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कहानी

चंदू भाई नाटक करते हैं
मनोज कुमार पांडेय


चंदू भाई रो रहे हैं, हुलक-हुलक कर। अचानक उनके मन में बात उठी कि देखें कि वे रोते हुए कैसे लग रहे हैं? चंदू भाई रोते-रोते आईने के सामने जा कर बैठ गए। अब चंदू भाई रो रहे हैं और आईने में अपनी सूरत देख रहे हैं। चंदू भाई के होठों पर एक मुस्कराहट सी आने को होती है। बे...ए...ए...। रोते हुए कितना बुरा दिख रहा हूँ मैं। मंच पर कभी ऐसे रोया तो कितना भद्दा लगेगा। सामने की रो में बैठे दर्शकों पर भला क्या इंप्रेशन जाएगा। इस चेहरे के साथ तो कोई भी ताली या तारीफ मिलने से रही। तो?

तो अपने चंदू भाई ने चारों तरफ गौर से देखा। फिर उठे और खिड़की का एक पट आधा खोल दिया। स्टूल उठाया और खिड़की से आते रोशनी के उस छोटे से टुकड़े के बीचोंबीच रख दिया और उस पर बैठ गए। नहीं ऐसे नहीं, चंदू भाई बुदबुदाए। उठे, आईने का मुँह थोड़ा-सा खिड़की की ओर घुमाया और स्टूल पर इस तरह बैठ गए कि रोशनी सिर्फ आधे चेहरे पर ही पड़े। आधा चेहरा अँधेरे में ही रहे। हाँ अब ठीक है, चंदू भाई फिर बुदबुदाए। अब चंदू भाई आईना देख रहे हैं और मुखमुद्राएँ बदल-बदल कर कुछ इस तरह रोने का रियाज कर रहे हैं कि रोते हुए उनका चेहरा और भी खूबसूरत और भावप्रवण लगे। हाँ... अरे हाँ... यही तो, यही तो। वे इसी तरह हिचकियों के साथ रोएँ, गालों पर आँखों से ठुड्डी तक बहता हुआ आँसू हो और दाईं तरफ से चेहरे पर हल्की नीली लाइट फेंकी जाय तो बस... वाह... तालियों की वो गड़गड़ाहट गूँजेगी कि रुकने का नाम न लेगी। हाँ अब ठीक है, चंदू भाई ने मुस्कराते हुए स्वगत कथन किया।

यह कहानी इन्हीं चंदू भाई की है। चंदू भाई यानी चंदन सिंह राठौर। पर चंदू भाई रो क्यों रहे थे? और रो भी रहे थे तो रोते-रोते अचानक मुस्कराने क्यों लगे? चंदू भाई का दिमाग तो ठीक है?

बात शुरू से ही शुरू करते हैं और बात की शुरुआत आज से लगभग चार साल पहले होती है। दरअसल सारा मामला लड़कियों की बेरुखी का है, नहीं तो अपने खूबसूरत और हट्टे-कट्टे चंदू भाई को एक अदद प्रेमिका के लिए नाटक करने जैसा नाटक क्यों करना पड़ता। बात उन दिनों की है जब चंदू भाई बी.ए. करने के बाद एम.ए. की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आए। बात उन दिनों की है जब चंदू भाई का मन न पढ़ाई में लग रहा था, न सिनेमा में। चंदू भाई सुबह उठते। अच्छी तरह नहा-धो कर सज-धज कर यूनिवर्सिटी चले जाते और बेचैन-सी कक्षाओं के बाद कमरे पर आते ही हाथ-मुँह धो कर छत पर पहुँच जाते और बस एक खूबसूरत फूल सा चेहरा देख पाने की ललक में चारों तरफ चकमक-चकमक ताकते रहते। कोई लड़की दिखती नहीं कि चंदू भाई उसे एकटक निहारना शुरू कर देते। मुहल्ले की लड़कियों में चंदू भाई अपनी इसी घूरने की आदत के कारण मजाक बन गए थे। सब उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती हुई आपस में हँसी-ठट्ठा करतीं। ...सीढ़ियों पर कोई आहट होते ही चंदू भाई किताबों में डूब जाते। इतना कि कोई सिर पर आ खड़ा होता और उन्हें पता ही न चलता। अँधेरा होते ही चंदू भाई नीचे उतरते और गलियों में निकल आते। थोड़ी दूर जा कर एक सिगरेट जलाते और एक प्रेमिका के बिना जीवन व्यर्थ मानते हुए धुएँ के छल्ले उड़ाते और अगले दिन की योजनाओं पर विचार करते।

