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कविता

वृक्ष नहीं लिखता
राघवेंद्र तिवारी


वृक्ष नहीं लिखता पत्तों में
जीवन की जड़ता
हवा लौटकर भले पूछ ले
वन का नया पता।

टूट चली मौसम की
वातनुकूल जुगलबंदी
वातावरण नहीं कर पाया
खुद की हदबंदी
धूप बदलियों में
छिप कर धीमें से कहती है
बहुत दिनों तक नहीं टिकाऊ
इसकी रोचकता।

झील बनी दर्पण, सूरज की
परछाईं लेकर
और किनारे एक टिटहरी
खड़ी हुई तन कर
नहीं लौटना चाह रही है
भरी दोपहर में
किसी स्वार्थी महिला-सी
केवल आभार जता।

कोई-कोई हुई जा रही
व्यापक विस्तृतता
भूल गई फैलाव माँगती
जल की नैतिकता
सारा संभ्रम लगा लौटने
गहराई जैसा
परिवर्तन के हाथ लगी
बादल की भावुकता।


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