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कविता

खुद से हारे मगर पिता
जय चक्रवर्ती


दुनिया-भर से जीते
खुद से -
हारे मगर पिता !

सफर पाँव में और
आँख में
सपनों की नगरी
छाती पर संसार
शीश पर
रिश्तों की गठरी
घर की खातिर
बेघर भटके
सारी उमर पिता !

जिनको रचने में
जीवन का
सब कुछ होम दिया
कदम-कदम
उन निर्मितियों ने
छलनी हृदय किया
किसे दिखाते
चिंदी-चिंदी
अपना जिगर पिता !

बोए थे जो
उम्मीदों के बीज,
नहीं जन्में
क्या जाने, क्या था
बेटा-बेटी
सबके मन में
कहाँ-कहाँ, किस-किस पर
आखिर
रखते नजर पिता !


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