चंदू भाई बाईस साल के हो रहे थे और आप मानें या न मानें चंदू भाई का कुँवारापन अभी तक पूरी तरह सुरक्षित था। उनकी अनेक सघन कोशिशों और शातिर योजनाओं के बाद भी। यह कहानी शुरू ही चंदू भाई की एक अदद प्रेमिका की बेचैनी से होती है। इसी बेचैनी के आलम में चंदू भाई ने अपनी संभावित प्रेमिकाओं की एक भरी-पूरी लिस्ट बना डाली थी। इस लिस्ट में मुहल्ले और यूनिवर्सिटी की लड़कियों के अलावा दोस्तों की बहनें और दूर रिश्तेदार लड़कियाँ भी शामिल थीं। तो चंदू भाई धुएँ के छल्ले उड़ाते और इन लड़कियों में से किसी को प्रपोज करने की योजनाएँ बनाते। हालाँकि चंदू भाई की योजनाएँ कभी परवान न चढ़ पाईं कारण कुछ नहीं... बस जब भी उनका किसी लड़की से सामना होता, हर बार भीतर से सहज रहने की पूरी जद्दोजहद के बावजूद, उनकी टाँगें काँपने लगतीं और जुबान लड़खड़ाने। उस हसीन संभावनाशील पल के निकल जाने के बाद चंदू भाई हीनता की ग्रंथि से भर जाते ओर अपने आपको कोसने लगते। ये अलग बात थी कि यही चंदू भाई सड़क पर चलते हुए लड़कियों पर अश्लील फिकरे कसने से कभी न चूकते। तब पता नहीं यह ताकत वह कहाँ से लाते थे।

जब चंदू भाई के जीवन में रोज-ब-रोज यही सब कुछ चल रहा था उन्हीं दिनों जब उनके एक दोस्त ने उन्हें अपने नाटक का पास दिया और आने की गुजारिश की तो चंदू भाई ने पलटकर जवाब दिया, ‘वह सिनेमा तो देखते ही नहीं, नाटक क्या देखेंगे?’ दोस्त चंदू भाई की समस्या से वाकिफ था। उसने जाल फेंका। यह महिलाओं की समस्या पर आधारित नाटक है और इसे नारी मुक्ति सभा करवा रही है। एक से एक खूबसूरत लड़कियाँ नाटक देखने आएँगी। खैर! जबरदस्ती नहीं है। तुम नहीं आना चाहते तो मत आना। बात चंदू भाई की समझ में आ गई। उन्होनें दोस्त पर एहसान जताते हुए कहा कि उन्हें नाटक-नौटंकी में कोई रुचि नहीं है पर चूंकि दोस्त का नाटक है इसलिए समय मिला तो आ ही जाएँगे। और चंदू भाई शाम को नाटक देखने सांस्कृतिक केंद्र पहुँच ही गए। लड़कियों का भारी हुजूम देख कर चंदू भाई की आँखें चौंधिया गई पर नाटक देखते हुए तो उनके भीतर बिजली-सी दौड़ गई। रोमांच के मारे रोएँ खड़े हो गए।

पता नहीं यह नाटक का प्रभाव था या फिर प्रेक्षागृह में बैठ कर तालियाँ पीट रही नवयौवना लड़कियों का, कि चंदू भाई सुध-बुध खो बैठे। उन्हें अपने दोस्त से रश्क हुआ जिसके लिए लड़कियाँ बार-बार ताली पीट रही थीं। चंदू भाई ने सोचा ये तालियाँ उनके लिए भी तो बज सकती हैं। दोस्त के ग्रीन रूम से निकलने भर की देर थी। चंदू भाई दौड़कर उसके पास पहुँचे और हाँफते हुए बोले - मैं भी नाटक करूँगा और मुझे रोल दिलवाना तुम्हारा काम।

रंगमंच पर चंदू भाई के शुरूआती दिन बहुत खराब रहे। हट्टे-कट्टे छह फुटे चंदू भाई वैसे तो खूब बढ़-चढ़कर बोलते पर संवाद बोलते हुए एकदम वैसे ही हकलाने लगते जैसे अपनी संभावित प्रमिकाओं के सामने हकलाते थे। श, स, ष और ज, ज़ की दिक्कतें अलग से परेशान करतीं। मंच पर इधर से उधर जाना होता कि चंदू भाई की टाँगें थरथराने लगतीं। सामने लड़के-लड़कियाँ बैठे होते। चंदू भाई सहज रहने और सँभलने की जितनी ही कोशिश करते उतना ही गड़बड़ाते चले जाते। निर्देशक चीखने लगता। खाली समय में चंदू भाई चुपके-चुपके साथ की लड़कियों को निहारते रहते पर जल्दी ही चंदू भाई जान गए थे कि इस तरह से कुछ भी नहीं हो सकता।

दरअसल शुरुआत में ही चंदू भाई ने एक लड़की से दोस्ती गाँठने की कोशिश की। पास जा कर बैठ गए और मुस्कराते हुए बोले - आप तेलियरगंज में रहती हैं न!

