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सिनेमा

आज भी प्रासंगिक ‘घरे-बाहरे’
विजय शर्मा


एक लेख समाप्त किया है जिसमें 1996 में प्रकाशित और 2016 में सौ साल पूरे करने वाली किताबों की चर्चा की है। इनमें से एक किताब है 'घरे-बाहरे'। रवींद्रनाथ टैगोर के इस उपन्यास की जितनी प्रासंगिकता उस समय थी उससे अधिक नहीं तो कम आज भी है। आज जब देश में चारों ओर असहिष्णुता का हाहाकार मचा हुआ है, राष्ट्रीयता को ले कर प्रश्न किए जा रहे हैं, नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह स्वदेशी का गान हो रहा है, 'वंदे मातरम्' को ले कर बहस छिड़ी हुई है, तब यह उपन्यास पढ़ना और इस पर विचार करना मानीखेज है। 1905 में लॉर्ड कर्जन ने जो विष बीज बोया था आज वह एक विशाल वृक्ष बन कर सब कुछ तबाह करने पर तुला हुआ है। नोबेल पुरस्कृत रचनाकार कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की इस कृति पर लाइफ टाइम के लिए ऑस्कर पुरस्कृत फिल्म निर्देशक सत्यजित राय ने 1984 में इसी नाम से फिल्म बनाई। फिल्म का संगीत भी स्वयं सत्यजित राय ने दिया है। उन्होंने स्क्रिप्ट लिखी और संपादन पर भी आँख रखी। जब उपन्यास प्रकाशित हुआ और जब इस पर फिल्म बनी, दोनों समय इस पर खूब चर्चा-आलोचना हुई, खूब टिप्पणियाँ और लेख लिखे गए। 'घरे-बाहरे' पर इतने आक्रमण हुए कि टैगोर को अपने बचाव में लेख लिखने पड़े। सौ साल बाद भी इस किताब में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे आज के समय के संकट और संघर्ष को वाणी देता है। टैगोर की इस कृति की सबसे कम चर्चा हुई है, जबकि यह एक महत्वपूर्ण रचना है।

रवींद्रनाथ टैगोर और भारतीय राजनीति

रवींद्रनाथ टैगोर का कद खूब विराट और भव्य था, उनकी पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक हर टिप्पणी पर लोगों की दृष्टि रहती थी, उनकी हर बात का देशवासियों, खासकर बंगवासियों पर खासा प्रभाव पड़ता था। रवींद्रनाथ का परिवार बंगाल का एक संभ्रांत परिवार था। इस सुशिक्षित, सुसंस्कारित कुलीन परिवार में एक-से-एक प्रतिभावान व्यक्ति हुए। कला, भाषा-साहित्य-संस्कृति, आध्यात्म का केंद्र यह परिवार लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। कविगुरु राजनीति में आने के इच्छुक न थे मगर उनके अनुसार जिस काल और जिस देश में उनका जन्म हुआ था उसमें राजनीति से बच पाना संभव न था। 1905 में बंग-विभाजन की घटना से टैगोर अछूते न रह सके, फिर 1919 में हुए जालियाँवाला हत्याकांड ने उन्हें हिला कर रख दिया और उन्होंने उस घटना के विरोधस्वरूप ब्रिटिश राज से प्राप्त 'नाइटहुड' की अपनी उपाधि लौटा दी। उपाधि लौटाते समय उन्होंने एक लंबा पत्र भी लिखा। टैगोर ने स्वदेशी आंदोलन काल में देशप्रेम के कई गीत लिखे। फिल्म 'घरे-बाहरे' में उनमें से एक गीत संदीप गाता है। बंग-भंग द्वारा अँग्रेजों ने अपनी 'बाँटो और राज करो' नीति का पालन किया था, वे हिंदू-मुसलमान को विभाजित करने में सफल हुए थे। 1905 में ब्रिटिश इसमें सफल न हो सके लेकिन 1947 में उनकी नीति काम कर गई और मुस्लिम बहुल बंगाल पहले पूर्वी पाकिस्तान और अंततः 1971 में बांग्लादेश के रूप में खंडित हो गया।

घरे-बाहरे उपन्यास की पृष्ठभूमि

जब 'घरे-बाहरे' कृति का लेखन-प्रकाशन हुआ उस समय द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था। प्रत्यक्ष संबंध न होते हुए भी भारत इसमें भागीदारी कर रहा था। ब्रिटेन के अन्य उपनिवेशों की तरह भारतवासी भी इस महायुद्ध में झोंक दिए गए थे। भारत के जन-धन, पशु-धन, अनाज और धन की इससे खूब क्षति हुई। साहित्य में इसकी झलक हमें गुलेरी जी की कहानी 'उसने कहा था' में मिलती है। इस कहानी को भी सौ वर्ष हो चुके हैं। इस समय भारत में राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम पर था। उर्दू कवि, नेता मुहम्मद इकबाल अखंड राष्ट्र से नीचे उतर कर 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा' के स्थान पर अलगाववादी राष्ट्रवाद, मुस्लिम राष्ट्रवाद का गान करने लगे थे। 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट कर देश की राजनीति को नई दिशा दी। गांधी और टैगोर उस काल के भारतीय परिदृश्य पर दो महान व्यक्तित्व थे, दोनों का मिलना-जुलना, विचार-विमर्श होता था। टैगोर ने ही गांधी को 'महात्मा' का संबोधन दिया। दोनों एक-दूसरे का आदर करते थे। टैगोर गांधी जी की कई नीतियों से सहमत नहीं थे लेकिन वे कभी गांधी की सार्वजनिक आलोचना नहीं करते थे। वे देश के लिए गांधी का महत्व स्वीकार करते थे। लेकिन उनके मन में गांधी द्वारा किए गए कई कामों को ले कर संघर्ष था। स्वदेशी आंदोलन उनमें से एक था। उग्र स्वदेशी आंदोलन ने टैगोर जैसे आदर्शवादी और शांत व्यक्ति को एक तरह से राजनीति के हाशिए पर ढकेल दिया था। टैगोर का मानना था कि गरीबों पर जुल्म करके देश का भला नहीं हो सकता है। और देश पर अँग्रेजों के साथ-साथ उग्र विचार वाले देशवासी भी जुल्म ढा रहे थे। उपन्यास और फिल्म कहीं भी अँग्रेजों के अत्याचार को नहीं दिखाते हैं। बल्कि फिल्म 'मिस गिलबाई' के रूप में एक नरमदिल, शिक्षित इंग्लिश वूमन ब्रिटिश गवर्नेस को चित्रित करती है।

