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कहानी

त्रास
रवींद्र कालिया


माँ मोढ़े पर, गुपचुप बैठी उसका स्वैटर बुन रही थी। पापा कमरे में नहीं थे। उनका कोट टँगा था, जिसमें से नैप्थलिन की बास आ रही थी। उसने कमरे को नए रूप में देखा तो वह अस्त-व्यस्त हो गया, अपने को समेटते हुए उसने माँ से कहा कि वह आया है।

उसे उम्मीद थी कि माँ उसके इंतजार में फाटक पर खड़ी होगी और इसी संभावना में उसने स्कूटर गली के मोड़ पर ही छोड़ दिया था लेकिन कमरे का वातावरण देखकर उसे लगा कि जिस बात का उसे खतरा था, वह हो चुकी है। वार्डरोब अपनी जगह पर नहीं थी। रैक में जूते पड़े थे और किताबें अलमारी में पहुँच गई थीं और माँ फाटक पर इंतजार करने की बजाय बिना चश्मे के मशीन की तरह स्वैटर बुन रही थी।

'मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी। तुम रोज इसी वक्त आते हो? माँ ने पूछा।

उसने बताया कि वह लगभग रोज ही इस वक्त आता है और आकर माउथ ऑर्गन बजाया करता है फिर सो जाता है।

'तुम्हारी किसी भी बात पर विश्वास नहीं रहा।' माँ ने कहा, 'पड़ोसिन बता रही थी कि तुम रात को बहुत देर से आते हो और कई बार नहीं भी आते। कई बार दिन-रात कमरे में ही बंद रहते हो।'

उसने कहा, उसने पड़ोसिन को कभी नहीं देखा। वह उससे बात नहीं करता। उसे यह भी नहीं पता कि उसके कितने बच्चे हैं। पिछली गर्मियों में उनके यहाँ बच्चा हुआ था और उन्होंने वार्डरोब उसे दे दी थी। उसके पति ने कहा था, उनके पास जगह बहुत कम है। उनके पास निरंतर जगह कम होती जा रही है।

वह शायद इस बात से माँ का ध्यान हटाना चाहता था।

'तुम उनसे बात क्यों नहीं करते? तुम्हारा इस शहर में कौन है? तुम्हें दुआ-सलाम तो रखनी ही चाहिए।' माँ गंभीर थी।

उसने कहा, उसे इन तमाम बातों का पता है और वह कभी-कभी दुआ सलाम किया करता है।

माँ ने स्टोव पर दूध चढ़ा दिया और पूछा, 'दूध के साथ क्या लोगे?'

उसने कहा कि वह दूध नहीं पीता। वह कॉफी के साथ 'जिंजर बिस्किट' लेगा।

'वे कड़वे बिस्किट? माँ ने कहा, 'तुम मुझे दुखी करते हो। तुम सेहत का खयाल क्यों नहीं रखते। तुम्हारा रंग कितना काला हो गया है।'

उसने कहा कि वह सेहत का बहुत खयाल रखता है और उसका रंग पहले से ही काला है।

उसकी बात का माँ पर कोई असर नहीं हुआ। माँ ने दूध का गिलास उसके हाथ में थमा दिया, जैसे वह दूध ही पिएगा। माँ ने कहा, 'तुम्हारे पापा बहुत खुश थे कि तुम्हारे कमरे से सिगरेट की राख नहीं मिली।'

उसने कहा कि वह अब सिगरेट नहीं पीता। उसे खुशी हो रही थी कि वह इतनी कुशलता से सफाई कर सकता है। उसने वार्डरोब और रैक की ओर देखा तो उसे अपनी मूर्खता पर खेद होने लगा। उसने तमाम चीजें फेंक दी होतीं परंतु वह रद्दी वाले का इंतजार करता रहा था।