‘क्यों? लड़की ने पूछा।

‘मैं भी वहीं रहता हूँ। कल मैंने आपको देखा था, आप ऑटो पर बैठ कर जा रहीं थीं।’

लड़की पहले मुस्कराई फिर उन्मुक्त होकर हँसने लगी। चंदू भाई का सारा आत्मविश्वास तो उसकी हँसी से ही गड़बड़ा चुका था, ऊपर से उसने कहा, ‘अरे ऑटो में बैठ कर ही जाया जाता है। उसमें खड़े हो कर कैसे जाएँगे?’ चंदू भाई बुरी तरह झेंप गए। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आईं। महीनों तक उन्होंने उस लड़की से दुबारा बात नहीं की पर अंदर ही अंदर उन्होने यह सबक भी ले लिया कि बोलते हुए जितने शब्दों की जरूरत हो सिर्फ उतने ही बोले जाएँ। बाद में ये संवाद मंच पर भी उनके बहुत काम आया।

इस बीच चंदू भाई कई नाटकों में कोरस या छोटी-मोटी भूमिकाएँ कर चुके थे और उनका एलबम अनेक भाव-भंगिमाओं से युक्त तस्वीरों से भर गया था। इन तस्वीरों के नीचे बहुत मेहनत से हासिल की गई उनकी संभावित प्रेमिकाओं की तस्वीरें थीं। चंदू भाई बारी-बारी या एक साथ इन सबके इश्क में गिरफ्तार हो चुके थे। अब चंदू भाई यहाँ और वे लड़कियाँ न जाने कहाँ हैं। उनमें से कई तो शायद माँ भी बन चुकी हों, तब भी चंदू भाई ने उनकी तस्वीरें अपने एलबम में छुपा रखी हैं तो आप चंदू भाई के बारे में कम से कम इतना अंदाजा तो लगा ही सकते हैं कि चंदू भाई बेवफा आशिक नहीं हैं।

बात उन दिनों की है जब चंदू भाई नाटक और लड़की, दोनों को ले कर बराबर गंभीर थे। वे नाटक के संवादों और लड़कियों को प्रपोज करने का साथ-साथ रियाज करते। आमतौर पर इसके लिए संवाद वह पारसी नाटकों से चुनते। यहाँ उन्हें उर्दू के कठिन शब्द भी मिल जाते और रोमैंटिक संवाद भी। चंदू भाई आईने के सामने खड़े हो जाते और बार-बार दोहराते -

‘रश्क! मैं इस लिबास से रश्क करता हूँ जो तुम्हारे खूबसूरत जिस्म को हर वक्त आगोश में लिए रहता है, मैं इस गले के हार से रश्क करता हूँ जो इस दिलफरेब सीने के उभार को हर वक्त बोसे दिया करता है।, मैं हवा के झोंके पर रश्क करता हूँ जो इन नागिनों के पास से निडर होके निकलता है। यहाँ तक कि मैं तुम्हारे साये से रश्क करता हूँ जो तुम्हारे कदमों के साथ लिपटा हुआ चलता है -

बँधी है टकटकी सब आजमाते हैं नसीब अपना
जिसे मैं देखता हूँ उसको पाता हूँ रकीब अपना
जो हसरत है तो ये हसरत न कोई हो मुकाबिल में
तुम्हे आँखों में रख लूँ और इन आँखो को इस दिल में।’

चंदू भाई सपने में भी रिहर्सल करते। दोस्तों के साथ होते तो उनसे भी संवादों में बात करते। कभी मिररिंग करते तो कभी मिमिक्री। हर किसी के बारे में सब कुछ जान लेना चाहते। मान लो कभी वैसी ही भूमिका मिल गई तो। कई बार तो हद कर देते। कचहरी चले जाते और हाथ देखने वाले को घंटों तक हाथ दिखाते और तब तक कुछ न कुछ पूछते रहते जब तक कि वह ऊब नहीं जाता। सिगरेट लेने पान की दुकान पर जाते तो दुकानदार का पान लगाना देखते रहते। एक दिन रात में जब चंदू भाई रिक्शे पर बैठ कर रिहर्सल से आ रहे थे कि रिक्शे वाले से बोले, तुम आओ पीछे बैठो। रिक्शा हम चलाते हैं। रिक्शा वाला अरे बाबूजी, अरे बाबूजी कहता ही रह गया पर चंदू भाई रिक्शा चलाकर ही माने।

इसी बीच चंदू भाई को घर जाना हुआ। माँ लाड़ से चंदू-चंदू करते हुए उनके आसपास मँडराती रहती। एक दिन चंदू भाई को न जाने क्या हुआ, जब माँ ने उन्हें पुकारा चंदू-ए-चंदू... ऊ। चंदू भाई ने धीरे से पीछे की तरफ चेहरा घुमाया और सधी हुई आवाज में बोले, ‘ये चंदू चंदू क्या लगा रखा है माँ? चंदन सिंह राठौर नहीं कह सकती क्या? चंदू भाई इन दिनों ‘बाँछाराम की बगिया’ की रिहर्सल कर रहे थे, जिसमें ऐसा ही एक संवाद था।

माँ सकपका गई और कुछ भी न समझ पाई, पर लाड़ से बोली - ‘होगा तू चंदन सिंह राठौर-फाठौर। मेरे लिए तो मेरा चंदू बेटा ही है न!’