रवींद्रनाथ का घर कई संस्कृतियों का केंद्र था। घर में वैदिक, ब्राह्म समाज और यूरोपीय सभ्यता घुली-मिली थी। परिवार बंगवासियों का अपना था, यूरोपवासियों से भी उसका संपर्क था। वे चाहते थे कि लोग अपनी सभ्यता-संस्कृति के साथ-साथ अन्य देशों की सभ्यता-संस्कृति को भी जाने। उन्होंने विदेश पढ़ने गए अपने एक रिश्तेदार को इसी तरह का एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने उसे सलाह दी थी कि वह जहाँ गया है वहाँ के लोगों से भी घुले-मिले, उन्हें जानने-समझने का प्रयास करे। रवींद्रनाथ टैगोर के कई मित्र ब्रिटेन के साहित्य-संसार से जुड़े लोग थे। उनकी कृतियों का अँग्रेजों ने इंग्लिश में अनुवाद किया था और वे यूरोप तथा अमेरिका में चाव से पढ़े जाते थे। उनका अपना अध्ययन बड़ा व्यापक था।

ऐसे में स्वदेशी आंदोलन को लेकर उनके मन में शंका-संघर्ष होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। वे राष्ट्र प्रेमी थे, मगर कट्टर राष्ट्रवाद को भारत के लिए अप्रासंगिक और औचित्यहीन मानते थे। वे विदेशी सामान जलाने के पक्ष में न थे। क्योंकि इससे विदेशी लोगों नहीं वरन देशी व्यापारियों को नुकसान हो रहा था। ये बात उन्होंने गांधी जी से कही भी थी। उनके मन में अपनी संस्कृति, विदेशी संस्कृति, स्वदेशी आंदोलन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर बड़ा ऊहापोह था। शायद इसी मनःस्थिति में उन्होंने अपने इस उपन्यास 'घरे-बाहरे' की रचना की। उनके मन के संघर्ष यहाँ विस्तार पाते हैं। निखिल और संदीप उनके विचारों की टकराहट का परिणाम हैं। कुछ आलोचक निखिल को गांधीजी का प्रतिरूप मानते हैं और इसके लिए टैगोर की आलोचना करते हैं। यह मुझे किसी दृष्टि से सही नहीं लगता है। गांधी जी का कद उससे कहीं बहुत अधिक बड़ा था। इस आलेख में हम किताब से अधिक इस फिल्म की चर्चा करेंगे।

फिल्म घरे-बाहरे में स्त्री विमर्श

सत्यजित रे की इस फिल्म में निखिलेश की भूमिका विक्टर बैनर्जी ने की है, विक्टर बैनर्जी उस समय फिल्मों में नए-नए आए थे और संदीप बने हैं बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध-अनुभवी अभिनेता सौमित्र चैटर्जी, निखिल की पत्नी बिमला की भूमिका स्वातिलेखा चटर्जी (सेनगुप्ता) ने की है। जेनिफर कैंडल कपूर बहुत थोड़ी देर के लिए परदे पर आती हैं, प्रभावित करती हैं और यह उनकी आखिरी फिल्म थी। बिमला की बाल विधवा जेठानी के रूप में गोपा आइच को राय ने बड़ा माइल्ड कर दिया है। उपन्यास में यह जेठानी बहुत मुखर है, वह अपने वाक्यबाण से बिमला को सदा बींधती रहती है। फिल्म में वह नाक-भौं सिकोड़ती है मगर मुँह से कम बोलती है, यह दीगर है कि जब भी बोलती है कटु ही बोलती है। उससे बिमला का साज-श्रृंगार देखा नहीं जाता है, बिमला को मिली स्वतंत्रता उसे नहीं सुहाती है। वह निखिल के प्रति कोमल भाव रखती है, उसकी बनाई चीजों को सँभालकर रखती है भले ही ये चीजें काम लायक नहीं थीं। वह निखिल को पति के अपने अधिकार का बल प्रयोग कर बिमला को घर वापस लाने का सुझाव देती है जिसे निखिल अपने स्वभावानुकूल नकार देता है। वह कहता है जबरदस्ती लाकर भी बिमला का मन बाहर ही रहेगा। और अंत में वह बिमला को निखिल की मृत्यु का जिम्मेदार ठहराती है। फिल्म स्त्री विमर्श रचती है। विधवा जेठानी की अतृप्त कामनाएँ और असुरक्षा की भावनाएँ उससे यह सब करवाती हैं।

