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कविता

सुनो राजन !
बृजनाथ श्रीवास्तव


सुनो राजन !
तुम्हारे सौंध का
गुंबद बहुत ऊँचा ।

गुंबदों की रोशनी में
खून मेरा ही जला है
और मेरे स्वाद-पथ पर
ही तुम्हारा काफिला है

सुनो राजन !
तुम्हारा स्वर्ण-रथ
हमने बहुत खींचा।

पीढ़ियों दर पीढ़ियों
तुमने हमारा धैर्य जाँचा
रोटियाँ जब-जब तलाशी
गाल पर पड़ता तमाचा

सुनो राजन !
तुम्हारी राजनय ने
कब हमें सींचा।

हाँ अभी हम हाथ जोड़े
आपके द्वारे खड़े हैं
किंतु राजन ! सोचिए
हम लोकजन कितने बड़े हैं

सुनो राजन !
रहे अब किस
तरह हरियर बगीचा।


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