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कविता

ये शहर तो
बृजनाथ श्रीवास्तव


ये शहर तो
रेत से उजले चमकते हैं।

आदमी तो
खोज में जल की भटकता है
दोपहर क्या
दिन सुबह से ही अखरता है

साँझ से ही
मन उलूकों के उछलते हैं।

धूप
महलों में पिए
वातास के झोंके
कौन जाने
कब उठेगी
साँस मुँह धोके

राजपथ
पगडंडियों के तन कुचलते हैं।

इस महल में
आग हँसती लोग जलते हैं
और हँस-हँस कर
सियासत खेल चलते हैं

चाँदनी
तन निर्वसन कितने मचलते हैं।


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