फिल्म में खुद बिमला स्त्री विमर्श की पर्याप्त सामग्री देती है। उसका रहन-सहन, साज-श्रृंगार, उसका घर से बाहर निकलना, देश में चल रहे आंदोलन से जुड़ना, अन्य पुरुष से संबंध स्थापित करना, वापस घर में, पति के पास लौटना सब विमर्श की सामग्री प्रदान करते हैं। सत्यजित राय ने फिल्म में चुंबन के दृश्य रखे हैं जो उस समय तक बांग्ला फिल्मों में आम बात न थे अतः दर्शकों और आलोचकों ने इस बात के लिए राय को खूब घेरा। फिल्म में चुंबन के दो दृश्य बिमला और संदीप के हैं तथा एक दृश्य पति-पत्नी अर्थात निखिल और बिमला का है। फिल्म में ये दृश्य जिस त्वरा के साथ, बिना पूर्व पीठिका के आते हैं उससे मुझे भी आपत्ति है। मुझे चुंबन को ले कर कोई आपत्ति नहीं है मगर जैसी स्थिति में इन्हें फिल्माया गया है वह कुछ जँचता नहीं है। प्रेम के बिना विकसित हुए यह खलता है। अभिनेत्री स्वातिलेखा की भी भद्र बंगाली समाज में आलोचना हुई थी, वे बहुत परेशान हुई थीं। लेकिन सत्यजित राय के समझाने पर वे इससे उबर आईं।

सत्यजित राय की घरे-बाहरे

सत्यजित राय का रवींद्रनाथ से पुराना रिश्ता था। सत्यजित के पिता रवींद्रनाथ के अच्छे मित्र थे। स्वयं सत्यजित राय ने शांतिनिकेतन में पढ़ाई की थी। शांतिनिकेतन से जो उन्होंने पाया था इसके बारे में वे कहते हैं कि मैंने जो तीन साल शांतिनिकेतन में गुजारे वे साल मेरे जीवन के सर्वाधिक फलदायी साल थे। आगे वे लिखते हैं कि शांतिनिकेतन ने मुझे भारतीय और सुदूर पूर्व की कला की भव्यता से परिचित कराया। इसके पहले मैं पूरी तरह पश्चिमी कला, संगीत और साहित्य से संचालित था। शांतिनिकेतन ने मुझे पूर्व और पश्चिम का मिश्रण बनाया है। उस समय सत्यजित रे मात्र 28-29 साल के थे। उन पर कविगुरु का गहरा प्रभाव था। उन्होंने टैगोर की कई रचनाओं को फिल्म में ढाला है। टैगोर की 'तीन कन्या', 'चारुलता' और 'घरे-बाहरे' तीन कृतियों पर फिल्म बनाई। राय ने टैगोर पर 1961 में एक वृ्त्तचित्र भी बनाया। शुरू में 'घरे-बाहरे' के लिए उन्हें फाइनेंसर नहीं मिल रहा था बाद में एन.एफ.डी.सी. ने इसे प्रोड्यूस किया। फिल्म का कला निर्देशन अशोक बोस का है तथा साउंड डिजाइनिंग रोबिन सेनगुप्ता, ज्योति चैटर्जी तथा अनूप मुखर्जी तीन लोगों ने मिलकर की है। सिनेमाटोग्राफी से किसी को शिकायत नहीं हो सकती है क्योंकि यह काम किया है अनुभवी सोमेंदु राय ने। रिलीज होने पर फिल्म को अच्छी प्रतिक्रिया मिली। वैसे कहने वालों का यह कहना है कि फिल्म के प्रति सहानुभूति और सकारात्मक टिप्पणियाँ मिलने में सत्यजित राय के हार्ट अटैक का भी हाथ था। आलोचक फिल्म की सफलता का श्रेय उसके चुंबन दृश्यों को देने से भी नहीं चूकते हैं। राय ने पहली बार अपनी फिल्म में चुंबन का प्रयोग किया है।

जब भी किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है तो निर्देशक फिल्म विधा की माँग के अनुरूप उसमें परिवर्तन करता है और साहित्य से जुड़े लोगों को यह रास नहीं आता है। खासकर टैगोर को लेकर बंग समाज बहुत पजेसिव रहा है। हर बंगाली समझता है कि सिर्फ वह टैगोर को जानता-समझता है। वे उनकी कृति से कोई भी छेड़-छाड़ सहन नहीं कर पाते हैं। हालाँकि सत्यजित राय स्वयं बंगाली समाज से आते हैं फिर भी उनकी आलोचना हुई। उन्होंने फिल्म की जरूरत के अनुसार उपन्यास में बदलाव किया है वे टैगोर के उपन्यास पर फिल्म बना रहे थे लेकिन वे अपनी समझ से फिल्म बना रहे थे। मेरी दृष्टि से इसकी सफलता का श्रेय सत्यजित राय का निर्देशन, अभिनेताओं की अदाकारी, फिल्म की फोटोग्राफी, कला संयोजन और संवादों को जाता है।

सत्यजित राय ने टैगोर की कई कहानियों पर फिल्में बनाई हैं। इस उपन्यास से उन्होंने बहुत पहले चालीस के दशक में ही स्क्रीनप्ले तैयार कर लिया था। फिल्म बहुत बाद में, करीब चालीस साल बाद बनाई। फिल्म की शूटिंग के दौरान राय को दो बार हृदयाघात हुआ अतः उनके विस्तृत रेखांकन के आधार पर उनके पुत्र संदीप राय ने फिल्मांकन पूरा किया। फिल्म 1907 ठीक बंगाल विभाजन की घटना के बाद के समय को दर्शाती है। पढ़ा-लिखा, आधुनिक विचारों का निखिल चौधुरी बंगाल के एक कुलीन जमींदार परिवार का मुखिया है। परिवार की समृद्धि से हट कर वह एक सामान्य बालिका बिमला से विवाह करता है। बिमला अब बड़ी हो गई है लेकिन उसने अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से कभी संभाषण नहीं किया है। दोनों का पारिवारिक जीवन बहुत सुखी है। बिस्तर पर लेटे हुए पति अपनी पत्नी का हाथ अपने हाथ में ले कर बातें करता है, ड्रेसिंग टेबल के सामने उसे प्रेम से अपनी बाँहों में घेरता है। नाव में घुमाने ले जाता है जहाँ तैरती नाव में उसे इंग्लिश कविताएँ सुनाता है। निखिल पत्नी को बहुत प्यार करता है उसने एक इंग्लिश (जेनिफर अकिंडल कपूर) गवर्नेस, मिस गिलबाई को रखकर बिमला की इंग्लिश शिक्षा, पियानो वादन, इंग्लिश रहन-सहन सिखाने की व्यवस्था की है। वह चाहता है कि बिमला घर के बाहर की दुनिया से भी परिचित हो। बिमला घर के भीतर की दुनिया में खुश है। निखिल देखना चाहता है कि क्या बाहर की दुनिया से परिचित होने के बाद भी बिमला उसे प्रेम करेगी। वह उसे एक मनुष्य, एक पूर्ण इकाई मानता है और इसी रूप में पूर्ण स्वतंत्र मानता है। एक व्यक्ति के रूप में सोचने-समझने और अपने निर्णय खुद करने के लिए वह उसे पूरी स्वतंत्रता देता है।

