगातार बढ़ती दाढ़ी ने उसे कुछ-कुछ दार्शनिक की मुद्रा सौंप दी थी। बच्चों ने उसके पास जाना छोड़ दिया था। पत्नी तो उसे अपने पिछले जन्म का पाप मानने ही लगी थी।

एक दिन आया, जब आदमी को लेकर उड़ने वाली अफवाहों ने मकान मालिक को विचलित कर दिया। उसे आशंका हुई कि कहीं उसका किराया खतरे में न पड़ जाए। वह आया और आदमी की पत्नी को बोल गया कि इस पहली से वे लोग कोई दूसरा मकान खोज लें, या फिर उसे कम-से-कम दो महीने का किराया पेशगी दे दें। पत्नी ने उस रात पहले अपने दोनों बच्चों को पीटा, फिर उन्हीं की आवाज में अपनी आवाज मिलाकर देर तक रोती रही। पर आदमी के जिस्म में जुंबिश भी नहीं हुई।

राजधानी के जिस्म में जुंबिश हो गई। देश के आला दिमाग इंजीनियरों के एक दल ने, जिसे विदेशों में प्रशिक्षित करने पर सरकार ने करोड़ों रुपया खर्च किया था, आखिर राजधानी के 'इनर वर्ल्ड' में हुई गड़बड़ी को खोज निकाला और ठीक पंद्रहवें रोज राजधानी ने अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ ली। पूरे देश में तहलका मच गया। जगह-जगह पटाखे छोड़े गए और रोशनी की गई। पाँच सितारा होटलों में जश्न मनाए गए और शराब बहाई गई। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में सगर्व घोषणा की कि हम लगातार विकास के रास्तों पर बढ़ रहे हैं और हमारी टेक्नोलॉजी किसी भी देश से कमतर नहीं है। लोगों का सरकार में भरोसा फिर से कायम होने लगा। विरोधी दलों के पाँवों के नीचे की जमीन कुछ और कमजोर पड़ गई। जीवन फिर दौड़ने लगा।

पर आदमी अभी तक रुका हुआ था। उसके दोनों छोटे भाई खाट से जा लगे थे और माँ का दमा उखड़ आया था। पत्नी के विरोध करने की सारी ताकत पेट की भूख ने सोख ली थी और आखिर उसने तमाम बातें अपने मायके लिख भेजी थीं। अब वह इंतजार में पथरा रही थी। आदमी तो पहले से ही पथराया हुआ था।

जिस रोज राजधानी चली, उसी रोज आदमी का चार वर्षीय बेटा डरते-डरते उसके पास आया और उसके सूखे हुए चेहरे पर हाथ फिराते हुए बोला, 'पापा, आप नाराज हैं?'

जैसे सुर्ख तवे पर पानी की बूँद छन्न से बजी हो! आदमी ने अपने बेटे को लपककर छाती में छुपा लिया। और फिर गूँजा उसका आर्तनाद। ठीक वैसे, जैसे राजधानी ने चलने से पहले अपनी सीटी से पूरे बीहड़ को गुँजा दिया था। वह धीरे से उठा और बेटे के गाल थपथपाकर घर से बाहर निकल गया।

बेटे की आँखें चमकने लगीं थीं।


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