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कहानी

विचित्र देश की प्रेम कथा
धीरेंद्र अस्थाना


इस कहानी के नायक कालीचरण माथुर, जो खुद को के.सी. माथुर कहना पसंद करता है, में ऐसा एक भी गुण नहीं कि उसे नायक का दर्जा दिया जाए। लेकिन इसमें मैं क्या कर सकता हूँ कि जो कहानी मैं लिखने जा रहा हूँ वह कालीचरण माथुर की ही है। अगर पाठकगण अनिवार्य सहानुभूति के साथ विचार करें तो तथ्य यह प्रकाशित होगा कि गुणहीनता की जिम्मेदारी बिचारे के.सी. पर नहीं जाती। इस गुणहीनता का दारोमदार है उस विचित्र किस्म के देश पर जिसमें के.सी. ने अपनी चाहतों और तमन्नाओं को मूर्त रूप देना चाहा और जिसमें कुछ भी यथास्थान नहीं रह गया था - न गुण, न धर्म और न ही जीवन।

सचमुच वह एक विचित्र देश था। वहाँ इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि जो शख्स सुबह अपने घर से दफ्तर के लिए निकला है वह शाम को सही-सलामत लौट भी आएगा। वहाँ दवाई खाकर आदमी मर सकता था और जहर खाने के बावजूद बचा रह सकता था।

ऐसे विचित्र देश में कालीचरण माथुर उर्फ के.सी. को अपने साथ पढ़नेवाली जीनत से विवाह करने की इच्छा हुई। इस इच्छा के जीनत और के.सी. के मन में रहने तक तो सब ठीक-ठाक रहा। लेकिन जैसे ही यह इच्छा सार्वजनिक हुई के.सी. की माँ ने आत्मदाह करने की और के.सी. के पिता ने के.सी. को धक्के मारकर घर से निकाल देने की धमकी दे डाली। के.सी. इस समस्या से निपट भी नहीं पाया था कि एक शाम जीनत के भाइयों ने गली के मुहाने पर के.सी. को रोक उसकी गर्दन पर चाकू रख दिया और गुर्राकर बोले, 'खैरियत चाहता है तो इसी वक्त शहर से दफा हो जा।'

के.सी. कहना चाहता था - प्रजातंत्र, आजादी, प्रेम वगैरह-वगैरह लेकिन गर्दन पर चाकू की नोक प्रतिपल चुभती जा रही थी सो इन शब्दों को कहने के प्रयत्न में उसके गले से एक घिघियाहट-सी उभरी और डूब गई। आश्चर्य और दुख में डूबा के.सी. जीनत के भाइयों के साथ बस अड्डे आया और राजधानी जाने वाली बस में बैठ गया। टिकट जीनत के भाइयों ने ही खरीद दिया। जब तक बस चल न दी, जीनत के भाई वहीं खड़े रहे।

उस शहर से चलनेवाली यह बस जब किसी खराबी के कारण पास के एक कस्बे में रुकी तो इस सारे घटनाक्रम से हैरान और परेशान के.सी. ने सोचा कि वह उतर ले और भाग कर जीनत के पास पहुँच जाए। लेकिन दूसरे ही क्षण इस इच्छा का दमन करती उदासीनता की एक तेज लहर के.सी. के दिमाग से उठी और दिल को दबोच कर बैठ गई। के.सी. ने कुछ देर संघर्ष किया और अंततः इब्ने इंशा के इस शेर में शरण ली - 'इंशा जी उठ्ठो, कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या?'

इस प्रकार इस कहानी के नायक ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ खाली हाथ और क्षुब्ध मन देश की राजधानी में कदम रखा और खरामा-खरामा पैदल चलता हुआ अपने चाचा के घर पहुँचा। चाचा एक फर्म में सेल्स मैनेजर थे और तीन बच्चों के पिता तथा एक मरियल-सी निस्तेज चेहरेवाली औरत के पति थे। उन्होंने अपने बाल धूप में सफेद नहीं किए थे। वह क्लर्क से विक्रय प्रतिनिधि और विक्रय प्रतिनिधि से विक्रय अधिकारी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पूरे बीस वर्षों की कठिन तपस्या और हाड़-तोड़ मेहनत के बाद विक्रय प्रबंधक बने थे। उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया था और पी.एच.डी. करने की तमन्ना लिए लिए क्लर्की में आ लगे थे। इतिहास, दर्शन, राजनीति और साहित्य की एक हजार से ऊपर किताबें उनकी निजी मिल्कियत थीं और वह चौड़े फ्रेम का मोटे शीशोंवाला नजर का चश्मा पहनते थे। वह समझ गए कि के.सी. झूठ बोल रहा है।

के.सी. ने चाचा से कहा था कि वह घूमने-फिरने आया है।

'बिना कपड़े-लत्तों के?' चाचा ने सव्यंग्य पूछा और कहा, 'मैंने दुनिया देखी है, मुझे बनाने की कोशिश मत करो।' और के.सी. ने बनाने की कोशिश छोड़ उगल दिया कि उसके साथ क्या हादसा हुआ है।

फिर के.सी. ने इस हादसे की सूचना जीनत और अपनी माँ को भेजी और माँ से प्रार्थना की कि कम से कम दो सौ रुपए और दो जोड़ी कपड़े उसे तुरंत भिजवा दे।

एक हफ्ते बाद माँ का खत आया जिसमें सूचना दी गई थी कि सौ रुपए मनीऑर्डर से और कपड़े पार्सल से भेजे जा रहे हैं। आगे लिखा था कि 'तूने अच्छा ही किया जो शहर छोड़ दिया। जान है तो जहान है। तेरे बाऊ जी को भी जीनत के भाई धमका गए थे। तुझे तो पता ही है कि यहाँ दंगे होते ही रहते हैं। तेरे बाऊजी ने अपने ट्रांसफर के लिए अर्जी दी है। तुझसे वे बहुत खफा हैं। घर की हालत तो तुझे पता ही है इसलिए दो सौ रुपए नहीं भेज सकी। अच्छा हो कि तू अब वहीं जमने की सोचे। अपने चाचा से कहना कि तेरे लिए किसी काम का जुगाड़ कर दें। पत्र डालते रहना। तेरी माँ।'

जीनत के नाम के.सी. ने जो पत्र भेजा वह जब उसके घर पहुँचा तो जीनत के भाई दोपहर का भोजन कर रहे थे और जीनत कॉलेज गई थी। जीनत के नाम चूँकि कहीं से भी आने वाला यह पहला पत्र था और के.सी. कांड अभी ताजा था इसलिए भाइयों ने पत्र के ऊपर 'व्यक्तिगत' लिखे होने के बावजूद पत्र खोला, पढ़ा और के.सी. का पता नोट करने के बाद पत्र को फाड़कर नाली में बहा दिया।

