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कविता

वरुणदेव के अमृत घट से
हर्षवर्धन आर्य


वरुण देव के अमृत घट से
बहता जीवन रस प्रतिपल 
अरे सम्हालो धरतीपुत्रो 
नष्ट ना हो धरती का जल।

जल में धरती, धरती में जल
है अद्भुत ताना-बाना 
जल के बिन धरती पर अन्न का
उग सकता ना इक दाना 
पेड़ धरा की बाँहें बनकर  
बुला रहे होते हैं घन 
उमड़-घुमड़ घन सुख वर्षा से
भरते धरती का आँगन 
बहती सरस नेह की धारा
एकाकार हुए जल-थल। 

जल जीवन का सार धरा पर
जल सबसे अनमोल रतन 
जल बिन है जग सूना मरुथल
जल बिन है दुखमय जीवन 
थलचर-नभचर-जलचर सबका
जल ही है जीवन दाता
धरती पर जीवों का जल से
पिता-पुत्र का है नाता 
जो जल को दूषित करते हैं
करते मानवता से छल।

चाँद-सितारों पर पानी को
मानव आज रहा है खोज 
पर धरती के अमृत-घट को
दूषित करता है हर रोज 
भौतिक सुख में लिप्त रसायन
बहा रहा है नदियों में 
मिनटों में विषमय करता जो
अमृत बनता सदियों में 
आज सुधारोगे गर खुद को
तभी सुधर पाएगा कल।


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