असली गड़बड़ी दूसरे दिन हुई। जब बाथरूम में अपने चंदू भाई बेख्याली के आलम में संवाद पर संवाद बोले जा रहे थे। अचानक वे चौंक गए। उनका पुलिसिया बाप दरवाजा पीट रहा था।

चंदू... चंदू...ऊ ...अबे चंदुवा।’ चंदू भाई ने हड़बड़ाहट में दरवाजा खोला।

‘तू बात किससे कर रहा था रे?’

‘पापा वो... पापा... पापा।’

‘अरे क्या हुआ? बोल न हरामी।’

‘पापा वो... वो... वो मैं नाटक की रिहर्सल कर रहा था।’ चंदू भाई ने हकलाते हुए जवाब दिया।

‘अच्छा तो अब हमारे लायक पूत नाटक भी करने लगे। अब यही सब रह ही गया है करने को। ठाकुर का लड़का अब कमर मटकाएगा और नाच-नौटंकी करेगा। अरे कहाँ हो सुन रही हो, तुम्हारे पूत साहब आजकल पढ़ाई-लिखाई के बदले कौन सा गुल खिला रहे हैं।’

‘पापा मैं नौटंकी नहीं करता। मैं तो रंगमंच से जुड़ा हूँ, नाटक करता हूँ। उसको देखने तो बड़े-बड़े लोग...।’ चंदू भाई मिनमिनाते हुए अपनी बात पूरी कर पाते कि तड़ाक की जोरदार आवाज के साथ चंदू भाई की आँखों के सामने तारे नाच उठे।

‘सुन हरामी, ये तेरा रंगमंच-फंगमंच सब तोड़-फोड़ कर धर दूँगा, अगर आगे से इसके बारे में सोचा भी तो। पढ़ने-लिखने को एक अक्षर नही। इस उमर में ये पिद्दी जैसा शरीर। आजकल के लड़के दौड़ रहे हैं, जिम जा रहे हैं। एक हमारा ही पूत खानदान का नाम डुबोने पर तुला है।’

चंदू भाई रुआँसे हो आए। बाहर शेर की तरह बिचरने वाले चंदू भाई अपने फाड़खाऊ बाप के आगे कभी एक भी शब्द न बोल पाए। हमेशा ही उनकी घिग्घी बँध जाती। इस बात को उनके पुलिसिये बाप ने भी समझा और डाँट-फटकार से प्रेम-पुचकार पर आ गया।

‘बेटा मैं तुम्हारा दुश्मन थोड़ी न हूँ जो तुम्हें डाँटता-मारता रहता हूँ अरे मैं तो चाहता हूँ कि तुम पढ़-लिखकर कुछ बन जाओ उसके बाद जो जी में आए करना। जल्दी ही दरोगा की भर्तियाँ निकलने वाली हैं। कम से कम तुम फिजिकल निकाल लेने लायक तो हो ही जाओ। आगे का जुगाड़ तो मैं लगा ही दूँगा। दो-ढाई लाख लग भी गए तो क्या। एक बार तुम दरोगा बन गए तो रुपए-पैसे की क्या चिंता?’

चंदू भाई के बाप ने अनजाने ही चंदू भाई के मर्म को पकड़ लिया। बाप को पता नहीं कि बचपन से ही थाने आते-जाते चंदू भाई खुद दरोगा के रोब के कितने भारी शिकार थे। कई बार बाप को हड़काए जाते देख कर वे सोचते कि अगर वे दरोगा बन जाएँ तो उनका तुर्रम खाँ बाप उन पर बार-बार बाप होने का रोब गाँठना बंद कर देगा और उनसे वैसे ही दबकर रहेगा जैसे थाने में वह दरोगा से दबकर रहता है। पर ये सब तो गुजरे जमाने की बातें हैं। अभी तो अपने चंदू भाई नाटक करते हैं। बस। तो चंदू भाई ने कुछ इस तरह का भाव प्रदर्शित किया जैसे बाप की सारी बातें उनकी समझ में आ चुकी हैं और बहुत सारी हिदायतों के साथ दो दिन बाद चंदू भाई फिर इलाहाबाद आ गए। इलाहाबाद पहुँचते ही चंदू भाई की दुनिया बदल गई।

चंदू भाई को पहली बार किसी लड़की के साथ मंच पर उसके प्रेमी की भूमिका अदा करनी है। चंदू भाई पागल से हुए जा रहे हैं। उनकी धमनियों में खून रोमांच के मारे उबल रहा है। अब चंदू भाई अपने चेहरे-मोहरे को ले कर बेहद सतर्क हो गए हैं। रोज सुबह उठ कर देर तक ब्रश करना, नहाने के पहले शेव करना, बालों में शैंपू करना और परफ्यूम की सीशी और कंघा तो अब हमेशा चंदू भाई के बैग में ही पड़ा रहता है।