जिस दिन के.सी. को माँ द्वारा भेजे सौ रुपए का मनीआर्डर और कपड़ों का पार्सल प्राप्त हुआ उसी शाम उसे जीनत के भाइयों द्वारा भेजा एक खत भी मिला जिसमें सूचना दी गई थी कि वे राजधानी आकर भी के.सी. को जमीन में जिंदा गाड़ सकते हैं इसलिए के.सी. अपनी हरकतों से बाज आए और पठानों की इज्जत से खेलने की जुर्रत न करे।

के.सी. इस पत्र को पढ़कर डर गया और चाचा से सलाह लेने उपस्थित हुआ। चाचा ने सलाह दी कि जीनत के भाई ठीक कहते हैं और अगर के.सी. को विवाह करने की ही इच्छा है तो बिरादरी में लड़कियों की भीड़ खड़ी है। के.सी. कहे तो बात चलाई जाए। के.सी. को पता नहीं है कि कायस्थों में आजकल लड़के की कीमत एक लाख को छू रही है कि उस रुपए से अपना कोई व्यापार किया जा सकता है, के.सी. जीनत को मन से निकाल दे और राजधानी में रहकर कम से कम अपना एम.ए. ही पूरा कर ले।

इस सलाह को सुनकर के.सी. को गहरा सदमा पहुँचा और उसने बड़े गहरे अविश्वास से चाचा को देखा। उसे नहीं पता था कि जिन चाचा को वह सुलझे हुए विचारों का प्रगतिशील आदमी समझता था वह भी ठीक उसके पिता के दकियानूसी विचारों की लीक पर चल सकते हैं। चाचा की सलाह के विपरीत के.सी. को जीनत और तेजी से याद आने लगी।

थक कर के.सी. ने चाचा की किताबों में शरण ली। वह सारा-सारा दिन किताबों में डूबा रहता और सारी-सारी रात जीनत में। हफ्तों तक उसे दाढ़ी बनाने का ख्याल नहीं आता। चाची खाना दे देती तो खा लेता, भूल जाती तो याद नहीं दिलाता। एक अजीब किस्म का वीतरागी भाव उसके चेहरे पर हरदम चिपका रहता। उसके इस व्यवहार पर चाची को कभी क्रोध आता और कभी एक भावुक किस्म की करुणा में भर कर वह 'च्च-च्च' कर उठतीं। चाचा के दस, बारह और पंद्रह वर्ष के तीनों लड़के उसे इस बीच अजूबा समझने लगे थे। और इसी बीच के.सी. ने जीनत के नाम करीब-करीब तीन दर्जन पत्र लिख कर अपने पास जमा कर लिए थे।

इस तरह तीन महीने गुजरे और इन तीन महीनों में के.सी. का शरीर आधा हो गया। अब चाचा को चिंता हुई और उन्होंने के.सी. के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वह चाहे तो उसे अपनी फर्म में क्लर्की दिला दें। के.सी. ने दो दिन का वक्त माँगा लेकिन दो ही घंटे के भीतर अपनी सहमति दे दी।

इस तत्काल निर्णय का कारण बना के.सी. की बहन का पत्र जो ऐन उसी वक्त पहुँचा जिस वक्त के.सी. चाचा का प्रस्ताव गर्दन झुका कर सुन रहा था। के.सी. उस पत्र को लेकर कमरे में गया। पत्र पढ़ने के बाद वह पूरे डेढ़ घंटे सचमुच रोया और उसके आधे घंटे बाद उसने चाचा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

के.सी की बहन ने लिखा था - 'पिछले दिनों जीनत का निकाह बहुत धूमधाम के साथ किन्हीं प्रो. असलम के साथ हो गया। वह अपने शौहर के संग यहाँ से चली गई है।' जीनत ने यह संदेश भिजवाया था कि 'उसे मरते दम तक यह अफसोस रहेगा कि के.सी. इतने कायरतापूर्ण ढंग से भाग निकला। भागते समय क्या के.सी. को एक पल के लिए भी यह ख्याल नहीं आया कि एक बार उसने बहुत आत्मविश्वास के साथ कहा था कि उन दोनों का विवाह इस समाज के सामने एक आदर्श उपस्थित करेगा।' जीनत ने यह भी पुछवाया था कि 'उनका प्रेम बड़ा था या प्रेम के बीच में आ जानेवाला चाकू? के.सी. ने यह कैसे सोच लिया कि अगर वह मर जाता तो जीनत जिंदा रह जाती।' इसके बाद जीनत ने लिखवाया था कि 'वह चाहती तो निकाह के वक्त भी घर से भागकर के.सी. के पास राजधानी आ सकती थी लेकिन किस विश्वास पर?' और अंत में के.सी. के नाम अपने अंतिम संदेश के बतौर जीनत ने कहलवाया था कि 'वह के.सी. के कायरतापूर्ण रवैये के विरोध में यह निकाह कर रही है कि यह सब लिखाते हुए उसे कोई भय अथवा संकोच नहीं है। के.सी. चाहे तो यह पत्र उसके शौहर को भेज सकता है।' पत्र के अंत में बहन ने पुनश्चः लिखकर सूचना दी थी कि पिताजी का ट्रांसफर ऑर्डर आ गया है और वह लोग एक सप्ताह के भीतर यह शहर छोड़कर जा रहे हैं। नए शहर का पता लिखने के बाद के.सी. की बहन ने जीनत के शौहर का पता भी लिखा हुआ था।

और यही एक बात ऐसी थी कि के.सी. फूट-फूट कर डेढ़ घंटे तक लगातार रोया। अगर पत्र में जीनत का नया पता न होता तो के.सी. इस पत्र को बड़ी सहजता से 'तिरिया चरित्र' की संज्ञा से विभूषित कर जीनत को भूल जा सकता था लेकिन जीनत ने अपना पता भेज कर के.सी. को के.सी. के अनुसार न सिर्फ अपने प्रेम की गहराई का सबूत दिया था बल्कि जीवन-भर के लिए उसे एक जलील किस्म के पछतावे में तड़पने के लिए भी छोड़ दिया था।

