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कविता

द्वेष
प्रफुल्ल शिलेदार


वह अनजाने में हो रही
ईर्ष्या से आता है
वह अभाव से आता है
उसे लाँघकर
न-भाव की ओर जाना
आसान नहीं होता
यह सहजता से किया नहीं जा सकता
दहशत का चलनी सिक्का
अँगूठे से उड़ाकर
भीड़ के साथ मगरूरी से खेलने वालों के
अनदिखे चेहरे का
यह एक दयनीय पक्ष है
हर किसी को बचपन में ही
सभी दुश्मनों की
ठीक से पहचान कराई जाती है
साथ ही विद्वेष करने का
बाकायदा प्रशिक्षण भी दिया जाता है
कई घरों में वह
कड़ी वाले पीतल के पुराने डिब्बे में
पुश्तैनी जेवरातों जैसा
सम्हालकर रखा होता है
अगली पीढ़ी के हाथों
इत्मीनान से सौंपा जाता है
म्यान से बाहर निकलने की
कोई संभावना नहीं ऐसी
पुरानी तलवार जैसा किसी संदूक में
या टूटी दुनाली जैसा
परदादा की फोटो के पास
टँगा होता है
दादा के झुर्रियों भरे नरम हाथ जैसा
विद्वेष भी लुभावना हो
इसकी पूरी सावधानी आस-पास के सभी
अबूझपन में ही लेते हैं
सारे धर्मग्रंथ
उसी के बस्ते में लपेटकर रखना
सभी को पसंद होता है
उनकी पवित्रता उससे
बढ़ जाती है
उनके धोखेबाज पाठ
ढँक जाते हैं
सदियों से
यह खेल चलता आ रहा हैं
हम सब मिल कर
फिर से और सब का
विद्वेष करते हैं
उन्माद की पालकी लेकर
जुलूस निकलता है
उन्माद के ताबूत नचाती भीड़ से
टक्कर लेता है
हर वार करने से पहले
विद्वेष किया गया होता है
जख्मों से जो खून बहता है
उसकी जगह
विद्वेष लेता है
इस बार तो वह
पूरे खून में घुलता है
जख्म पर फूँक मारने के लिए
खुले हुए हर मुँह से
विद्वेष पर अधिक जोर से
फूँक मारी जाती है
गाँव जिस तालाब का पानी पीता है
उसमें भी चुटकी भर विद्वेष डाला जाता है
पानी सड़ता
उसका स्वाद लौटने के लिए
पीढ़ियाँ लगती है
विद्वेष
गली कूचे में
जोर से स्पीकरों से बजता है
हर चौराहे में
उसी के बड़े-बड़े फलक
हर साइट पर
उसी के फ्लैश
हर बाइक से उसी का धुँआ
हर गायिका के गले में
उसकी ही खराश
हर वस्तु से उसकी जिह्वाएँ
बेशर्मी से बदन चाटने लगती है
कविता लिखते समय भी
विद्वेष उभरता है
कवि के मन में
विद्वेष शब्द के
शत्रुता बैर तिरस्कार ईर्ष्या
बदला डाह मत्सर घृणा जलन
खुन्नस नापसंदी नफरत घिन
दुष्टता कुत्सा दुश्मनी
ये सारे अर्थ
उसे पता होते है
फिर भी वह विद्वेष शब्द का प्रयोग
अपनी कविता में
यूँ ही कभी नहीं करता
प्रयोग करना ही रहा
तो बहुत सोच समझ कर
उसके अर्थ के साथ झगड़ते हुए
सावधानी बरत कर वह करता है
सिर्फ विद्वेष की सहायता से
कोई भी सत्ता
पलटी नहीं जाती
यह उसे पता है
लेकिन
पृथ्वी जिसमें कि वह रहता है
उस सारी पृथ्वी को
अपने काबू में रखने की
निरंतर कोशिश में जुटे
एक विशाल यंत्र का
एक स्क्रू ढीला करने का प्रयास
वह ताउम्र करता रहता है।


(मराठी से हिंदी अनुवाद स्वयं कवि के द्वारा)
 


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