घरे-बाहरे की फिल्म भाषा

शीघ्र निखिल को इन बातों को कार्य रूप में परिणत करने का अवसर प्राप्त होता है। उसका कॉलेज के समय का एक बहुत करीबी दोस्त, फायरब्रांड स्वदेशी का हिमायती संदीप मुखर्जी उसके यहाँ आता है। फिल्म में निखिल का प्रवेश फिल्मांकन की दृष्टि से एक बड़ा सफल शॉट्स है। 140 मिनट की इस रंगीन फिल्म का यह दृश्य बड़ी कुशलता से फिल्माया गया है। राय के यहाँ प्रतिनायक का प्रवेश सदैव बड़ी घटना के रूप में होता है। यहाँ भी संदीप लोगों के कंधों पर सवार होकर आता है लोग 'वंदे मातरम्' के नारे लगा रहे हैं। वह खुद भी गेरुआ दोशाला लिए हुए है और सभा के लोग भी गेरुआ वस्त्रों में हैं। कंधों से उतर कर वह मंच पर जाता है और बड़ा जोशीला भाषण देता है। संदीप अपने भाषण में बताता है कि लॉर्ड कर्जन ने बंग-भंग करके हिंदु-मुस्लिम के भाईचारे, एकता और दोस्ती भंग कर दिया है। हमें इसके विरुद्ध आंदोलन करना होगा। यह सारा कार्य-व्यापार बिमला सहित निखिल के घर की स्त्रियाँ जालीदार छज्जे से देखती-सुनती हैं। पूरा सीन पहले लॉन्ग शॉट्स में फिर मिड लॉन्ग शॉट्स तथा क्लोजअप में फिल्माया गया है। इसी तरह अंतिम दृश्य भी लॉन्ग शॉट्स तथा क्लोजअप में शूट किया गया है। पूरी फिल्म में डीप फोकस, क्लोजअप्स, मीडियम लॉन्ग शॉट्स, मीडियम शॉट्स, मीडियम क्लोजअप्स का भरपूर प्रयोग हुआ है, एकाध स्थान पर लॉन्ग शॉट्स लिए गए हैं।

फिल्मांकन की बात करें तो निखिल का महल जैसा घर और उसकी सजावट, घर भर में जगह-जगह रखी कीमती विदेशी सजावट सामग्री, बीसवीं सदी के प्रारंभ को साकार करती पात्रों की पोशाकें, मुख्य और गौण पात्रों का अभिनय, पार्श्व संगीत एक-एक बात का सत्यजित राय ने ख्याल रखा है। धीमी गति से चलने वाली इस पूरी फिल्म में काँच और दर्पण का प्रयोग हुआ है। घर और बरामदों की सजावट रंगीन स्टेन ग्लासेस से हुई है। पूरे घर में जगह-जगह आदमकद आईने लगे हुए हैं, खासतौर से निखिल-बिमला के शयनकक्ष तथा बाहरी बैठक में पात्र इनका खूब उपयोग भी करते हैं। बिमला कई बार खुद को निहारती है, संदीप खुद को दर्पण में देखता है, बिमला का प्रतिबिंब दर्पण में दीखता है। अंत में बिमला दर्पण से लग कर खूब रोती है। चिंतित निखिल को उसकी विधवा बहन दर्पण में देखती है। फिल्म में और भी कई बार दर्पण आया है। यह हृदय और मस्तिष्क के संघर्ष की कहानी है जिसे दर्पण का प्रतीक भलीभाँति प्रस्तुत करता है।

फिल्म का प्रारंभ आग की लपटों से होता है। पूरी फिल्म में आग कई बार आई है, इसका उपयोग एक मोटिफ के रूप में हुआ है। प्रारंभ की आग वास्तव में चिता की आग है। निखिल की चिता जल रही है। आग की लपटों पर क्रेडिट चलता है। पार्श्व संगीत चल रहा है जो क्रेडिट समाप्त होते-होते वंदे मातरम्' के नारों में परिवर्तित हो जाता है। आग की लपटों का रंग और बाद में वंदे मातरम् के नारे लगाने वालों के कपड़ों का रंग एक है। पीला-केसरिया रंग और आग आंदोलन का भी प्रतीक है। इसी समय बिमला की आवाज सुनाई देती है वह आग को एक अन्य अर्थ देती है। उसके शब्द हैं, मैं अग्निपरीक्षा से गुजरी हूँ। मुझमें जो अशुद्ध था वह राख हो गया है। जो था उसे तुम्हें निवेदन कर दिया है, जिसने घायल हृदय से मेरे सारे अपराधों को स्वीकारा। आज पता चला कि उसके जैसा कोई और नहीं है।" फिल्म का ये शुरुआती शब्द टैगोर के उपन्यास के अंतिम शब्द हैं। बाद में संदीप स्वदेशी आंदोलन के तहत विदेशी वस्तुओं की होली जलवाता है, मुसलमान मंदिर जलाते हैं, संदीप गरीब व्यापारियों का विदेशी सामान बलपूर्वक जलवाता है। निखिल संदीप की छोड़ी जलती हुई सिगरेट देखता है, संदीप लगातार विदेशी सिगरेट पीता है। संदीप निखिल-बिमला के वैवाहिक जीवन में ऐसी आग लगाता है जिसमें सब स्वाहा हो जाता है। निखिल अपने बरामदे से जलता हुआ गाँव देखता है। कुछ आग प्रच्छन्न है, बिमला पश्चाताप की आग में जलती है। निखिल के मन में संघर्ष की धीमी आग है। संदीप अपने जोशीले भाषण में आग उगलता है। संदीप में उत्तेजना, राष्ट्रवाद की धधकती आग है, जिसमें वह सब भस्म कर डालता है लेकिन स्वयं सुरक्षित बच निकलता है। सत्यजित राय ने इस फिल्म में आग को विभिन्न प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया है।