बहन का पत्र पढ़ने के तुरंत बाद के.सी. के मन में दो विचार उठे। पहला यह कि उसे फौरन जीनत के पास पहुँचना चाहिए, कि उसका प्रेम देह की पवित्रता अपवित्रता के आग्रहों-दुराग्रहों से कहीं ज्यादा ऊँचा है कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा और वह अगर चाहे तो जीनत को अपने साथ राजधानी ले आ सकता है। दूसरा यह कि वह इस पत्र को तो नहीं, बल्कि उन तीन दर्जन पत्रों को जीनत के पते पर रवाना कर दे जो इन दिनों उसने लिखकर अपने पास रख लिए हैं। ये पत्र जीनत को उसकी मजबूरियों और प्रतिबद्धता की कहानी सुना सकेंगे। यह दूसरा विचार के.सी. को खुद ही मूर्खतापूर्ण और कायरतापूर्ण लगा और पहले विचार की प्रतिक्रियास्वरूप उसकी एक आँख में वे चाकू उतर आए जो जीनत के भाइयों ने उसकी गर्दन पर टिकाए थे और दूसरी आँख में कुछ अरसा पहले हुए उस दंगे के दृश्य उभरने लगे जिसमें दो संप्रदाय के लोग एक पागल जुनून में एक दूसरे को तलवारों की नोंक पर उछालने लगे थे। गर्दन झटककर दोनों आँखों के खौफनाक दृश्यों को भूल के.सी. ने अपने सूखे होठों पर जीभ फिराई थी, कुर्सी के हत्थे से टिककर डेढ़ घंटे रोया था और रोने के आधा घंटे बाद कमरे से बाहर निकल चाचा से बोला था -'मैं नौकरी करना चाहता हूँ।'

पाठकगण क्षमा करेंगे कि इस कहानी को लिखते समय मेरी कलम किंचित संकोच में पड़ ठिठक गई है। मैं, जो कालीचरण माथुर उर्फ के.सी. की असली कहानी लिखने बैठा हूँ, इस पसोपेश में पड़ गया हूँ कि जो घटा है के.सी. के साथ, वैसा ही वर्णन करूँ या के.सी. जैसा है उसे वैसा ही दिखाया जाए या एक कहानी के नायक को जैसा होना चाहिए, वैसा चित्रित किया जाए?

मसलन जिस समय के.सी. जीनत के भाइयों के चाकू दिखाए जाने पर 'बड़ा बेआबरू होकर जीनत के कूचे से निकल रहा था' और उसकी बस पास के एक कस्बे में खराब हो गई थी और उसने सोचा था कि वापस जीनत के पास दौड़ चले, उस वक्त इस इच्छा का दमन करता इब्ने इंशा का एक शेर उसे याद आया, 'इंशाजी, उट्ठो कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या' और वह चुपचाप राजधानी आ गया था, उस स्थल पर मेरे अपने मन में आया था कि वास्तविक जीवन में के.सी. ने भले ही कुछ भी किया हो लेकिन अब जबकि वह एक कहानी का नायक बन कर उतरा है और सैकड़ों-हजारों लोग उससे प्रेरणा लेने को उँकड़ू बैठे हैं तो उसकी प्रतिक्रिया भी नायकों जैसी होनी चाहिए। और मैंने सोचा कि इसे वापस जीनत के पास लिए चलता हूँ और जीनत के भाइयों से भिड़ा देता हूँ। इब्ने इंशा के पलायनवादी शेर की टक्कर में मेरे पास फैज अहमद फैज की वे पंक्तियाँ भी थीं जो मैं उससे गवा सकता था - 'अब टूट गिरेंगी जंजीरें, अब जिंदानों की खैर नहीं, जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएँगे।'

लेकिन जब इस स्थल पर आ, कहानी लिखना छोड़, मैं अपना यह प्रस्ताव ले के.सी. के पास गया तो उसने बड़े ही बदतमीज लहजे में कहा, 'कहानी मेरी लिखी जा रही है या मेरे नाम पर किसी और की?'

पाठकगण फिर क्षमा करेंगे कि मैं इस प्रश्न के जवाब में कोई सैद्धांतिक बहस छेड़ने के बजाय सिर्फ 'हें हें हें' ही कर सका था और के.सी. की अक्ल पर सिर धुनता हुआ चुप लौट आया था।

इसी प्रकार अब जबकि जीनत का संदेश पढ़कर के.सी. ने नायकोचित व्यवहार नहीं किया तब मैं भी इस कहानी के अनेक पाठकों की तरह व्यक्तिगत रूप में क्षुब्ध हूँ लेकिन प्रश्न यही है कि कहानी कालीचरण माथुर की लिखी जा रही है या उसके नाम पर किसी और की? और जब कहानी कालीचरण माथुर की लिखी जा रही है तो साहित्य और लेखक के दायित्वों का तकाजा कुछ भी हो, हम वही देखने झेलने के लिए अभिशप्त हैं जो कालीचरण माथुर ने किया - जिया है।

तो, राजधानी में तीन वर्ष के क्लर्कीय जीवन ने के.सी को तीन चीजें भेंट कीं। नंबर एक -नजर का चश्मा। नंबर दो - डायरी लिखने की आदत। नंबर तीन - एक ऐसी समझदार स्त्री दोस्त की उत्कट चाह जिसकी उपस्थिति को के.सी. अपने रक्त में बजता महसूस कर सके।

जिन दिनों के.सी. के मन में इस चाह ने जन्म लिया उन दिनों मुल्क के रक्त में एक दूसरी ही स्त्री बज रही थी। उन दिनों के.सी. चाचा का घर छोड़ अपना एक अलग किराए का कमरा ले उसमें शिफ्ट कर गया था और देर रात तक या तो पढ़ता रहता था या डायरी लिखता था। के.सी. ने खुद को सोलह-सोलह और सत्रह-सत्रह घंटे दफ्तर के काम में डुबोया हुआ था इसलिए मुल्क के रक्त में बजती स्त्री का अहसास भी उसे बहुत देर बाद जाकर हुआ और जब हुआ तो वह बहुत भीतर तक काठ होता चला गया।

