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कविता

माँ की टाँक लगे
राघवेंद्र तिवारी


जो लोरियाँ सुनी थी मैंने
माँ की टाँक लगे
उनके परवर्ती सुर अब
परिवर्तित हो उमगे।

उन्मीलित पीसा करती माँ
घर का सन्नाटा
तब मिलता था घर की
आवश्यकता का आटा
पौर सानते गोबर का
आध्यात्म कथा बनते
सारा काम समेट लिया
करती थी सुबह जगे।

पनघट से चुपचाप
घड़ोंची तक जल का चिंतन
यमुनोतरी बनी भर देती
सारा वृंदावन
बाहर पानी के किस्सों में
तैराया करती
वह पतंग सी बादल में
आशीषों के तमगे।

अन्नपूर्णा बनी रसोई में
चुपचाप दिखी
माँ ने, तृप्ति, सभी के
चेहरों पर वाचाल लिखी
सबके उत्तर दें डाले
भोजन में तृप्ति जगा
जो जो प्रश्न रहे लोगों के
मन में कभी उगे।


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