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कविता

सिर-फिरा कबिरा
राजेंद्र गौतम


फूल खिले हैं
तितली नाचे
आओ इन पर गीत लिखें हम
भूख, गरीबी या शोषण से
            कविता-रानी को क्या लेना।

महानगर की
चौड़ी सड़कें
इन पर बंदर-नाच दिखाएँ
अपनी उत्सव-संध्याओं में
भाड़ा दे कर भाँड़ बुलाएँ
हम हैं -
संस्कृति के रखवाले
इसे रखेंगे शो-केसों में
मूढ़-गँवारों की चीखों से
            शाश्वत वाणी को क्या लेना।

लिए लुकाठी
रहा घूमता
गली-गली सिर-फिरा कबीरा
दो कौड़ी की साख नहीं थी
कैसे उसको मिलता हीरा
लखटकिया -
छंदों का स्वागत
राजसभा के द्वार करेंगे
निपट निराले
तेरे स्वर से
            इस ‘रजधानी’ को क्या लेना।
 


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