हुआ यूँ कि एक रोज वह रात के करीब ग्यारह बजे अपने कमरे में लेटा जार्ज आर्वेल का उपन्यास '1984' पढ़ रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। किताब को खाट पर उल्टा रख उसने दरवाजा खोला और बाहर से पड़े तेज धक्के के परिणामस्वरूप जमीन पर गिर पड़ा। आने वाले चार शख्स थे। तीन खाकी वर्दी में, बंदूकों के साथ और चौथा सादी वर्दी में। उठने से पहले ही के.सी. वर्दीधारियों की गिरफ्त में आ चुका था और हैरानी से सादी वर्दीधारी की गतिविधियाँ देखता रहा था। सादी वर्दीधारी ने कमरे का सामान उलट-पुलट कर दिया था। '1984' तथा उसकी डायरी समेत कुछ अन्य किताबों को कब्जे में लिया था और खाकी वर्दीवालों को इशारा कर बाहर निकल आया था। बाहर वैन थी और खामोशी थी। अगल-बगल के तमाम मकान गहरे सन्नाटे और अँधेरे में डूबे हुए थे। के.सी. ने जिस जगह '1984' को पढ़ना छोड़ा था उस जगह लिखा था - 'सावधान, बड़े भाई तुम्हें देख रहे हैं?' अब, चलती हुई वैन से बाहर झाँकने पर उसने पाया था कि राजधानी के हर चौराहे पर एक स्त्री के बहुत बड़े-बड़े पोस्टर अँधेरे में भी चमक रहे थे। ठीक उसी तरह जैसे '1984' में पूरे मुल्क के चौराहों पर बड़े भाई के बड़े-बड़े पोस्टर अँधेरे में चमकते थे। पोस्टरों में मुस्कराती स्त्री का हँसता हुआ चेहरा के.सी. के रक्त में सनसनी पैदा करने लगा। अपने सुन्न हुए चेहरे को घुमा कर उसने उन चारों आदमियों को देखा और डर गया। वे पोस्टरवाली स्त्री की तरह मुस्करा रहे थे। उन चारों की दबी बातचीत के उड़ते हुए टुकड़ों से के.सी. को जानकारी मिली कि उस पर कई दिन से नजर रखी जा रही थी, कि उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध थीं, कि उसका अस्तित्व देश के लिए एक बड़ा खतरा बन गया था, कि एक ऐसे वक्त में जब समूचा मुल्क शाम के छह बजे ही बिस्तरों में दुबक जाता था, के.सी. रात के ग्यारह-ग्यारह बजे तक लाइट जलाकर क्या करता था, यह जानने के लिए हुकूमत बेचैन थी, कि आखिर वह पकड़ा ही गया। और यह सब सुन के. सी. हँसा। राजधानी के अपने तीन वर्षीय जीवन में के.सी. पहली बार हँसा और हँसता ही चला गया। वह तब तक हँसता रहा जब तक एक खाकी वर्दी ने उसके मुँह पर बंदूक का कुंदा न मार दिया। कुंदे की चोट से के.सी. का एक दाँत टूट गया और मुँह से खून बहने लगा। मुँह से बहते रक्त को पोछते हुए भी के.सी. मुस्कराया। उसे अचानक ही पोस्टरों में मुस्कराती स्त्री के साथ सहानुभूति हो आई। के.सी. की सहानुभूति से निरपेक्ष और अप्रभावित वैन से बाहर पोस्टरवाली स्त्री का चेहरा उसी तरह मुस्कराता रहा।

पंद्रह दिन की सख्त पूछताछ और मारपीट के बाद के.सी. को छोड़ दिया गया। यहाँ भी चाचा ही के.सी. के काम आए जिन्होंने पूरा किस्सा फर्म के मालिक से बयान किया और अपने भतीजे को छुड़ाने की प्रार्थना की। फर्म के मालिक के उस देश के साथ व्यापारिक संबंध थे जिस देश के द्वारा दिए गए कर्जों में के.सी. का देश गले-गले तक डूबा हुआ था। सो, उच्चस्तरीय टेलीफोन खड़कने के बाद के.सी. मुक्त हुआ। मुक्ति से पहले उसे यह लिखकर देना पड़ा कि वह आपत्तिजनक किताबों से दूर रहेगा और रात के आठ बजे के बाद उसके कमरे की बत्ती जलती हुई नहीं पायी जाएगी।

और ताज्जुब! इस करार पर दस्तखत करने के बावजूद के.सी. ने जेल से निकलते ही चाचा से पहला वाक्य जो कहा उसका अर्थ था 'इस औरत की हुकूमत नष्ट होनी चाहिए।' चाचा ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, सिर्फ हैरानी से के.सी. को ताका क्योंकि के.सी. का वाक्य उन्हें समझ नहीं आया था। क्योंकि के.सी. ने 1984 के नायक की तरह कहा था - 'बड़े भाई का नाश हो।'

के.सी. को उम्मीद थी कि दफ्तर पहुँचते ही वह अपने साथियों के तरह-तरह के प्रश्नों से घिर जाएगा लेकिन यह देखकर उसका चश्मा नाक से फिसलने लगा कि समूचा दफ्तर एक ठोस सन्नाटे की विस्मयकारी गिरफ्त में था। उसका स्वागत करना तो दूर, किसी ने उसे विश भी नहीं किया। यहाँ तक कि उसके मित्र रामकुमार और कृष्णकांत भी उसके पास नहीं फटके। पूरे दिन में सिर्फ एक बार फर्म के मालिक मिस्टर लालवानी ने उसे अपने केबिन में बुलाया और हिदायत देते हुए कहा, 'तुम मेहनती आदमी हो इसलिए इस बार तुम्हें छुड़वा लिया। आइंदा के लिए ध्यान रहे कि कोई ऊटपटाँग हरकत अब मत करना। इस बार कुछ हुआ तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊँगा।'

के.सी. पूछना चाहता था कि उसने क्या किया? वह तो एक उपन्यास पढ़ रहा था लेकिन लालवानी साहब ने उसकी बात सुनने से पहले ही उसे बाहर जाने का इशारा कर दिया था। बाहर निकलते वक्त उसके कानों में लालवानी साहब की आवाज गूँजी थी, 'मैडम इज कंट्री एंड कंट्री इज मैडम। अंडरस्टैंड?'

मैडम? के.सी. ने बाहर निकलते ही सोचा था और यह देखकर उसकी घिग्घी-सी बँधने लगी थी कि पोस्टरवाली स्त्री के चार आदमकद चित्र दफ्तर की चारों दीवारों पर लगे हुए थे। अपनी सीट पर आकर के.सी. ने देखा था कि चाचा समेत हर शख्स का चेहरा फाइलों, रजिस्टरों या टाइपराइटरों में घुसा हुआ था और दरवाजे पर खड़े दरबान की आँखें अखबार में थीं।

के.सी. ने अखबारों में शरण ली लेकिन अखबारों के मुखपृष्ठों पर इस सिरे से उस सिरे तक पोस्टरवाली स्त्री की मुस्कान नाच रही थी। वह पढ़ने बैठता तो किताबों के पृष्ठों पर स्त्री का चेहरा उग आता। सोचने बैठता तो दिमाग में स्त्री का अट्टहास गूँजने लगता और सोने लगता तो स्त्री की मुस्कान से डर कर जाग जाता। समूचा मुल्क स्त्रीमय हो उठा था। के.सी. चाहता था कि कोई हो जिसे वह बता सके कि स्त्री का जादू कैसे तोड़ा जा सकता है, लेकिन दूर-दूर तक कोई नहीं था। लोग या तो दफ्तरों में कैद थे या जेलों में। लाचार के.सी. ने पुनः किताबों में शरण लेनी चाही लेकिन यह देखकर उसकी आँखें कोनों तक फट गईं कि उसकी दिलचस्पी की तमाम किताबें जब्त की जा चुकी थीं। नई किताबें छप नहीं रही थीं और पुरानी किताबें अपने-अपने स्थानों से हटाई जा चुकी थीं। मसलन चाचा के पास आचार्य रजनीश की किताबें तो थीं लेकिन राहुल सांकृत्यायन नहीं थे। रामायण थी लेकिन गीता नहीं थी। राजधानी के तमाम पुस्तकालयों में ताले थे और छापेखाने 'बातें कम, काम ज्यादा' के पोस्टर छापने में व्यस्त थे। देश आगे बढ़ रहा था। के.सी. पीछे छूट रहा था।