‘वे सबकी शादियाँ कर देंगे।’ लड़की जिसका नाम कली था, इठलाती हुई बोलती। और चंदू भाई अपनी शादी के बारे में सोचने लगते। जल्दी ही चंदू भाई को पता चल गया कि लड़की भी उनकी तरह ही रोमांचित थी और अपने आपको सपनों के हिंडोले में झूलता हुआ पा रही थी। अभी पिछले साल ही वह घर से बहुत सारे सामानों के साथ-साथ लड़कियों को दी जाने वाली जरूरी हिदायतों का एक बंडल ले कर इलाहाबाद आई थी जिसमें से कई हिदायतें तो रास्ते में ही गुम हो गईं थीं। बाकी धीरे-धीरे गायब हो रही थीं।

लड़की यानी कि कली अब हॉस्टल में रह रही थी और अब वह अपने चंदू भाई की हिरोइन थी। वह भी संवाद बोलते हुए अपने भीतर एक सनसनी सी महसूस करती। दोनों संवाद बोलते हुए सचमुच एक दूसरे की आँखों मे डूब जाते। नतीजा यह हुआ कि नाटक का शो होते-होते दोनों की सनसनी एक होकर सनसनीखेज हो चुकी थी और शहर के युवा रंगकर्मियों में दोनों के इश्क के चर्चे आम हो गए।

मंच पर जब चंदू भाई और कली दोनों एक साथ होते तो समूचे प्रेक्षागृह में जादू तैर जाता और दर्शक इस जादू में डूब जाते। इस जादू में रोमांस भी था और रोमांच भी। नाटक खत्म हुआ तो तालियों की वह गड़गड़ाहट गूँजी कि चंदू भाई की आँखों में खुशी के मारे आँसू आ गए। हालाँकि यह पूरी तरह एब्सर्ड था पर उन्होने मंच पर खड़े-खड़े सोचा कि अगर वह दरोगा बन जाएँ तो उन्हें ताली नहीं गाली मिलेगी और फिर अपनी ही सोची बात पर मुस्करा उठे। दोनों के अभिनय और नाटक की सफलता से उत्साहित होकर निर्देशक ने दोनों को साथ ले कर एक नया नाटक प्लान कर डाला और नए नाटक के होने तक चंदू भाई एक बेहतरीन युवा अभिनेता के रूप में और कली बनर्जी अभिनेत्री के रूप में शहर के रंगकर्मियों के बीच स्थापित हो गए।

इस बीच पता नहीं चंदू भाई ने जान-बूझ कर अपने आपको बदला या फिर ये अनायास ही हो गए परिवर्तन थे। हुआ यह कि चंदू भाई बेहद गंभीर हो गए। जो चंदू भाई कभी किताबें छूने से भी कतराते थे वह अक्सर नाटक और साहित्य पढ़ते हुए मिलने लगे। शहर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गोष्ठियों में उनका आना-जाना बढ़ गया, यहाँ तक कि कुछ पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर चंदू भाई के कुछ लेख-वेख भी छपने लगे। पहले की तरह बात-बात पर बेवजह हँसना, लड़कियों को देख कर फिकरे कसना बंद। रिहर्सल में भी लड़कियों को घूरना बंद। बस रिहर्सल करते दूसरों को भी कभी कभार ही कोई राय देते, नहीं तो बैठ कर रिहर्सल देखते। बाकी अभिनेताओं को अपनी-अपनी भूमिकाएँ याद हो पातीं इससे पहले चंदू भाई को पूरा नाटक याद हो जाता। बीच में जब चाय-नाश्ते का गैप होता, बाकी लोग जहाँ हँसी-ठट्ठे में डूब जाते वहीं चंदू भाई या तो किसी कोने में अपनी प्रेमिका के साथ होते या कोई किताब पढ़ते। निर्देशक को उनका कली के साथ घुट-घुट कर बतियाना बेहद अखरता पर चंदू भाई एक बेहतरीन अभिनेता थे और चंदू भाई के नाराज होने पर उसे अपने कई नाटक फिर से तैयार करने पड़ते, यह सोच कर वह चुप लगा जाता। सारी गंभीरता के बावजूद चंदू भाई का सिगरेट पीना बदस्तूर जारी था। बस नाक से धुआँ निकालना और राख चाय में झाड़कर पीना उन्होंने बंद कर दिया था। गुटखा खाना भी बंद, क्योंकि इससे आवाज पर बुरा असर पड़ सकता था।

