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कविता

कहाँ तलाशें
राजेंद्र गौतम


कहाँ तलाशें
इन ठूँठों में अमराई

लाल-लाल कोंपल-से
रिश्ते रेत हुए
बाबा-से बट-पीपल
खंखर प्रेत हुए
कहाँ तलाशें
दोपहरी में परछाईं।

दबी कहीं रेती में
शायद भोज-कथा
अब न अलावों पर
खुलती छिपी व्यथा
कहाँ तलाशें
अपनापे की गरमाईं।

झुकी नहीं आँगन में
भैया-सी छाया
अब छतनार नीम की
चिरी पड़ी काया
कहाँ तलाशें
कचनारों की तरुणाई।
 


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