और पीछे छूटते हुए के.सी. के पास न किताबें थीं, न अखबार, न हमजुबाँ थे, न हमदर्द और न ही डायरी थी। पुरानी डायरी जब्त की जा चुकी थी और उसी के साथ के.सी. के तीन वर्षों का इतिहास भी जब्त हो गया था। अपने घनघोर एकांत में सिर धुनती हुई के.सी. की हताशा पर पुनः एक वीतरागी भाव क्रमशः चिपकने लगा। उसे लगने लगा कि यह मुर्दों का देश है और यहाँ का पहला और आखिरी सच है पोस्टरवाली स्त्री।

असल में के.सी. गलती पर था। क्योंकि पोस्टरवाली स्त्री के बावजूद मुल्क में भूमिगत तौर पर पर्चे भी बँट रहे थे और लड़ाई भी चल रही थी। इस सच का अहसास हुआ के.सी. को उस रोज जब उसने देखा कि खतरनाक ढंग से चुप लोगों ने पोस्टरवाली स्त्री के हाथों से सत्ता छीन ली है। के.सी. को ताज्जुब भी हुआ और खुशी भी कि अंततः इस मुल्क के लोगों ने एक नया इतिहास लिख ही डाला। वह आश्वस्त हुआ।

लेकिन यह आश्वस्ति बहुत देर नहीं चल पायी। पोस्टरवाली स्त्री फिर से उसी तरह मुस्कराने लगी। लोगों को शायद अपने ही हाथों लिखा नया इतिहास पसंद नहीं आया था इसलिए उन्होंने उसे फाड़ कर फिर पुराना इतिहास अपने सीने से चिपका लिया था। तब पहली बार के.सी. ने लोगों के खिलाफ सोचा - 'यहाँ के लोगों को जुल्मों में जीने की सख्त आदत है।'

जिस शाम के.सी. ने नई डायरी खरीदकर उसके पहले पृष्ठ पर यह वाक्य लिखा उसके अगले रोज उसे दो संदेश मिले। पहला माँ की तरफ से कि उसकी बहन का विवाह फलाँ तारीख को तय है कि वह कम से कम एक सप्ताह की छुट्टी और कुछ पैसों को लेकर आ जाए और दूसरा यह कि लालवानी साहब उसे क्लर्की में ही नहीं फँसाए रखना चाहते, इसलिए उसे पंद्रह दिन के टूर पर फर्म के काम से बाहर भेजा जा रहा है। बहन के विवाह और टूर की तारीखें आपस में टकरा रही थीं इसलिए के.सी. पुनः चाचा की शरण में उपस्थित हुआ। वह चाचा ही नहीं उसके बॉस भी थे। चाचा ने चाचा की हैसियत से कहा कि उसे बहन के विवाह में इसलिए भी शामिल होना चाहिए क्योंकि वह जब से घर छोड़ कर आया है तब से एक बार भी वहाँ नहीं गया और बॉस की हैसियत से कहा कि आदेश चूँकि सीधे लालवानी साहब का है इसलिए वह कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते, कि उसे इस टूर पर निश्चित रूप से जाना चाहिए। फिर के.सी. को दुविधा में देख उन्होंने बीच का रास्ता तलाशते हुए कहा, 'तुम टूर पर चले जाओ, मैं विवाह अटैंड कर लेता हूँ और भाई साहब व भाभी को तुम्हारी मजबूरी समझा दूँगा।'

इन्हीं बातों को विस्तार के साथ चाचा ने के.सी. को घर पर समझाया और उसे बताया कि किस प्रकार किन-किन मौकों पर उन्होंने फर्म के हितों की खातिर अपने को कहाँ-कहाँ मारा है, कि आज वे जहाँ हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए उन्होंने क्या-क्या कुर्बानियाँ दी हैं कि जिंदगी इसी विरोधाभास का नाम है कि गीता में एक जगह लिखा है...।

उस रात के.सी. पहली बार शराब पीकर लौटा और बहुत देर तक बैठा अपनी नई डायरी के पन्नों पर नशे में थरथराते हाथ से, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में एक ही वाक्य लिखता रहा - 'बड़े भाई का नाश हो।'

सुबह उठकर वह पंद्रह दिन के टूर पर चला गया।

राजधानी की सबसे महँगी और व्यस्त सड़क पर विश्व विजेता सिकंदर की तरह सिर ताने खड़ी दस मंजिला इमारत के चौथे माले पर थी लालवानी साहब की फर्म। सत्तावन कर्मचारियों के स्टाफवाली इस फर्म में ग्यारह लड़कियाँ भी थीं। लेकिन के.सी. ने इनमें से किसी लड़की की ओर आँखें उठाकर नहीं देखा था। लेकिन अब उसकी आँखें बरबस ही उस बारहवीं लड़की की ओर उठ गई थीं जो पिछले ही महीने निकाले गए स्टेनोग्राफर खन्ना की जगह नियुक्त हुई थी और ठीक के.सी. के सामनेवाली सीट पर बैठती थी। उत्तेजक उभारों, खूबसूरत अंडाकार चेहरे और मासूम-सी आँखोंवाली गीता भसीन नामक इस लड़की को जब के.सी. ने पहली बार देखा तो उसके दिमाग के तार झनझना उठे और कान तपने लगे। उसने घबराकर अपनी आँखें झुका लीं। फिर यह रोजाना का नियम-सा बन गया। के.सी. रोज सुबह उससे आँखें मिलाता और फिर पूरे दिन अपनी फाइलों में डूबा रहता। लंच टाइम में लड़कियाँ अपने ग्रुपों में तथा पुरुष अपने ग्रुपों में खाना खाते थे। के.सी. चूँकि दोपहर का खाना सुबह-सुबह चाचा के घर ही खा आता था इसलिए वह बैठा-बैठा किताब पढ़ा करता था। किताब पढ़ने के दौरान वह बीच-बीच में नजर उठाकर गीता भसीन को भी देख लिया करता था जो सबसे अलग अपनी सीट पर बैठकर लंच लेती थी। गीता भसीन फर्म में काम करनेवाली अन्य लड़कियों की अपेक्षा के.सी. को अधिक संजीदा नजर आती थी। के.सी. ने न तो कभी उसे टपर-टपर बोलते सुना था और न ही अन्य जवान लड़कियों की तरह इठला या इतराकर चलते हुए ही देखा था। वह चलती थी तो के.सी. को लगता था जैसे अपने सौंदर्य से वह खुद ही शर्मसार है। बोलती थी तो के.सी. को महसूस होता था, दूर कहीं गिरजाघर में प्रार्थना हो रही हो।

