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कविता

सब के सब नंगे
जय चक्रवर्ती


किसकी कौन कहे
हमाम में -
सबके सब नंगे !

बहरी राजसभा है सारी
अंधा राजा है।
बाहर-भीतर बंद महल का
हर दरवाजा है।
खुशहाली के इश्तहार
हर चौखट पर चिपके
यूँ बस्ती की हालत का
सबको अंदाजा है।

काजल की गंगा में
गूँज रही
हर-हर गंगे !

मुस्कानों पर अपना नाम
लिखा बटमारों ने
बिठा दिए हैं पहरे
चीखों पर जयकारों ने
अपने-अपने सम्मोहन के
इंद्रजाल रचकर -
नजर बाँध दी सबकी
मौसम के ऐयारों ने।

राजपाट का
गणित लगाते हैं
हिंसा-दंगे !


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