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कविता

बेयालिस के साथी
रमाकांत द्विवेदी रमता


साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी

गरजे-तड़के-चमके-बरसे,  घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझै, अइसन रात अन्‍हारी
चारो ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो भदवारी
डेगे-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी

हाथे कड़ी, पाँव में बेड़ी, डाँड़े, रसी बन्‍हाइल
बिना कसूर मूँज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खारित तेरहो करम पुराइल ए साथी

भूखे पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गाँथि लुगारिया रनिया झुरवे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवाँड़ घर कूकुर पइसे, ले छुँछहँड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आँखी नीन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबियाइल ए साथी

कूर सँघाती राज हड़पते, भरि मुँह ना बतियावसु
हमरे बल से कुरुसी तूरसु, हमके आँखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भँवर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंतकाल नगिचाइल ए साथी 


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