इस गीता भसीन को देखते-देखते एक रोज के.सी. के मन में मुद्दत से दबी स्त्री दोस्त की चाह ने अँगड़ाई ली और वह हिम्मत करके लंच टाइम में गीता भसीन की सीट पर पहुँच गया। खाना खाती गीता ने नजर उठाकर के.सी. को देखा और संकोच के मारे उसका चलता हुआ मुँह रुक गया। के.सी. ने जितने भी वाक्य बोलने की तैयारी अपने मन में की थी वे सभी वाक्य उसे अपने भीतर कहीं गहरे में डूबते लगे और उसने रुक-रुक कर आहिस्ता से कहा, 'मेरा नाम के.सी. माथुर है।'

'मैं जानती हूँ।' गीता ने कहा और के.सी. के कान गर्म हो गए।

'खाना लीजिए।' गीता ने फिर कहा और के.सी. 'धन्यवाद' कहकर अपनी सीट पर लौट आया। अचानक उसका दिल भर आया था। उसे सहसा ही जीनत याद आ गई थी जो कॉलेज में उसके लिए अपने लंच बॉक्स में उसका भी खाना लेकर आती थी।

जिस रोज के.सी. की गीता से यह संक्षिप्त-सी बातचीत हुई उस रात के.सी. ने अपनी डायरी में एक प्रेम-कविता लिखने की कोशिश में कई पृष्ठ बरबाद किए और जिस रोज गीता भसीन लंच टाइम में अपना टिफिन लेकर के.सी. की सीट पर आ गई और उससे जिद करने लगी कि वह भी उसके साथ खाना खाए उस रात के.सी. ने अपनी डायरी में कम से कम तीन दर्जन बार गीता भसीन का नाम लिख डाला।

जाहिर है कि कालीचरण माथुर एक बार फिर प्रेम की दुनिया में उतर गया था।

यह उन दिनों की बात है जब उस अखंड राष्ट्र के एक क्षेत्र विशेष में रहनेवाले कुछ लोग अपने लिए एक स्वतंत्र राज्य की माँग करने लगे थे और एक संप्रदाय विशेष के लोगों को बसों से उतार-उतार कर गोलियों से भून रहे थे। अपने इस खूनी जुनून में उन्होंने न सिर्फ निहत्थे और निर्दोष नागरिकों को गोली से उड़ाया बल्कि देश के एक सम्मानित पत्रकार, प्रोफेसर और पुलिस अधिकारी को भी गोलियों से भून दिया।

मुल्क के लोग उन दिनों पोस्टरवाली स्त्री से प्रार्थना कर रहे थे कि वह जल्दी ही इस समस्या का कोई समाधान करे और मुल्क के बुद्धिजीवी इस तरह खामोश थे मानों इस सबसे उनका दूर का भी रिश्ता नहीं है। उन्हीं दिनों के.सी. का प्रेम क्रमशः विकसित हो रहा था और उसे लगने लगा था कि जीनत का विकल्प गीता भसीन हो सकती है। दफ्तर के बाद वह गीता भसीन के साथ राजधानी के दिल में स्थित सेंट्रल पार्क में घूमता था या महँगे बाजारों की भव्य दुकानों के बारामदों में। वे महँगी दुकानों से छोटी-छोटी चीजें खरीदकर एक-दूसरे को भेंट करते थे। मसलन गीता भसीन ने के.सी. को बॉलपेन, सेफ्टी-रेजर, डायरी और कुछ किताबें भेंट की थीं और के.सी. ने गीता को खूबसूरत-सा लंच बॉक्स, शांतिनिकेतनी बैग और कोल्हापुरी चप्पलें उपहार में दी थीं। वे चाट खाने के बजाय पाइनएप्पल जूस पीना पसंद करते थे और फिल्में देखने के बजाए नाटक देखते थे। संक्षेप में यह कि मुल्क में हो रही गोलीबारी की घटनाओं और तेजी से घटते राजनैतिक घटनाचक्र के प्रति वे उतने ही निरपेक्ष थे जितना मुल्क के बुद्धिजीवी। इस बीच के.सी. गीता भसीन को जीनत कांड से लेकर जेल जाने तक की यात्रा-कथा बयान कर चुका था और गीता भसीन ने कोई आपत्ति व्यक्त नहीं की थी।

और इसी बीच पोस्टरवाली स्त्री लोगों की प्रार्थना से पसीज गई थी। लोगों की प्रार्थना, जो अब तक लगभग आर्तनाद में बदल चुकी थी, से पसीज कर वह मुस्कराई और समस्या का समाधान हो गया।

'यह ठीक नहीं हुआ?' भव्य दुकानों के लंबे बरामदों में घूमते वक्त गीता भसीन ने बहुत उदास होकर कहा।

'क्या ठीक नहीं हुआ?' के.सी. अचानक चौंक गया। वह अनायास ही एक ऐसी लड़की को देखने लगा था जो अभी-अभी सफेद रंग की पारदर्शी ड्रेस में लिपटी ऊँची एड़ियों की सैंडल में खट-खट करती तेज-तेज गुजरी थी। वह समझा कि उस लड़की को देखने का गीता भसीन बुरा मान गई है।

'तुम्हारी फौज हमारे पवित्र पूजा-स्थल में जूते पहनकर घुस गई।' गीता ने तिक्त और क्षुब्ध स्वर में कहा।

'क्या?' के.सी. बौखला गया। उसने हैरान होकर आँखें चौड़ी कीं और आहिस्ता से बोला, 'यह हम दोनों के बीच हमारा-तुम्हारा कहाँ से आ गया?'

'मैंने तो एक बात कही है।' गीता लज्जित हो गई।

'पर यह बात हमें शोभा नहीं देती।' के.सी. ने समझाया।

उसके बाद वे दोनों ब्रेख्त का नाटक 'काकेशियन चाक सर्कल' देखने थियेटर में घुस गए।

के.सी. बीस दिन के टूर से लौटकर आया तो उसे पता चला कि एक हफ्ता हुआ, उसके पिता का देहांत हो गया, चाचा वहाँ गए हुए हैं। के.सी. अपनी सीट पर कटे पेड़-सा गिरा (मुहावरा पुराना है पर के.सी. वास्तव में इसी तरह गिरा जैसे कटा हुआ पेड़ गिरता है)। गीता भसीन ने अपनी सुंदर नर्म हथेलियों से दफ्तर की परवाह किए बगैर के.सी. की नम आँखें साफ कीं और धीमे से कहा, 'बी ब्रेव, वी ऑल आर इन द सेम बोट।' लालवानी साहब ने उसकी सीट पर आकर अफसोस जाहिर किया और सूचना दी कि उसके कमिटमेंट को देखते हुए उस प्रमोट कर सेल्स ऑफीसर बनाया जा रहा है।

