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कविता

उजाला छिन न पाएगा
राजेंद्र गौतम


यह धुआँ
सच ही बहुत कड़ुआ
घना काला
क्षितिज तक
            दीवार फिर भी बन न पाएगा।

लाश सूरज की दबी
चट्टान के नीचे
सोच यह मन में
            ठठा कर रात हँसती है
सुन अँधेरी कोठरी की
वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा - गर्विता यह
            व्यंग्य कसती है

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा
पर उजाला
            सहज ही यों छिन न पाएगा।

संखिया
कोई कुओं में डाल जाता है
हवा व्याकुल
            गाँव भर की देह है नीली
दिशाएँ निःस्पंद सब बेहोश सीवाने
कुटिलता की गुंजलक
                   होती नहीं ढीली

पर गरुड़-से भैरवी के
पंख फैलेंगे
चुप्पियों के नाग का फन
            तन न पाएगा।

 


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