दुलाल दत्ता द्वारा संपादित यह बांग्ला फिल्म इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ उपलब्ध है। लाल रंग और लाल रंग की विभिन्न छटाओं को इस फिल्म में प्रमुखता से स्थान देकर सत्यजित राय ने सिनेमाई भाषा में उस काल की राजनीति को साकार किया है। फिल्म का अधिकांश हिस्सा बंद कमरे में तेल वाले लैंप की धीमी रोशनी में चलता है। जैसा उन दिनों होता था। सत्यजित राय पर विदेशों में भारत की गरीबी बेचकर प्रशंसा लूटने का आरोप लगता है। ऐसा आरोप लगाने वालों को फिल्म 'घरे-बाहरे' अवश्य देखनी चाहिए। इसमें राय ने उस समय के बंगाल के कुलीन जमींदारों के ऐश्वर्य को विस्तार से दिखाया है। यह फिल्म मात्र मनोरंजन के लिए नहीं देखी जा सकती है यह सोचने-समझने की, जुगाली करने की भरपूर सामग्री दर्शक को प्रदान करती है।

बिमला और स्वदेशी आंदोलन

बिमला जिसने कभी किसी अन्य पुरुष को नहीं देखा-सुना है और जो निखिल के मुख से संदीप की बातें सुन चुकी है आज उसका भाषण सुन कर और उसका सुदर्शन स्वरूप देख कर अभिभूत हो जाती है। पूरी फिल्म फ्लैशबैक में चलती है और बिमला की डायरी के मार्फत चलती है। बिमला अपनी डायरी में लिखती है, "उस क्षण मैं बंगाल के स्त्रीत्व की एकमात्र प्रतिनिधि थी - और वह, बंगाल के साहस के पौरुष का।" वह स्वयं को भारत माता के स्वरूप में देखती है। वह स्वयंमुग्धा की अवस्था में है, जो उसके पतन का कारण बनती है।

संदीप निखिल का सबसे करीबी दोस्त है, वह अपनी सब बातें उसे बताया करता था। लेकिन दोनों मित्रों में जमीन-आसमान का फर्क है। निखिल सतोगुण प्रधान है जबकि संदीप रजोगुण का पुंज है। फिल्म में यह फर्क दोनों के रूप-रंग और वेशभूषा द्वारा दिखाया गया है। निखिल क्लीनसेव्ड सीधा-सादा, स्पष्ट बोलने वाला, शांत स्वभाव का व्यक्ति है, वह आँख मूँदकर परंपरा को मानने में विश्वास नहीं करता है, उसकी कथनी-करनी में एकरूपता है, जबकि संदीप सुरुचिपूर्ण पोशाक धारण करता है, उसकी सँवारी हुई दाढ़ी, उसकी बातचीत का ढंग, आवेशयुक्त मुखमुद्रा, उग्र विचार पहली दृष्टि में आकर्षित करते हैं। लेकिन निखिल ठीक कहता है संदीप को जितना कम जाना जाए उतना अच्छा। वह बिमला को बताता है कि संदीप का स्वभाव चंचल है उसका कई देशी-विदेशी स्त्रियों से संबंध रहा है मगर जब उसके माता-पिता उसका विवाह करना चाहते थे तो उसने उनसे ही नाता तोड़ लिया। साथ ही निखिल चाहता है कि बिमला घर की चारदीवारी से बाहर निकले और दुनिया देखे, लोगों से मिले इसीलिए वह उसे जनानखाने से निकालकर घर की बाहरी बैठक में संदीप से मिलाने ले जाता है। टैगोर का उस काल में पत्नी को इस तरह स्वतंत्रता देना बहुत सारे लोगों को नागवार गुजरा था। फिल्म का यह दृश्य फिल्मांकन का एक बहुत कुशल दृश्य है। स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर के भाई सुरेंद्रनाथ टैगोर अपने मित्र से अपनी पत्नी का परिचय कराने मित्र को अपने शयनकक्ष में लेकर आए थे। फिल्म में बिमला की डायरी के अनुसार 15 नवंबर 1907 को शादी के 10 साल के बाद बिमला पहली बार बाह्य जगत में पैर रखती है। निखिल और बिमला धीरे-धीरे, संग-संग चलते हुए घर के स्टेनग्लास से आती बाह्य रोशनी से चमकते, दीवारों पर फोटो और कीमती गुलदानों से सजे, लंबे-लंबे कई कॉरीडोर को पार करते हैं। इस समय का पार्श्व संगीत बड़ा मनमोहक है। बिमला को देख कर संदीप अवाक रह जाता है, वह एकटक उसे देखता रह जाता है।

