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कविता

पाहन पिघल जाएगा
सुमेर सिंह शैलेश


नेह के दीप कुछ तो धरो द्वार पर,
तम दिशाओं का सारा ही घुल जाएगा।
प्रीति की चाँदनी साथ लेकर चलो,
दिन का सूरज कहीं भी तो ढल जाएगा।

दर्द की छाँव में पल रही जिंदगी
आँसुओं की लड़ी गूँथती हर खुशी
एक सिंदूरी-सी रेखा भी मुस्‍कान की
मिल गई तो जहाँ सारा मिल जाएगा।

बाँट दो अपने घट से अमृत-पुण्‍य कुछ,
मैं मिटा भी सकूँ प्‍यास के फासले
चीख कब तक दबाऊँ तृषा साध की,
प्राण ऐसे में एक दिन निकल जाएगा।
 
भावना का मेरे निर्वसन रोक लो,
गीत हो बेसुरे यह चलन रोक लो,
एक स्‍वर कंठ से तो दुलारो सही
मोम-सा कोई पाहन पिघल जाएगा।
 


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