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कविता

रस-आखेटक
माहेश्वर तिवारी


तरह-तरह के
रस-आखेटक
            घूम रहे हैं।

रस-आखेटक
सिंहासन पर 
रस-आखेटक
बाजारों में
रस-आखेटक
जब-क्रीड़ा करते-मिलते
बहते धारों में
वन-उपवन में
रस-आखेटक
हिरन-तितलियों की
तलाश में
नोच-नोच कर
            पंखुरी-पंखुरी
            हँसते-गाते झूम रहे हैं।
 
कहते बंद करो,
पर रोना,
होगा वही
यहाँ जो होना,
है उनकी गिरफ्त में
सबकी गर्दन,
घर का कोना-कोना
फरमाते वे तो
रसज्ञ हैं
जन-मन से
गहरे कृतज्ञ हैं
            कली-कली को
            उपकृत करते चूम रहे हैं।
 


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