दूध का घूँट लेते हुए उसने माँ की ओर देखा। उसे लगा, उसकी माँ बूढ़ी हो रही है। पिछली बार जब माँ को देखा था, माँ की गर्दन पर झुर्रियाँ नहीं थीं। वह माँ के सामने परास्त नहीं होना चाहता था। उसने कहा कि जब वह इस मकान में आया था तो सिगरेट के ढेरों टुकड़े थे और राख और खाली बोतलें। बियर और व्हिस्की की खाली बोतलें। उसने निहायत सादगी से बच्चों की तरह आश्चर्य प्रकट करते हुए माँ की ओर देखा। उसने दूध का गिलास वहीं मोढ़े के पास रख दिया और मोढ़े पर चढ़कर माँ को बोतलें दिखाने लगा जो वार्डरोब की छत पर रद्दी के नीचे दबी पड़ी थीं।

माँ ने बोतलें देखीं तो चौंकी नहीं बल्कि रहस्य खुलने की एक हल्की सी खुशी उनकी झुर्रियों में फिसलने लगी। माँ ने पूछा, 'ये बोतलें तुम्हारी नहीं?'

वह हँसा। उसकी होतीं तो वह फेंक न देता।

वह हँसी नहीं, न आश्वस्त हुईं। वह उसे पूरी तरह टटोल लेना चाहती थीं। माँ ने कहा, 'तुम्हारे पापा ने देखीं तो बहुत उदास हो गए। वह वापिस चलने के लिए कह रहे थे। वे मामूली-मामूली बातों को लेकर परेशान हो जाते हैं।'


उसने पूछना चाहा कि पापा कहाँ हैं मगर एक अपराध भावना के अधीन वह पूछ नहीं पाया। उसे उम्मीद नहीं थी कि ये लोग आते ही इस तरह घर की सफाई करने लगेंगे। रैक में जूते पड़े थे। उसने जूतों को टटोलकर देखा। वहाँ कुछ नहीं था। माँ रसोई में चली गई तो उसने अलमारी खोल कर किताबों के पीछे कुछ टटोला और बिना देखे एक पैकेट उठाकर जेब में रख लिया। उसने ये तमाम चीजें फेंक क्यों नहीं दीं? वह शायद इस तरह चीजें नहीं फेंका करता। वह पड़ोसी को दे देता लेकिन उसे मालूम है कि उसके पड़ोसी का इसमें विश्वास नहीं, ईश्वर में विश्वास है। उसकी मौजूदगी से दोनों विस्मित हुए होंगे। वह लज्जित-सा खड़ा रहा। यह वह अपने पापा की अलमारी में भी अकसर देखा करता था। छिपाने की जगह भी उसने पापा से ही सीखी है या उत्तराधिकार में प्राप्त की है। सर्वप्रथम इसे देखकर वह भी विस्मित हुआ था लेकिन वह कभी पूछताछ नहीं कर पाया था, क्योंकि वह जानता था, पापा किताबों के पीछे वही चीजें रखा करते हैं जिनके उत्तर नहीं होते या जिनका कोई अर्थ नहीं होता, होता होगा मगर उसके लिए नहीं। पापा अपने सर्टिफिकेट, जीवन बीमा की पॉलिसी, मकान की रजिस्ट्री भी लोहे के गोल डिब्बे में रोल करके वहीं रखते थे, बैंक की पासबुक भी। वह अवकाश के क्षणों में पापा का बैंक-बैलेंस जरूर देखा करता था।