चंदू भाई की सारी गंभीरता तब हवा हो जाती जब कली कमरे पर आती। फिर दरवाजे खिड़कियाँ सब बंद। दोनों लिपट जाते। दुनिया जहान की बातें करते। एक दूसरे के घर के बारे में, गाँव के बारे में, दोस्तों के बारे में, पढ़ाई के बारे में, खेल-राजनीति-सिनेमा के बारे में। इसके बाद भी दोनों के बात करने के विषय कम पड़ जाते तब दोनों कभी मुहब्बत-मुहब्बत खेलते तो कभी नोंक-झोंक। पर ये नोंक-झोंक भी अक्सर किसी नाटक के संवादों में होती -

पर खता ही गर समझती हो तो दो हमको सजा
लो खड़े हैं हाथ बाँधे हम तुम्हारे सामने।
कली कहती -
आहा खड़े हैं क्या ये बेचारे बने हुए
गोया हैं हर तरह से हमारे बने हुए।
चंदू भाई जवाब देते -
है कौन इस जगह पे मेरी जाँ तुम्ही तो हो
इस घर में और कौन है मेहमाँ तुम्हीं तो हो।
कली कहती -
ये बातें जाके तुम किसी नादान से कहो
क्या दीन है तुम्हारा तुम ईमान से कहो।
और तब चंदू भाई बदमाशी से एलान करते -
मेरा गुमान अलग है मेरा यकीन अलग
है तेरा दीन अलग और मेरा दीन अलग।

फिर दोनों बच्चों की तरह झगड़ते हुए आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते। एक दूसरे से असली नकली माफी माँगते। फिर एक दूसरे में खो जाते। कभी आपस में तुतलाते। एक तुतलाता और दूसरा दुलार करता फिर यह क्रम बदल जाता। कोई देखता तो पक्का उन दोनों को पागल ही कहता। हाँ पागल थे ही दोनों, एक दूसरे के प्यार में।

चंदू भाई के पुलिसिए बाप का उनके कमरे पर आना-जाना इस बीच काफी बढ़ गया था। वह चंदू भाई को गंभीर होते देख कर बहुत खुश था। वह चंदू भाई को देर तक पढ़ते हुए देखता और चंदू भाई का कसा हुआ शरीर देखता तो सोचने लगता कि चंदू भाई के दरोगा होने में अब बस भर्ती निकलने भर की देर है। इतनी मेहनत से तो अपने आप ही चंदू का सेलेक्शन हो जाएगा और नहीं भी हुआ तो उनके संपर्क और रुपए कब काम आएँगे।

चंदू भाई सब कुछ समझ रहे थे और जब तक संभव हो इस भ्रम को बनाए रखना चाहते थे। कमरे पर अभ्यास कम ही करते। सुबह उठते और दौड़ते हुए गंगा तट चले जाते। वहीं पर अपने संवादों का अभ्यास करते या फिर दोस्तों के कमरे में। सब कुछ आराम से चल रहा था। सब खुश थे कि एक दिन गड़बड़ हो गई। हुआ यह कि चंदू भाई एक शनिवार को घर पहुँच गए और अच्छे-खासे माहौल में खा-पीकर सो गए। दूसरे दिन चंदू भाई अभी सो ही रहे थे कि उनके बाप ने उन्हें बाल पकड़कर उठाया और कागज का एक पुलिंदा उनके सामने झुलाते हुए पूछा कि यह क्या है? चंदू भाई हकबका गए। मुँह बाए कभी बाप को देखते, कभी कागज के पुलिंदे को। पर उन्हें कुछ भी नहीं समझ में आया। बाप ने फिर उनके सामने कागज का पुलिंदा झुलाया और दहाड़ा ‘यह क्या है?’

चंदू भाई ने आँख मिचमिचाते हुए देखा कि अखबार के रविवारीय संस्करण में उनके पिछले नाटक पर एक फीचर छपा है और साथ-साथ उनकी और कली की तस्वीर भी। नीचे लिखा है ‘नाटक के एक भावपूर्ण दृष्य में चंदन सिंह राठौर और कली बनर्जी।’ जिस नाटक के लिए चंदू भाई ने पिछले दो महीने से दिन-रात एक कर दिया था, जिस नाटक ने शहर में बतौर अभिनेता उनकी पहचान और भी पुख्ता कर दी थी, जिस नाटक ने उनके और कली के बीच के प्रेम को और भी परवान चढ़ाया था, वही नाटक सुबह-सुबह चंदू भाई की जान का बवाल बना हुआ था।

चंदू भाई ने सिर नीचे किए-किए ही निश्चय किया कि अब दबना नहीं है। किसी लड़की के साथ छेड़खानी नहीं की है, न ही कोई लड़ाई-झगड़ा किया है। फकत नाटक ही तो किया है। और अखबार में फोटो छपना कोई बुरी बात है क्या? इस खानदान की सात पीढ़ियों में कभी किसी की फोटो छपना तो दूर नाम भी अखबार में नहीं निकला होगा। इसके पहले कि चंदू भाई सिर ऊपर उठाते? बाप ने उनके बाल पकड़े-पकड़े पीठ पर दूसरे हाथ की कुहनी मारी।