के.सी. उसी दम माँ के पास जाने के लिए उठ खड़ा हुआ और सफर के दौरान उसने अपनी डायरी में अपनी नौकरी के बारे में लिखा, 'तुम्हें जीते हुए भी मैं तुमसे घृणा कर रहा हूँ।'

पता पूछते-पाछते जब के.सी. रात के वक्त घर पहुँचा तो चाचा खाट पर लेटे हुए थे और माँ एक कुर्सी पर बैठी छत की कड़ियाँ ताक रही थी। क्षणांश के लिए के.सी. के मन में आया कि वह उल्टे पाँव लौट चले। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतने अरसे बाद, अपना सब कुछ खो चुकी माँ का सामना कैसे करे? निश्चित रूप से वह पिता का ही नहीं माँ का भी अपराधी है। अकेली माँ ने कैसे सहा-जिया होगा यह हादसा। चाचा भी पता नहीं कब पहुँचे होंगे। और बिट्टो? सहसा उसे याद आया कि घर में बहन तो दिखाई ही नहीं दे रही है। कौन-कौन शामिल हुआ होगा पिता की अर्थी में? कपाल क्रिया किसने की होगी? तो क्या अब पिता की आत्मा ताउम्र भटकती फिरेगी। कहते हैं : बेटा कपाल क्रिया न करे तो पिता की आत्मा दर-दर भटकती है और रात-रात भर आर्तनाद करती है। के.सी. का कलेजा लरजने लगा। वह धीरे से माँ के पास जाकर खड़ा हो गया। माँ उसी तरह छत की कड़ियाँ ताकती रही तो उसने माँ के सिर पर हाथ रख दिया जैसे माँ छोटी-सी बच्ची हो और के.सी. माँ का संरक्षक।

हाथ के स्पर्श से चौंककर माँ ने के.सी. को देखा। देर तक देखती रही और फिर गूँजा उसका आर्तनाद। दीवारों को तोड़ता, छत को फोड़ता एक सहनशील औरत का असहनीय विलाप। चाचा चौंक कर जाग गए और के.सी. को देख आहिस्ता से बोले, 'आ गया काली। बहुत देर कर दी। भाई साहब के साथ बुरा हुआ, वह लावारिस की तरह जले।'

के.सी. की आँख रोने लगी और उसने माँ का चेहरा अपने सीने में कसकर चिपटा लिया। फिर वह चाचा से बोला, 'क्या बिट्टो भी नहीं आई?'

'बिट्टो आई थी दो दिन बाद, आज सुबह चली गई। जँवाई साहब साथ नहीं थे। वह खुद बीमार हैं' चाचा ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा, 'यह तो अच्छा हुआ कि मैं फूल चुननेवाले रोज पहुँच गया था वरना...' चाचा ने कश लिया और छत घूरने लगे। माँ अभी तक बिलख रही थी।

तब तक कुछ पड़ोसी भी आ गए थे। एक औरत दूसरी के कान में फुसफुसा रही थी, 'यो बड़ा लड़का दिक्खे। हाय राम! ऐसे लड़कों से तो निपूते भले।'

के.सी. ने उस औरत को बड़ी ही कातर निगाहों से देखा। फिर उसका सिर झुक गया। औरत अपनी जगह ठीक थी।

जिसे पलक झपकाए बगैर जागना कहते हैं, के.सी. उस रात ठीक वैसे ही अपलक जागता रहा। उसके पास न पड़ोसियों के प्रश्नों का जवाब था, न ही माँ के आहत मन का। माँ ने पूछा था कि वह इतना कठोर कैसे हो गया? वह कह ही नहीं सका कि वह कभी भी कठोर नहीं रहा। माँ ने बताया था कि अंत समय तक पिता की जुबान पर उसी का नाम रहा। उन्होंने तो उसे माफ कर दिया था। वे तो चाहते थे, रिटायर होने के बाद काली के ही पास जाकर रहेंगे। के.सी. चुप सब सुनता रहा था और बेआवाज बेआँसू रोता रहा था। उसने तय किया था कि तेरहवीं के बाद माँ को अपने साथ ही ले जाएगा।

के.सी. दफ्तर पहुँचा तो वहाँ एक अफवाह सबकी मेज पर चिपकी हुई थी कि पोस्टर वाली स्त्री का कत्ल हो गया। लालवानी साहब अखबारों के टेलीफोन खड़का रहे थे लेकिन वहाँ से सिर्फ यही कहा जा रहा था 'सुनते हैं।'

आखिर तीन बजे सांध्यकालीन अखबार दफ्तर में आ ही गया। यह अफवाह नहीं सच्चाई थी कि पोस्टरवाली स्त्री को उसके अंगरक्षकों ने उसके ही घर में गोलियों से भून दिया था।

पाँच बजे शाम लालवानी साहब ने घोषणा कर दी कि अगले तीन दिन दफ्तर बंद रहेगा। के.सी. और गीता भसीन चुप-चुप दफ्तर से बाहर निकले और देर तक खड़े रहे।

'अब?' के.सी. ने सहसा पूछा।

'हाँ अब?' गीता ने जवाब दिया।

'यह सचमुच बुरा हुआ।' के.सी. ने यूँ ही कहा।

'हाँ, यह सचमुच ही ज्यादा बुरा इसलिए हुआ कि हत्यारे हमारी बिरादरी के थे।' गीता ने अफसोस के साथ कहा।

'हत्यारों की कोई बिरादरी नहीं होती।' के.सी. ने गीता के कंधे पर हाथ रख दिया।

'काश ऐसा ही हो।' गीता ने जवाब दिया और के.सी. की हथेली को अपने हाथों में ले लिया।

'तो अब हम तीन दिनों तक मिलेंगे नहीं क्या?' के.सी. ने हँसते हुए पूछा।

'क्यों नहीं मिलेंगे?' गीता ने तत्परता से जवाब दिया और मुस्कराई।

'ऐसा करें, कल मैं तुम्हारे घर आऊँ, वहाँ से अपने घर चलेंगे। तुम्हें माँ से मिला देता हूँ।'

'कितने बजे?'

