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कविता

रात मुझे था चंदा दीखा
संजीव निगम


रात मुझे था चंदा दीखा,
फूले-फूले फुलके जैसा
कहीं-कहीं से आड़ा-तिरछा, 
कहीं-कहीं से जला-जला सा।


मेहनत आटा, मिला पसीना,
दो हाथों से जम कर गूँथा,
कड़ी धूप में उलटा-पलटा,
दो रोटी को जम कर सेंका
पूरा दिन भर जलते-बुझते,
खुद ही चूल्हा, खुद ही चौका,
पेट की थाली, फिर भी खाली,
जाने है ये चक्कर कैसा।

अपनी किस्मत, सूखे टिक्कड़,
उन पर भी गिद्धों का पहरा
डरते-छिपते खाने में ही,
जाता अपना साँझ-सवेरा
पैनी चोंच, नुकीले नाखून,
बचना उनसे आफत ठहरा,
अपना हिस्सा हक हो अपना, 
जाने किस दिन होगा ऐसा।

सुख देते सपने रोटी के,
जहाँ नहीं डर कोई छीन ले
जी भर खाने की आशा में,
जी भर सोने का मन रखते
रात है छोटी, सपने छोटे,
तोड़ के रखते धूप के कोड़े
फिर कोल्हू के बैल सा पिसते
किसी और की जेब में पैसा।


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