बिमला संदीप का भाषण सुन कर पहले से मुग्ध थी, उससे मिल कर पूरी तरह से उसके मोहपाश में बँध जाती है। संदीप जोर-शोर से अपनी बात कहता है, भावपूर्ण तरीके से देशप्रेम के गीत गाता है। यह एक सच्चाई है कि सौमित्र चैटर्जी वास्तविक जीवन में बहुत सुंदर काव्य पाठ करते हैं, फिल्म में भी वे संदीप की भूमिका में बहुत भावपूर्ण तरीके से गायन करते हैं। मासूम बिमला को आकर्षित करने के लिए संदीप को बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता है। और फिल्म में प्रेम-त्रिकोण बनता है। ऐसा नहीं है कि निखिल इस बात से अनजान है लेकिन वह चाहता है कि बिमला को प्रौढ़ता के साथ खुद तय करना चाहिए, उसे असल-नकल की पहचान होनी चाहिए तभी उसके प्रेम की सही परीक्षा होगी। वह चाहता है कि बिमला अन्य पुरुषों को देखे, उनसे वार्तालाप करे और तब निखिल का मूल्यांकन करे। बिमला पहली बार पति के अलावा किसी अन्य पुरुष को देखती है उसको पहली बार उद्दाम प्रेम का अनुभव होता है और वह उसमें बह जाती है। वैसे टैगोर इन दोनों का केवल हाथ पकड़वाते हैं।

टैगोर का ऑल्टर ईगो निखिल

निखिल स्वयं टैगोर के विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। विक्टर बैनर्जी ने निखिल के रूप में बहुत सधा हुआ और बहुत सुंदर अभिनय किया है शुरु में उसका खुशनुमा चेहरा देख कर प्रसन्नता होती है, वह बिमला से मजाक करता है। ज्यों-ज्यों स्थितियाँ बदलती जाती हैं उसके चेहरे का गांभीर्य बढ़ता जाता है, उसकी चाल बदल जाती है वह सदा चिंतायुक्त मुद्रा में रहता है। वह सब देख-समझ रहा है, परंतु अपने स्वभाव के अनुकूल चाहता है कि लोग खुद समझें और निर्णय लें। उसके अनुसार हर व्यक्ति मनुष्य होने के नाते स्वतंत्र है। वह सबको समान अधिकार देने का हिमायती है। निखिल स्वदेशी को बहुत गंभीरता से लेता है जबकि संदीप के लिए यह खुद को स्थापित करने का साधन है। वह देश को जोर-जबरदस्ती से हथियाना चाहता है।

भारत की प्राचीन और नवीन सामाजिक स्थिति, तत्कालीन समाज की अच्छाई-बुराई की टैगोर को बहुत अच्छी जानकारी थी। निखिल बिमला से कहता है कि हमारे समाज में परदा प्रथा नहीं थी, यह मुगलों के साथ आई। वह स्वदेशी आंदोलन के नाम पर अपनी जमींदारी में रहने वाले गरीब मुसलमान व्यापारियों के विदेशी माल जलाने के पक्ष में नहीं है। विदेशी वस्तुओं के उपयोग से भारतीय गरीब हो रहे हैं इसे वह स्वीकारता है लेकिन वह यह भी जानता है कि स्वदेशी वस्तुएँ मँहगी होती हैं और उन्हें अधिकांश जनता खरीद नहीं सकती है। वह स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन करने का प्रयास कर चुका था और उसे इसमें सफलता नहीं मिली थी। इन वस्तुओं में गुणवत्ता नहीं थी और वे मँहगी भी थीं। वह केवल जबानी जमा-खर्च में विश्वास नहीं करता है जबकि संदीप के पास इसके अलावा कुछ नहीं है।

उग्र स्वदेशी का पर्याय संदीप

संदीप में बहुत सारे गुण हैं। वह भाषण देने में कुशल है, पियानो बजाना जानता है, सुदर्शन है, सबसे बड़ी बात अपने लक्ष्य को हासिल करना जानता है। संदीप स्वयं अमीरी का, आरामतलबी का जीवन व्यतीत करता है। बिमला से वायदा करने पर भी विदेशी सिगरेट पीना नहीं छोड़ता है। उसका उद्देश्य शक्ति और नेतागिरी है। वह लोगों को खासकार स्त्रियों को आकर्षित करने में प्रवीण है। बिमला को भी रिझाने के लिए वह उसे मक्खी-रानी (क्वीन-बी) कहता है। वह गरीब मुसलमान व्यापारियों को स्वदेशी आंदोलन में भाग नहीं लेने की सजा देना चाहता है और इस तरह सांप्रदायिकता फैलाता है। वह राजनैतिक लाभ उठाना चाहता है और अपनी धाक जमाना चाहता है। संदीप बहुत स्वार्थी व्यक्ति है, वह अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को मोहरा बनाता है। मास्टर उसे बहुत अच्छी तरह जानता है वह कहता है कि जब तक संदीप आस-पास है तब तक भला नहीं हो सकता है। मास्टर निखिल से भी कहता है कि यदि संदीप तुम्हारे घर से आंदोलन का संचालन करता है तो लोग सोचेंगे कि इसमें तुम्हारा भी समर्थन है और यह तुम्हारे लिए खराब होगा। निखिल के घर में रहते हुए वह उसकी पत्नी से पैसों की माँग करता है और देशप्रेम के झाँसे में आकर बिमला बिना पति को बताए अलमारी में रखी सोने की मोहरें लाकर उसे दे देती है। इतना ही नहीं संदीप की सहायता के लिए वह अपने कीमती गहने भी बेचना चाहती है। इसी तरह वह अमूल्य का भी भावात्मक दोहन करता है। हालाँकि अंत में फिल्म दिखाती है कि संदीप निखिल की उपस्थिति में सोने की मोहरें तथा बिमला के गहने उसे लौटा देता है। इसके पहले ही बिमला को अपनी भूल ज्ञात हो चुकी है वह पति को सब कुछ बता चुकी है और निखिल ने उसे फिर से अपना भी लिया है। बिमला के मन में पश्चाताप है, इस अनुभव से उसे निखिल के प्रेम और उसके महत्व का पता लग चुका है।

