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कविता

एक सपना टूटता है
शार्दुला झा नोगजा


आज चुप्पी मूढ़ता है
एक सपना टूटता है

एक हरियाली मेरे जंगल से
नोटों तक चली
युगों से बोरी में लिपटी
शायरी अब पक चली
फल पका अब फूटता है
एक सपना टूटता है

भाग पातीं अब न गलियाँ,
ट्रेफिकों ने पाँव छीने
एक ही मंजर दिखातीं
थक गईं ये ट्रेड मशीनें
कुछ न पीछे छूटता है
एक सपना टूटता है!

क्रेन, पोतों, टेंकरों के बीच
सूरज क्या करेगा
अब कहाँ पानी में जाकर
आसमाँ डुबकी भरेगा
क्षितिज पल-पल रूठता है
एक सपना टूटता है!

अमन के हैं मायने क्या
वो बताएँगे हमें अब
छत जमीनें जा लगीं
औ’ रास्ते छलनी हुए जब
शहर छाती कूटता है
एक सपना टूटता है!


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