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कविता

बौने बड़े दिखने लगे हैं
सोम ठाकुर


नजरिये हो गए छोटे हमारे,
मगर बौने बड़े दिखने लगे हैं,
चले इनसानियत की राह पर जो,
मुसीबत में पड़े दिखने लगे हैं।

समय के पृष्‍ठ पर हमने लिखी थीं
छबीले मोरपंखों से ऋचाएँ,
सुनी थीं इस दिशा से उस दिशा तक
अँधेरों ने मशालों की कथाएँ,
हुए हैं बोल अब दो कौड़ियों के,
कलम हीरे-जड़े दिखने लगे हैं।

हुआ होगा कहीं ईमान महँगा,
यहाँ वह बिक रहा नीची दरों पर,
गिरा है मोल सच्‍चे आदमी का,
टिका बाजार कच्‍चे शेयरों पर,
पुराने दर्द से भीगी नजर को
सुहाने आँकड़े दिखने लगे हैं।

हमारा घर अजायबघर बना है,
सँपोले आस्‍तीनों में पले हैं,
हमारा देश है खूनों नहाया
यहाँ के लोग नाखूनों फले हैं,
कहीं वाचाल मुर्दे चल रहे हैं
कहीं जिंदा गड़े दिखने लगे हैं।

मुनादी द्वारका ने यह सुना दी -
कि खाली हाथ लौटेगा सुदामा,
सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर
सुनेगा जुगनुओं का हुक्‍मनामा,
चरण जिनके सितारों ने छुए वे
कतारों में खड़े दिखने लगे हैं।

यहाँ पर मजहबी अंधे कुएँ हैं,
यहाँ मेले लगे हैं भ्रांतियों के,
लगी है क्रूर गृहवाली दशा भी,
महूरत क्‍या निकालें क्रांतियों के!
सगुन कैसे विचारों मंजिलों के
हमें सूने घड़े दिखने लगे हैं।


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