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कविता

लड़की
जय चक्रवर्ती


घर से कॉलिज बस में
करती
रोज सफर लड़की।

पंख हौसलों में
आँखों में
बीज उम्मीदों के
कदम-कदम पर
नसीहतें
कोड़े ताकीदों के

सबको लेकर रखती
सब पर
रोज नजर लड़की।

व्यंग्य, फब्तियाँ,
छेड़छाड़
जहरीली फुफकारें
भूखी-प्यासी
हत्यारी नजरों की
तलवारें।

एक साथ लाखों
विषधर
ढोती तन पर लड़की।

रुकें न उसके
कदम
उसे मंजिल तक जाना है
अपने होने का
जग को
अहसास कराना है

इसीलिए
सब सहकर चुप रहती
अक्सर लड़की।


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