वह अनिश्चय की स्थिति में कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर उसने कमीज के बटन खोलकर कुछ विदेशी पत्रिकाएँ बनियान के नीचे छिपा लीं और बटन बंद करके मोढ़े पर बैठ कर बूटों के फीते खोलने लगा, खिन्न मन से। सुबह भी वह इसी खिन्नता के साथ उठा था। वर्षों बाद उसने इस शहर की सुबह देखी थी और उसे बहुत हैरानी हुई कि बसें इतनी सुबह चलने लगती हैं, इधर के डिपो पर लोगों की इतनी लंबी कतार होती है और अखबार इतनी देर पहले भी बिकते हैं। मैं गलत कह गया, उसे शायद इन तमाम बातों का पता था, लेकिन वह यह नहीं सोच सकता था कि वह इतनी देर से उठने वाला जीव है। स्टेशन जाने से पहले तक उसे यह एहसास भी नहीं था कि वह अपने घर वालों को 'रिसीव' करने जा रहा है। उत्सुकता-विहीन वह प्लेटफार्म पर सिगरेट फूँकता रहा और गाड़ी आते देख उसने सिगरेट फेंक दी थी और हाथ धो लिए थे, क्योंकि वह भूला नहीं था कि उसके पापा सिगरेट को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं। इसमें कुछ उसका भी दोष था। उसी की लापरवाही से एक बार उसकी खाट और बिस्तर जल गए थे और उसकी छोटी बहन ने केवल इतना बताया था कि जब वह कॉलेज से लौटी थी तो पापा बाल्टियाँ भर-भर कर आग बुझाने में व्यस्त थे। इस सिलसिले में उसकी पापा से आज तक कोई बात नहीं हुई थी। इतना जरूर हुआ था कि उस दिन के बाद उसने पापा के सामने सिगरेट का विज्ञापन तक नहीं पढ़ा, बल्कि जब रेडियो पर भी सिगरेट का विज्ञापन आता था तो वह स्टेशन बदलने को मजबूर हो जाता था।


घर वाले डिब्बे से उतरे तो उसे बहुत ही पहचाने हुए लगे। न जाने क्यों उसे आशा नहीं थी कि वह इतनी सरलता से उन्हें पहचान लेगा और चेहरे इतने पहचाने हुए भी हो सकते हैं। उन्हें नमस्कार करते ही उसे विश्वास हो गया कि उसकी भी माँ है, जिसकी गर्दन के नीचे झुर्रियाँ पड़ गई हैं और जिसका एक दाँत टूट गया है, और जो उसके सिर पर, इस तरह इतने अधिकार से हाथ रख सकती है और उसका एक बाप है, दूसरों के बाप जैसा ही या 'बाप' की कल्पना जैसा - जिसके सर के तमाम बाल सफेद हो गए हैं और जो बार-बार थूक रहा है। उन्हें देखते ही उसे लगा था जैसे वे खिलौने हों और घर जाते ही उन्हें कार्निश पर सजा देगा। मुझसे फिर गलती हो गई, उसके घर कार्निश नहीं है, मेज भी नहीं। माँ नाराज होगी, झाड़ू भी नहीं। उनसे बात करते हुए उसे विश्वास नहीं आ रहा था कि वह इन्हें ही पत्र लिखा करता है और इनके पत्र पढ़कर वह कितनी लापरवाही से जेब में ठूँस लिया करता है। इन्हें तो शायद वह बहुत कुछ लिख सकता था, जो उसने कभी नहीं लिखा। उसने कुछ रटी-रटाई पंक्तियाँ ही हमेशा लिखी हैं, जिन्हें लेकर उसकी छोटी बहन बहुत चिढ़ा करती थी। एक ही इबारत के खत और फिर काली स्याही से लिखे हुए। वह अकसर शिकायत करती। उसकी शिकायत जायज थी। उसकी छोटी बहन की शादी न हो गई होती तो उनका इकट्ठे समुद्र देखने का इरादा था। वह मोढ़े से उठने लगा तो उसका पैर दूध के गिलास से टकरा गया। गिलास टूट गया और गिलास में कैद दूध के खरगोश फर्श पर लोटने लगे।

'तुम्हें दूध नहीं पीना था, नहीं पिया।' माँ के कमरे में आकर कहा।

वह अपने पैर नचाता हुआ, खाट की ओर बढ़ गया, खिड़की से बाहर गली की ओर देखने लगा। सामने लगी में बैठी बुढ़िया उसी तरह प्रतीक्षा की मुद्रा में बैठी जबड़े हिला रही थी। उसने खिड़की की तरफ पीठ कर ली।

'तुम्हारा किसी से झगड़ा हो गया है? माँ ने पूछा, 'तुम इतने उदास क्यों हो?

