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कविता

अंबर की छबियाँ
राघवेंद्र तिवारी


खुलीं पंक्तियाँ
करीब नभ के बगुलों की
मौसम को छल गई
सीमाएँ लाँघ गई धूप की
और बस्तियाँ जैसे जल गईं।

पश्चिम में लौट
चली खामोशी
आँखों का आयतन बढ़ाती-सी
सिकुड़ गईं
रोशन परिस्थितियाँ
संध्या को तनिक मुँह चिढ़ाती-सी
खड़े हम सभी
यहाँ प्रतीक्षित से
अंबर की छबियाँ सजल गईं।

ढलता-सा लगा
व्योम का जादू
हाथों में सभी अर्थ फिसल गए
जैसे बासी
उदास लम्हों के
तंग इरादे कहीं निकल गए
तय नहीं हुए
उनके संबोधन
लोक की प्रवृत्तियाँ बदल गईं।


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