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कविता

आवरण की बात
मधु प्रसाद


आइए कुछ दूर बैठें
जागरण की बात कर लें
उम्र अब ढलने लगी है
संतरण की बात कर लें।

आँधियों ने जंगलों को
रौंद डाला और लूटा
हर बसेरे को उजाड़ा
हर चमन से तोड़ बूटा
आज उसकी हार निश्चित
प्रतिफलन की बात कर लें।

सूर्य से लड़ने चला था
बाबरा काला अँधेरा
खुद मगर मन में यही था
बाँह में आए सबेरा
होश उसके उड़ गए हैं
आचरण की बात कर लें।

था समंदर बहुत प्यासा
दोष नदियों का निकाला
आत्म चिंतन कर न पाया
सोच का निकला दिवाला
घाट पर ठहरा हुआ है
आचमन की बात कर लें।

हौसलों से बात कर लो
साथ रहने के लिए तुम
जोश फिर कायम रहेगा
और होगा तेज दमखम
हाथ से ले आज दरपन
आवरण की बात कर लें।


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