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कविता

तुम सत्यवान थे
राघवेंद्र तिवारी


तब भी तुम
अर्थवान थे
मैं जैसे सावित्री
और तुम सत्यवान थे।

मीलों पसरी उजास
जैसे अपनेपन में
नहीं कहीं थी निराश
ऊर्जा रही तन में
तब भी तुम
प्रवहमान थे
मैं जैसे कवयित्री
और तुम साम गान थे।

आँखों में था विराट
स्वप्न यह अदेखा-सा
प्राण-मंत्र था सपाट
जीवन की रेखा-सा
तब भी तुम
शक्तिमान थे
मैं वनजा परवर्ती
और तुम विवस्वान थे।

बस अपनी ओर झुका
कोण यह पुरातन-सा
जिसका रेखा गणित
गद्य के प्रवर्तन-सा
तब भी तुम
सावधान थे
मैं जैसे थी स्त्री
और तुम संविधान थे।


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