उसने कहा कि उसका किसी से झगड़ा नहीं हुआ और वह उदास नहीं है वह शायद थक गया है।

'मुझे लगता है हमारे आने से तुम्हें असुविधा हो रही है।'

उसने कहा कि उनके आने से वह बहुत खुश है, और उसे बहुत अच्छा लग रहा है।

'पड़ोसिन कह रही थी कि उसने तुम्हें कभी हँसते हुए नहीं देखा।' माँ ने कहा।

उसने कहा कि पड़ोसिन की ओर देखकर उसे कभी हँसी नहीं आई।

'मुझे लगता है, तुम्हें कोई बात कचोट रही है और तुम उसे निरंतर टाले जा रहे हो। किसी लड़की-वड़की की तो बात नहीं? माँ उत्सुकता से उसकी ओर देखने लगी।

उसने कहा कि वह लड़कियों को लेकर कभी परेशान नहीं रहा। उसे इस बात की खुशी है।

'पी' कौन है? माँ ने कहा, 'किशोर कुछ बता रहा था।'

उसने कहा कि किशोर बरसों पुरानी बात करता होगा।

'तुमने उसे यह भी लिखा था कि तुम बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हो। वह आया था और बता रहा था। उसके घर फिर जुड़वाँ बच्चे हुए हैं।' माँ ने कहा।

उसने कहा कि वह किशोरी को चिढ़ाने के लिए तमाम बातें लिखा करता है, मगर उसने यह नहीं सोचा था कि किशोरी अब भी बच्चों की तरह बातें करता होगा। उसे दुख हुआ कि अब वह किशोरी को भी नहीं लिख पाएगा। किशोरी को वह इसलिए लिखता रहा है कि किशोरी उससे सैकड़ों मील दूर है और उसे अच्छा लगता था कि वह आस-पास नहीं टूटता, उल्कापात की तरह हजारों मील दूर जाकर बिखरता है।


माँ ने सुराही का पानी कमरे में बहा दिया और फिर कपड़े से फर्श पोंछ दिया। पानी उसकी जुराबों में भी चला गया था, माँ ने जुराबें बाहर फेंक दीं, उसके बूट रैक में रख दिए और उसके पास ही खाट पर बैठ गई और उसके सर पर हाथ फेरने लगी।

उसे लगा, वह रो पड़ेगा।

'तुम्हें क्या हो गया है, तुम्हें क्या कष्ट है?

वह कहना चाहता था कि उस पर विश्वास करना चाहिए, उसे कुछ नहीं हुआ और उसे कोई कष्ट नहीं है, परंतु वह चुप रहा। गीली आवाज में बात-चीत करना उसे सदा गलत लगा है। वह सर नीचा किए बैठा रहा। उससे बरदाश्त नहीं हो रहा था कि माँ उसे जानना चाह रही है और उसे लेकर चिंतित हो रही है, जबकि वह अच्छी तरह से है।

'यह तुम्हारी कमीज के अंदर क्या है? माँ ने उसकी कमीज छूते हुए कहा।

उसने कहा कि ये किताबें हैं और उसे किताबें हाथ में पकड़कर घूमने की आदत नहीं है।

'दिखाओ, कौन सी किताबें हैं!' माँ ने कहा।

उसने कहा कि ये अंग्रेजी की किताबें हैं और वह जल्दी ही माँ के लिए गीता लाएगा। उसके एक दोस्त की किताबों की दुकान है।

उसने किताबें निकालकर बड़ी लापरवाही से अलमारी में फेंका दीं। उसने कल ही किताबों पर अखबार के रैपर चढ़ाए थे।

'मुझे बड़े अक्षरों वाली रामायण चाहिए। पहले वाली रामायण अब पढ़ी नहीं जाती। उसके अक्षर बहुत छोटे हैं।' माँ ने कहा और अपनी धोती से चश्मा साफ करने लगी।

