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कविता

कामवाली
अवध बिहारी श्रीवास्तव


ऐसा हाड़कपाऊ जाड़ा
लड़की नहीं काम पर आई।

मम्मी, चाची, और बुआ की
होती है पंचायत घर में
‘जूठे बरतन पड़े हुए हैं’
‘खिचड़ी ही रख दो कूकर में’
झाडू़ पोंछा कौन करेगा ?
कहाँ ‘मर गई’ देखो भाई।

मम्मी, चाची और बुआ से
छोटी है, दुबली-पतली है
माँ रोगी है पिता शराबी
घूम रही जैसे तकली है
सबको अपनी पड़ी हुई है
कौन पढ़े उसकी कठिनाई।
 
आएगी पैसे माँगेगी
तब जाकर ‘आटा’ लाएगी
‘कारड’ नहीं बना है अब तक
जाने कब राशन पाएगी
काँप रहे हैं ‘बाबा दादी’
माँग रही है फटी रजाई।
 


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