‘सरऊ इहय सब करय का रहा तो कोनो चमार-पासी खिंया भ होत्या पैदा। ठकुरे कइ बीज होइ के नौटंकी करिबेय्या? मार-मार के खाल छाँट लेब ओ ओहमा भूसा भर के टाँग देब ससुर... अरे कहाँ बाटू आवा तुहूँ अपने पूत क करतूत देखा। अरे...ई... चंदूवा ससुर नाक कटाइन के छोड़ी।’ इस बीच चंदू भाई को कई लात और हाथ पड़ चुके थे।

चंदू भाई एक तो भरी नींद से जगाये गए थे, ऊपर से इस तरह अकारण मार उनकी बर्दाश्त के बाहर हो रही थी।

चंदू भाई पिट रहे थे और उन्हें अपने नाटक के दृष्य एक के बाद एक याद आ रहे थे। अचानक चंदू भाई ने अपना बाल छुड़ाते हुए बाप को झटक दिया और चीखे - ‘मेरे नाटक करने पर खानदान की नाक कटती है, और जब लोगों को आलतू-फालतू परेशान करते हो तब? जब घूस से जेब भरते हो तब? जब थाने में पिछले साल एक लड़की की इज्जत लूटी गई थी तब तो आपकी नाक और भी लंबी-चौड़ी हो गई थी न? बोलते क्यों नहीं, अब बोलो ना! अरे नहीं बनना मुझे तुम्हारा लायक सपूत। समझ रहे हो न। सुन रहे हो न?’ चंदू भाई लगातार चीख रहे थे। माँ थोड़ी दूर पर सकते में खड़ी थी और बाप... थोड़ी देर तक तो समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो गया। वैसे ही जैसे चंदू भाई अचानक बाल पकड़ कर जगाए जाने पर कुछ भी नहीं समझ पाए थे। फिर अचानक बाप के मुँह से फेन आने लगा। वह चिल्लाया अरे खड़ी क्यों है छिनार? बंदूक निकाल। मेरा बीज साला मुझ पर ही रूआब गाँठेगा, ऐसे तो निपूता ही भला। आज ये हरामी रहेगा या मैं।

चंदू भाई समझ गए कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गए हैं। अब घर में रुकना खतरे से खाली नहीं था। बाप की रात की दारू अभी उतरी नहीं थी। और वह गुस्से में पागल साँड़ हो रहा था। बाप बंदूक लेने झपटा और चंदू भाई नंगे पैर बाहर भागे। पीछे से बाप चिल्लाया, ‘भाग हरामी कहाँ जाएगा भागकर। बाप से हाथापाई करता है। लौट के आना डंडे पर उल्टा खड़ा कर दूँगा।’ चंदू भाई ने न कोई जवाब दिया, न ही पीछे पलटे। भागते हुए एक रिक्शा किया। एक दोस्त के पास पहुँचे, कुछ रुपए उधार लिए और इलाहाबाद के लिए बस पर बैठ गए।

इलाहाबाद पहुँचकर चंदू भाई ने सबसे पहला काम कमरा बदलने का किया। उन्हें अपने बाप पर कोई भरोसा नहीं था। वह कभी भी आ धमक सकता था। नया कमरा छत पर अकेला कमरा था। सीढ़ी पीछे से थी, मतलब कमरा ऐसा कि चंदू भाई को किराया देने के अतिरिक्त मकान मालिक से कोई मतलब रखने की जरूरत नहीं थी। एकांत। एकदम एकांत। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बस महीने भर बचे थे। चंदू भाई का रिहर्सल जोर पकड़ने लगा। आईने के सामने खड़े हो जाते और नशीली आवाज में बोलते -

‘पी लेने के बाद मुझे सब कुछ अच्छा लगने लगता है। सच... वह इबादत कर रहा है? बहुत अच्छा है! आदमी भगवान में विश्वास करता है या नहीं... यह उसका अपना मामला है। इनसान आजाद है... वह खुद ही हर चीज की कीमत चुकाता है...।’

कभी उनकी आवाज मंत्र की तरह गूँजती -

‘ये मुर्गीखाने मुर्दाघर का काम करते
धूल-धक्कड़, उठतीं छायाकृतियाँ
कंक्रीट के बाशिंदे बिंदास गणों की परेड
उन पर टंकित भरमार कमर्शियल
बीते कल के फैशन वाली वर्दी
उसमें आज का युवा प्रेत बना है उन मुर्दों का
जो मारे जाएँगे कल के महासमर में।’