'शाम तीन बजे तक आता हूँ।'

'ओ.के.' गीता ने कहा और के.सी. की हथेली दबाकर छोड़ते हुए बोली, 'तो फिर कल का पक्का।' इसके बाद वह अपने बस स्टॉप की तरफ मुड़ गई।

सुबह नौ बजे माँ के झिंझोड़ने पर के.सी. जागा। माँ थर-थर काँप रही थी।

'क्या हुआ?' के.सी. हड़बड़ाकर उठ बैठा।

माँ ने खिड़की की तरफ इशारा किया। उसका चेहरा सफेद था और आँखें बाहर को निकली पड़ रही थीं। लगता था, माँ की आवाज डूब रही है। उसके गले से एक विचित्र किस्म की गों-गों निकल रही थी।

के.सी. झपटकर खिड़की की तरफ भागा और उसकी आँखें फट गईं। सामनेवाले प्रीतम सिंह जी का मकान धू-धू करके जल रहा था। मकान ही नहीं, खुद प्रीतम सिंह जी भी जल रहे थे और चीखते हुए इधर से उधर भाग रहे थे। उन्हें एक भीड़ ने घेरा हुआ था। भीड़, जिसके हाथ में लोहे की छड़ें, मिट्टी के तेल के पीपे और सरिए थे। भीड़ चीख रही थी - 'खून का बदला खून से लेंगे...' और जलते हुए प्रीतम सिंह जी पर सरियों की बारिश कर रही थी। आखिर प्रीतम सिंह जी ऐंठ कर गिरे और उनका समूचा बदन कोयले की तरह काला पड़ गया। उत्तेजित भीड़ अब कोछड़ साहब के घर की तरफ बढ़ रही थी। कोछड़ साहब मुल्क के माने हुए चित्रकार थे। के.सी. के मुँह से चीख निकली और वह तेजी से कपड़े पहनकर तैयार होने लगा। उसे सहसा ही गीता भसीन की याद आ गई थी।

माँ ने झपटकर के.सी. को पकड़ा और बिस्तर पर बिठा दिया। के.सी. कसमसाया और हाँफते स्वर में बोला, 'माँ मुझे रोको मत, गीता की जान खतरे में है। वह तुम्हारी बहू है माँ।'

'क्या?' माँ ने चौंककर कहा और के.सी. दौड़ता हुआ घर से बाहर निकल गया। बाहर कोछड़ साहब और उसकी पत्नी के ऊपर मिट्टी का तेल छिड़का जा रहा था और उनका मकान उनकी पेंटिंग्स सहित धू-धू कर रहा था। के.सी. घबरा गया। उसका एक पाँव तेज तेज चल बस स्टॉप तक पहुँचना चाहता था और दूसरा पाँव लकवे की-सी स्थिति में में आगे बढ़ने से लाचार था। के.सी. जलते हुए मकानों, स्कूटरों और इंसानों के सामने से होता हुआ माथे पर पसीना और हलक में काँटे सँभाले हुए बस स्टॉप तक पहुँच ही गया। उसका दिल 'धड़ धड़' कर रहा था और टाँगे काँप रही थीं।

बसें चल नहीं रही थीं। बस स्टॉप पर चिड़िया का बच्चा भी नहीं था। पीछे कॉलोनी से उत्तेजित भीड़ का शोर सुनाई पड़ रहा था। सड़क के दोनों ओर ट्रक जल रहे थे। के.सी. का दिल जोर से रोया। तभी एक स्कूटर वहाँ से गुजरा। के.सी. जोर से चीखा - 'रोको।'

स्कूटर 'च्चीं च्चीं' कर रुक गया। स्कूटर ड्राइवर ने पीछे झाँककर देखा और के.सी. को देख स्कूटर नजदीक ले आया। गीता भसीन का घर के.सी. के घर से सिर्फ दस किलोमीटर दूर था लेकिन स्कूटर वाला पचास रुपए माँग रहा था।

'दूँगा।' के.सी. ने कहा और उछलकर स्कूटर में बैठ गया।

रास्ते भर के.सी. थर-थर काँपता रहा। भीड़ ने स्कूटर को कई जगह रुकवाया और भीतर बैठे के.सी. को देख जाने की स्वीकृति दे दी।

जहाँ गीता भसीन का मकान था वहाँ एक जला हुआ खंडहर खड़ा था। मकान के सामने तीन जली हुई लाशें थीं। के.सी. पागलों की तरह लाशों पर झुका और एक लाश के पास बैठते ही उसकी रुलाई कंठ तोड़कर गूँजी। वह गीता भसीन थी। उत्तेजक उभारों, खूबसूरत अंडाकार चेहरेवाली गीता भसीन जो चलती थी तो लगता था जैसे अपने सौंदर्य पर खुद ही शर्मसार है। बोलती थी तो लगता था मानों दूर कहीं गिरजाघर में प्रार्थना हो रही हो। जिसकी हथेलियाँ नर्म थीं और पाँव कोमल। जिसका दिल मोम-सा मुलायम था और जिसका मस्तिष्क स्वस्थ था। जो सर से पाँव तक प्यार में डूबी हुई थी और जिसने के.सी. को इस असहनीय दुनिया में भी जीने का संबल दिया हुआ था। के.सी. ने उसे पहचाना उस अँगूठी से जो आग की शिकार होने से पहले काफी खूबसूरत थी और जिसमें नग की जगह खुदा हुआ था - 'के।'

यह अँगूठी के.सी. ने पिछले दिनों गीता को राजधानी की एक महँगी दुकान से पाँच सौ रुपए में खरीद कर दी थी। ये पाँच सौ रुपए के.सी. ने पाँच महीने की बचत से जमा किए थे। अँगूठी गीता भसीन की जली हुई उँगली की जली हुई हड्डी में फँसी हुई थी और उसके नग की जगह खुदा 'के' अक्षर आग में झुलसने के बावजूद पढ़ा जा सकता था।

के.सी. से उठा नहीं गया।

फिर के.सी. से कई दिन तक उठा नहीं गया।

जब वह उठा तो मुल्क में चुनाव हो रहे थे।

के.सी. ने चाहा कि इस बार के चुनाव में पोस्टरवाली स्त्री की पार्टी नेस्तनाबूद हो जाए। देश के बुद्धिजीवी भी यही चाहते थे। अखबार भी यही चाहते थे और विरोधी दल तो चाहते ही थे।

लेकिन परिणाम आया तो के.सी. के मस्तिष्क और हृदय पर इतने जोर का घूँसा पड़ा कि उसके बदन का जर्रा-जर्रा हिल गया और रेशा-रेशा बिखर गया।

पोस्टरवाली स्त्री की पार्टी भारी बहुमत से चुनाव जीत गई थी और विरोधी दलों के छोटे तो छोटे, बड़े-बड़े नेताओं की जमानतें जब्त हो गई थीं।

यह उस विचित्र देश के विचित्र नागरिकों का विचित्र जनादेश था।

सचमुच, वह एक विचित्र देश था। वहाँ प्रेम करनेवाले लोग जिंदा जलाए जा सकते थे और नफरत करनेवाले लोगों का राजतिलक किया जा सकता था।

सचमुच, वह एक विचित्र देश था जिसमें इस कहानी के नायक कालीचरण माथुर ने प्रेम करना चाहा था।


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