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कविता

कथासुत
अवध बिहारी श्रीवास्तव


भइया आने वाले ही हैं
भौजी हुई मगन
लगता है कुछ अलग-अलग सा
घर, बाहर, आँगन।

दरवाजे का पानी अम्मा
बाहर फेंक रहीं
कंडे के अहरे पर दादी
बाटी सेंक रहीं
काका गए मछलियाँ लेने
बाबू स्टेशन।

काकी ले आईं अरुई के
पत्ते धुले हुए
भइया को पसंद हैं ‘रिंकवछ’
घर के तले हुए
दाल उरद की पीस रही हैं
सिल पर बड़ी बहन।

भौजी गाढ़ महावर रचकर
पियरी में सोहें
भइया के आने का रस्ता
खड़ी-खड़ी जोहें
कल थी व्रत की ‘तीज’ आज है
उनका भी ‘पारन’।
 


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