चंदू भाई सोचते, अच्छा ही हुआ, जो वे यहीं रहने लगे। यहाँ से चंदू भाई या तो रिहर्सल पर जाते या एकाध बार चाय-वाय पीने प्रयाग स्टेशन। वही समय दोस्तों से मिलने-बतियाने का भी होता। सिगरेट का लंबा स्टाक कमरे पर ही रहता। चंदू भाई जल्दी ही लौट आते और फिर रिहर्सल और रियाज में जुट जाते। रिहर्सल कई बार बीच में टूट जाती। होता यह कि हॉस्टल से दूसरा आईना आ जाता और चंदू भाई उस दूसरे आईने में डूब जाते। कमरे की खिड़की की ग्रिल का एक हिस्सा टूटा हुआ था। कली के आते ही चंदू भाई कली को अंदर कर दरवाजे पर बाहर ताला जड़ खिड़की से अंदर आ जाते और फिर खिड़की भी बंद कर लेते। तब रिहर्सल नहीं जीवन का असली नाटक खेला जाता। बाद में चंदू भाई कली को हॉस्टल तक छोड़ने जाते और लौट कर फिर कमरे में बंद हो जाते। इस तरह एक दिन चंदू भाई दोस्तों की शुभकामनाएँ ले कर और कली को बार-बार चूम कर राष्ट्रीय नाटय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा के लिए दिल्ली रवाना हो गए।

दिल्ली से चंदू भाई बेहद खुश होकर लौटे। प्रवेश परीक्षा का पहला चरण निकाल लेने के बाद चंदू भाई वर्कशॉप के लिए रुक गए थे और बकौल चंदू भाई जैसा कि उन्होंने लौटकर कली को बताया कि वर्कशॉप में उनका प्रदर्शन एक्सलेंट रहा था। उनका चयन होने में एक औपचारिक पत्र आने भर की देर थी। बीच में चंदू भाई चुपके से घर जा कर माँ से भी मिल आए थे और अब इलाहाबाद से अपना बोरिया बिस्तर समेटने की तैयारी में थे। कली को ले कर भी उनके पास कई योजनाएँ थीं कि कली नाटक करती रहेगी, कि कली एम.ए. के बाद एम.फिल. या रिसर्च के लिए दिल्ली आ जाएगी। कली चिढ़ जाती कि इतने उतावलेपन की क्या जरूरत है? पहले रिजल्ट तो आ जाने दो। एक दिन तो उसने चिढ़कर कहा कि उसे क्या करना है वह बेहतर जानती है। चंदू को उसके बारे में सोचने की जरूरत नहीं है पर इससे चंदू भाई के उत्साह में कोई कमी नहीं आई और कली भी जल्दी ही उनके साथ भविष्य की योजनाओं में शामिल हो गई। चंदू भाई बहुत खुश थे। उनके जीवन में बहुत कुछ बदल जाने वाला था। बस रिजल्ट आ जाय, जिसका कि चंदू भाई को बेसब्री से इंतजार था।

आखिरकार रिजल्ट घोषित हुआ। अफसोस उसमें चंदू भाई का नाम कहीं नहीं था। चंदू भाई सकते में आ गए। उनसे कहाँ चूक हुई, वे समझ नहीं पा रहे थे। सब कुछ तो कितना अच्छा हुआ था, फिर उनका चयन क्यों नहीं हुआ। चंदू भाई को लगा कि वह किसी भी क्षण रोने लगेंगे। इससे बचने के लिए वह ‘प्रोमीथियस’ का एक संवाद जोर-जोर से बोलने लगे -

‘तो जियस का दूत अपनी धमकियाँ दे चुका। मुझे इसका पूर्वाभास था। जियस मुझसे घृणा करता है मैं उससे, इसलिए उसके हाथों कोई भी यंत्रणा भोगना मेरे लिए असह्य नहीं होगा। मैं उसकी निरंकुशता के खिलाफ विद्रोह की घोषणा करता हूँ। वह बिजलियाँ गिराए, भूकंप और तूफान लाए, पृथ्वी-आकाश को तहस-नहस करे या मेरी देह को नरक में फेंक दे। मैं विचलित नहीं होऊँगा। मेरे निर्णय की स्वतंत्रता मेरी रहेगी। और जब तक वह है मुझे कोई नष्ट नहीं कर सकता।’

पर संवाद पूरा होते-होते चंदू भाई जोर-जोर से रोने लगे। अब चंदू भाई रो रहे हैं। चंदू भाई आईना देख रहे हैं। चंदू भाई कुछ इस तरह रोने का रियाज कर रहे हैं कि उनकी उदासी ज्यादा बोलती हुई लगे। कि मंच पर उनका रोना भर काफी हो। लोग बिना बोले ही उनकी पीड़ा को समझ जाएँ। मान लो कि यही भूमिका मंच पर करनी पड़ जाय तो?

(इस कहानी में आए संवाद यर्मा, यहूदी की लड़की, प्रोमिथियस, तलछट तथा साहिल और उजाड़ से हैं। इनके लेखकों का हार्दिक आभार।)


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