घरे-बाहरे और तत्कालीन बंगाल की स्त्री

जब उपन्यास लिखा गया तब तक सती प्रथा समाप्त हो चुकी थी लेकिन भारतीय समाज में विधवा विवाह का प्रचलन नहीं था और बाल विवाह एक आम बात थी। निखिल की बाल विधवा भाभी इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है। फिल्म 'घरे-बाहरे' स्त्री विमर्श का वितान रचती है। विधवा स्त्री की सैक्सुआलिटी दमित होकर कड़ुआहट में अभिव्यक्ति पाती है। सधवा और विधवा स्त्री का पहनावा उनका अंतर स्पष्ट कर देता है। एक ओर निखिल की बाल विधवा भाभी सदा सफेद कपड़े में, बगैर ब्लाउज, बिना सिले एक वस्त्र में, बिना किसी साजश्रृंगार के, बंगाल की पारंपरिक विधवा वेशभूषा में है। दूसरी ओर बिमला शीशे के सामने खड़ी हो कर घंटों साज-श्रृंगार करती है। वह अपने पति के लिए सजती-सँवरती है, नई चाल के कपड़े-गहने पहनती है, अपने कपड़े खुद डिजाइन करती है। फ्रिल-लेस वाले ब्लाउज, केश-विन्यास, गहने, चप्प्ल-जूते पहनती है। उस समय पढ़ी-लिखी और ब्राह्म समाज की स्त्रियों की यही वेशभूषा थी। निखिल भी चाहता है कि उसकी खूबसूरत पत्नी का सौंदर्य वह अकेले न निहारे उसे दूसरे लोग भी देखें। उसने अपनी पत्नी की हर बात, उसकी हर विशेषता संदीप को बताई हुई है।

मेकअपमैन अनंत दत्ता 1907 के भद्र बंगाली समाज के स्त्री-पुरुषों के रूप-रंग से भलीभाँति परिचित लगते हैं। कला निर्देशक अशोक बोस ने सेट डिजाइनिंग में छोटी-से-छोती बातों का ध्यान रखा है। बिमला की श्रृंगार मेज देशी-विदेशी चीजों से भरी हुई है, कमरा कीमती और रंगीन फर्नीचर और वस्तुओं से पटा पड़ा है। जबकि उसकी जेठानी को निराभरण, बरामदे में बैठे दिखाया जाता है, वह जब-तब बिमला के कमरे के दरवाजे तक आती है, उसके आगे उसका प्रवेश नहीं है। वहीं से वह बिमला के रंगीन जीवन को देखती है, पति द्वारा मिले प्रेम-सम्मान और स्वतंत्रता को हसरत भरी नजरों से ताकती रहती है। उसका एकमात्र मनोरंजन ग्रामोफोन सुनना है। उसे बिमला की जीवन शैली नहीं रुचती है और यह वह अपने हाव-भाव तथा शब्दों से प्रकट करती है।

संवाद का महत्व और प्रमुखता

बाद में निखिल मास्टर के सामने संदीप का विश्लेषण करता है कि संदीप में इतने गुण है मगर वह असंतुष्ट है, असल में कोई उपलब्धि नहीं कर पाया है इसीलिए ऐसा व्यवहार करता है। बाद में वह चाह कर भी संदीप को अपने घर से जाने के लिए नहीं कह पाता है, मास्टर सब समझता है, उसे निखिल की हिचकिचाहट का मूल ज्ञात है। चूँकि फिल्म विचारों से संबंधित है अतः फिल्म के संवादों पर ध्यान देना आवश्यक है और इसके लिए फिल्म को एक से अधिक बार देखना जरूरी होगा। ज्यादातर संवाद तीनों प्रमुख पात्रों के बीच चलते हैं। वैसे हेडमास्टर (मनोज मित्रा), अमूल्य (इंद्रप्रमित राय), कुलदा (बिमल चैटर्जी) के संवाद भी फिल्म को आगे बढ़ाने और मूल उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। राय के अनुसार उन्होंने उपन्यास के संवाद न रखकर अपने संवाद निर्मित किए हैं क्योंकि ये अधिक स्वाभाविक हैं।

घरे-बाहरे और राष्ट्रीयता

निखिल और संदीप के लिए राष्ट्रीयता के अर्थ भिन्न हैं। निखिल जानता है कि विदेशी वस्तुएँ गुणवत्ता में देशी वस्तुओं से अच्छी और सस्ती हैं। स्वदेशी माल अमीर लोग खरीद समते हैं गरीब नहीं। वह मानता है कि जो सामान बेचता है बाजार उसका होता है जमींदार का नहीं। वह मानता है कि स्वदेशी आंदोलन के कर्ता-धर्ता देश को एक अमूर्त विचार के रूप में लेते हैं, वे अपने देश की एक मूर्ति गढ़ लेते हैं, मानते हैं कि देश माँ है, उसकी पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, उसकी सेवा करते हैं, यह स्त्रियों को बहुत भाता है लेकिन खुद निखिल इस तरह नहीं सोचता है। निखिल के गाँव में हिंदू-मुसलमान मिलकर रह रहे थे, व्यापार कर रहे थे लेकिन ढाका से बाहरी मुसलमान आकर गाँव के मुसलमानों को भड़काते हैं और सब मिल कर मंदिर में आग लगाते हैं। निखिल इस सारे विद्वेष में केवल मुल्ला की नहीं अपने लोगों की भी गलती मानता है। वह मजिस्ट्रेट से बात नहीं करना चाहता है क्योंकि मजिस्ट्रेट को दंगों से खुशी होगी, इन्हें शांत करने में नहीं। वह खुद दंगाग्रस्त इलाके में जाता है। वैमनस्य बढ़ता है निखिल इसमें अपनी आहुति देता है। निखिल बल प्रयोग में विश्वास नहीं करता है जबकि संदीप का मानना है कि बल प्रयोग द्वारा ही हम देश या किसी चीज को पा सकते हैं। संदीप को विदेशी माल लाने वाले मुस्लिम नविक की नाव डुबवाने में कोई संकोच नहीं होता है। वह दुष्ट मुनीम कुलदा के साथ मिलकर यह काम करवाता है। आदर्शवादी निखिल में भी देश प्रेम है, लेकिन देश सेवा की अंधभक्ति उसे स्वीकार्य नहीं है। अंध राष्ट्र भक्ति मरने-मारने को उकसाती है। अंत में निखिल का घायल होना/मरना और बिमला का विधवा होकर घर में कैद होना क्या कहना चाहते हैं टैगोर और राय? निखिल ने तो बिमला को उसकी गलती के लिए माफ कर दिया था फिर उसे सजा क्यों मिली। निखिल मर गया, संदीप चला गया, दुख भोगने को बची केवल बिमला।

