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कविता

मन व्यथित मेरे प्रवासी
राकेश खंडेलवाल


गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावृत।
घिस गई जो पिट गई जो बात वह गाता नहीं हूँ
गा चुके जिसको हजारों लोग, दोहराता नहीं हूँ
भाव हूँ मैं वह अनूठा, शब्द की उँगली पकड़ कर
चल दिया जो पंथ में तो लौट कर आता नहीं हूँ
गीत में जो ढल रहा है, मैं स्वयं ही हूँ अनावॄत
कोई कृत्रिम भाव मैंने आज तक ओढ़ा नहीं है

गीत का सर्जक मुझे तुमने कवि अक्सर कहा है
और कितनी बार संबोधन मेरा शायर रहा है
मैं उच्छॄंखल आँधियों की डोर थामे घूमता हूँ
किंतु मेरा साथ उद्गम से सदा जुड़ कर रहा है
मैं विचरता हूँ परे आकाशगंगा के तटों के
पर धरा की डोर को मैने अभी तोड़ा नहीं है

मैं उफनती सागरों की लहर को थामे किनारा
मैं सँवरती भोर की आशा लिए अंतिम सितारा
मैं सुलगते नैन की वीरानियों का स्वप्न कोमल
लड़खड़ाते निश्चयों का एक मैं केवल सहारा
मैं वही निर्णय पगों को सौंपता जो गति निरंतर
और जिसने मुख कभी बाधाओं से मोड़ा नहीं है।

जो अँधेरे की गुफा में सूर्य को बोता, वही मैं
वक्ष पर इतिहास के करता निरंतर जो सही, मैं
उग रहा जो काल के अविराम पथ पर पुष्प मैं हूँ
शब्द ने हर बार स्वर बन कर कथा जिसकी कही, मैं
मैं सितारा बन निशा के साथ हर पग पर चला हूँ
व्यर्थ का संबंध कोई आज तक जोड़ा नहीं है।

जन्म लेती हैं हजारों क्रांतियाँ मेरे सुरों में
मैं लहू बन कर उबलता हूँ युगों के बाँकुरों में
मैं बदलता हूँ दिशा के बोध अपनी लेखनी से
मैं अटल हूँ शैल बनकर, हूँ प्रवाहित निर्झरों में
मैं निराशित स्वप्न को हूँ एक वह संदेश अनुपम
आस की जिसने कलाई को कभी छोड़ा नहीं है।


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