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कविता

काल के थके-थके चरण
रमा सिंह


काल के धके-धके चरण।

अधखिली नई कली
सिर्फ प्‍यास में पली
और छाँव में जली
छल गई जिसे स्‍वयं शरण।

मोम-सा पिघल गया
साँझ को निगल गया
दिन उदास ढल गया
ओढ़-ओढ़ श्‍याम आवरण।

फूल सब बिखर गए
पात-पात कर गए
शूल ही उभर गए
शारव को दिया गया मरण।

कौन आज आएगा
प्रीत गीत गाएगा
धीर को बँधाएगा
दे नवीन प्रीति-व्‍याकरण।


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