सत्यजित राय का घरे-बाहरे

राय ने फिल्म में उपन्यास का अंत बदल दिया है यह अंत उपन्यास के खुले अंत को सीमित करता है। टैगोर निखिल को गंभीर रूप से घायल दिखाते हैं मरा हुआ नहीं जबकि राय ने उसका अंत कर दिया है। अंत का लॉन्ग शॉट और क्लोजअप बहुत कुछ कहता है। शॉक्ड बिमला का दीवार से चिपके खड़े रहना, कैमरे का निखिल और बिमला के फोटोफ्रेम पर केंद्रित होना फिर घूम कर बिमला पर फोकस करना। कैमरे के कमाल से सधवा बिमला विधवा बिमला में सहजता से परिवर्तित हो जाती है। पहले उसके सुहाग चिह्न उसकी बिंदी का मिटना फिर उसकी रंगीन साड़ी का सफेद साड़ी में बदल जाना उसकी सामाजिक एवं पारिवारिक स्थिति परिवर्तन को दिखाता है। वह अपने स्थान से हिलती नहीं है लेकिन उसका अंतर-बाहर सब बदल जाता है। यहाँ मुझे ऑर्सन वेल्स के 'सिटीजन केन' का डिनर टेबल सीन याद आ रहा है जहाँ डिनर टेबल पर मात्र पात्रों की उम्र और वेशभूषा परिवर्तन से वे कई सालों के समय को चित्रित करते हैं।

टैगोर का घरे-बाहरे

इस उपन्यास के अंत में आया टैगोर का निराशावाद चकित करता है। क्या उन्हें भविष्य का भान हो गया था? उपन्यास के अंत में वे निखिल को घायल कर देते हैं। क्या यह बंगाल का भविष्य है? टैगोर देखने को न रहे पर हमने देखा है कि बंगाल कैसे घायल हो गया, टुकड़ों में बँट गया। पहले पूर्वी पाकिस्तान के रूप में, फिर बांग्लादेश के रूप में बंगाल क्षत-विक्षत हुआ। क्या वे आज के बंगाल की दुर्दशा का अंदाज लगा चुके थे? आदर्शवादी, शांत, सत्य का पक्ष लेने वाला, समानता की बात करने वाला, निस्वार्थ, समझदार, खुले दिल वाला, तर्कपूर्ण निखिल जख्मी हो जाता है और अतार्किक, तानाशाह, राजसी जीवन का आदी, स्वार्थी, अवसरवादी संदीप जीवित रहता है। यही तो है आज का बंगाल और आज का हमारा देश और आज की हमारी दुनिया। टैगोर ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम दिन 'सदी का सूर्यास्त' नाम से कुछ इसी भाव की एक कविता लिखी थी। कवि क्रांतिदृष्टा होता है उन्होंने इस कविता में बताया है कि लालच, स्वार्थ, घृणा, युद्ध, अत्याचार का परिणाम देश को निगल लेगा।

उपन्यास में राष्ट्रीयता, देशप्रेम, धर्म-आध्यात्म, नैतिकता, नवीन-प्राचीन, आधुनिकता-प्राचीनता, स्वदेशी-विदेशी, साधन-साध्य, अच्छाई-बुराई, आदर्शवाद-यथार्थवाद आदि की अवधारणा पर खूब विचार-विमर्श है। टैगोर का उपन्यास तीनों मुख्य पात्रों के आंतरिक संघर्ष के साथ-साथ भारतीय पारंपरिक पारिवारिक संरचना को भी प्रस्तुत करता है, जिसमें समर्पित पत्नी-गृहणी है और देवरानी-जिठानी का रिश्ता भी है। बिमला घर से बाहर निकलने और संदीप के संपर्क में आने के बाद अपना पारंपरिक बहू का चोला उतार देती है, जेठानी के चंगुल से भी निकल आती है और पुरुषों से सहज-स्वाभाविक ढंग से बातचीत कर पाती है। उपन्यास का अंत आते-आते तक वह एक स्वतंत्रचेता व्यक्ति के रूप में विकसित होती है। परंतु फिल्म विस्तार में न जा कर परिवार, स्वदेशी आंदोलन पर केंद्रित रहती है। उपन्यास बिमला के चरित्र में हुए परिवर्तन को, उसकी आंतरिक-मानसिक उथल-पुथल को विस्तार से दिखाता है फिल्म में इसकी बहुत गुंजाइश नहीं बनती है। फिल्म में उपन्यास जितने विस्तार की गुंजाइश नहीं होती है, उपन्यास और फिल्म दोनों का कलेवर भिन्न होता है। यह भिन्नता टैगोर और राय के 'घरे-बाहरे' में नजर आती है। उपन्यास और फिल्म दोनों की सार्थकता आज भी है शायद पहले से कहीं अधिक।


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