'चश्मा पहनकर भी नहीं पढ़ा जाता? उसने पहली बार माँ से कुछ पूछा।

'नहीं। बाईं आँख तो बेकार हो रही है।' माँ ने कहा।

उसने कहा कि वह कल छुट्टी लेकर माँ को अपने साथ नजर टेस्ट करवाने ले जाएगा।

'तुम्हें तो छुट्टी का बहाना चाहिए।' माँ ने कहा।

वह हँसा। माँ आखिर उसकी माँ है। माँ ने उसका हाथ चूम लिया। हाथ से जरूर सिगरेट की बास आ रही होगी, लेकिन माँ ने कुछ नहीं कहा। उसने इन लोगों के आने से पहले अपने को संतुलित और व्यवस्थित क्यों नहीं कर लिया, वह सोचने लगा, मगर इससे पहले किसी प्रकार के असंतुलन या अव्यवस्था का अनुभव भी उसने नहीं किया था।

माँ बाहर गई तो उसने महसूस किया कि स्नायविक तनाव से उसका सर भारी हो गया है। 'ट्रेंकुलाइजर' की शीशी उसने कल रात छिपा दी थी। उसने दबे पाँव वार्डरोब पर चढ़कर रोशनदान से शीशी निकालकर जेब में रख ली।

सुराही में पानी नहीं थी, गोली निगलने से पूर्व वह रसोई से गिलास उठाकर नल की ओर चल दिया। उसने गोली मुँह में रखी और पानी का लंबा घूँट लिया।

'यह तुमने क्या खाया है?

उसने पीछे मुड़कर देखा, माँ खुफिया सिपाही की तरह उसके पीछे खड़ी थी।

'क्या खाया है, बोलो? माँ भय और क्रोध से काँप रही थी।

उसने कहा कि उसके सर में दर्द हो रहा था, उसने 'एनासिन' ली है।

उसने काँच का गिलास मजबूती से पकड़ा हुआ था। माँ ने उसके हाथ से गिलास ले लिया और आँखें मूँद कर दवा की तरह पानी पिया। फिर नल के नीचे सुराही रख दी, जो वह अपने साथ लाई थी। वह अभियुक्त की तरह कुछ देर वहाँ खड़ा रहा, फिर माँ के पीछे-पीछे कमरे में आ गया।

माँ ने अपने पर्स में से कुछ गोलियाँ निकालकर उसके सामने रख दीं और पूछा, 'ये कैसी गोलियाँ हैं?

ये गोलियाँ उसकी चिरपरिचित गोलियाँ थीं।

'जानते हो तुम्हारे बिस्तर में क्या-क्या मिला ये गोलियाँ, पत्र और पिनें।'

'तुमने कभी अपना बिस्तर झाड़ा है? माँ के होंठ फड़फड़ा रहे थे।

उसने कहा कि वह बिस्तर नहीं, कभी-कभी चादर झाड़ा करता है और उसने आज सुबह ही नई शीट बिछाई थी।

'ये कौन-सी गोलियाँ है? माँ ने कहा, 'तुम नहीं बताओगे तो मैं खुद खाकर देख लूँगी।'

उसने माँ की हथेली से गोलियाँ उठा लीं और बोला कि ये वे गोलियाँ नहीं हैं जिन्हें खाकर उसके मित्र ने आत्महत्या की थी। ये थकान की गोलियाँ हैं और उसे एक सरकारी डॉक्टर ने ही लिख कर दी हैं। उसे अब थकान नहीं रहती, अब वह अपनी सेहत का पूरा-पूरा खयाल रखता है और दोनों वक्त भोजन करता है। दूध उसे कभी अच्छा नहीं लगा, परंतु उसे उम्मीद है कि वह ओबलटीन मिलाकर पिएगा तो जरूर पसंद करेगा...


वह बोलता जा रहा था और माँ बहुत ही निरीहता से उसकी ओर ताक रही थी, जैसे अपनी आँखों के सामने उसकी मृत्यु देख रही हो।


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