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कविता

बिंब हूँ टटका
योगेंद्र दत्त शर्मा


इस समय की डाल पर मैं
फूल-सा अटका
मैं क्षितिज पर रश्मियों का बिंब हूँ टटका।

सह रहा हूँ मार मैं
विपरीत मौसम की
याद आती है कथा
अपने पराक्रम की
मैं उपग्रह था कभी अब राह से भटका।

यह समूची सृष्टि
यह ब्रह्मांड मेरा है
पर कभी लगता मुझे
यह तंग घेरा है
कहाँ से लाकर मुझे किसने यहाँ पटका।

भूमि से आकाश तक
फैला हुआ हूँ मैं
पर किसी अभिशाप से
मैला हुआ हूँ मैं
था कभी हीरा मगर अब काँच-सा चटका।

था कभी उपमान
अब उपमेय से पिछड़ा
छटपटाता हूँ निरंतर
पाश में जकड़ा
स्तब्ध विजड़ित हूँ मुझे ऐसा लगा झटका।

एक मंदिर के कंगूरे के
कलश-सा मैं
ध्वज कभी था किंतु अब
नतशिर विनश-सा मैं
कसी डूबे पोत पर मस्तूल-सा लटका।

मैं शिखर से हो रहा
कैसे धराशायी
अमृतवर्षी मेघ था
अब कंठ विषपायी
हर अशनि संकेत से रहता मुझे खटका।
 


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