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कविता

सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम
मनीषा जैन


तुम्हारे एक अदद चौबारे में
जब जब होती हैं
गंभीर राजनीतिक, आर्थिक गोष्ठियाँ
उन बेदर्द, बेखौफ संगठनों की
सीरिया या ईरान व ईराक के
उन मानवता के विरोधी संगठनों की

क्यों तुम्हारी छाती में विषैले फण नहीं उगते
जब किसी बच्चे के हाथ में रोटी नहीं होती
जब वह अनाथ रोता है
रेगिस्तान में अकेला
अनाज सड़ता है धरती की छाती पर
औरतें कोसों दूर पानी भरने चली जाती है
सिर पर इच्छाओं की मटकी उठाए
मुँह अँधेरे जब जाती हैं जंगल
डरी सहमी सी बैठती हैं जंगल

तब तो तुम अलगाव वदियों से सुलह कर रहे होते हो
या देश बाँटने की मंत्रणा कर रहे होते हो

उन विषैले साँपों की मंत्रणा धराशायी होती है
उस वक्त जब किसी जंगली आदिवासी के
पानी पीने का बर्तन मिलता है रास्ते में
या किसी बच्चे की छोटी सी चप्पल टँगी मिलती है पेड़ पर
उसे अर्से पहले गायब कर दिया गया था

जब शांति वार्ताएँ विफल होती है
तब ही अराजकता का बिगुल बजता है
गरीबों का बहता है लहू
रेड कारपेट बिछाया जाता है
तभी राष्ट्राध्यक्ष पानी पीते हैं
काँच के गिलासों में
जिसे बनाने में धमन भट्टी के मजदूर की
कितनी रातें स्वाहा हुई होगी
और कितनी रातें वह भूखा सोया होगा
कितने दिन वह अपने परिवार से दूर रहा होगा

एक ही झटके में गिर कर टूटता है गिलास
राष्ट्राध्यक्ष की चौखट पर
नाक रगड़ते है बिचौलिए
जो इकट्ठा कर लाते हैं बाल मजदूरों को
गायब किए गए बच्चों को लगाते हैं काम पर
कहाँ पर ठहरता होगा उनका मन
और वे निरीह प्राणी
माँ बाप पत्थर के नीचे दबाते है
अपने सपने अपने मन
जिनके बालक नापैद हो गए
उन बच्चों की माँए पछाड़ खा कर गिरती हैं
और राष्ट्राध्यक्ष के घर खनकते हैं
जाम पर जाम
रात गहरी होने पर वे सोने चले जाते हैं
मखमली बिस्तर में धँस जाते हैं वे

कल कौन से समझौते साइन करने
कौन से है कपड़े पहनने
और कौन से है सपने खरीदने
इसी लिए तो पैदा हुए हैं वे
बह रहा है समय ज्वालमुखी की नदी सा
पूजा अर्चना हो रहे है विफल
ऐसे में स्त्री का क्रंदन
दब कर रह जा रहा है
जैसे राख में चूल्हे की
 
ईश्वर स्वयं ही बजा रहा है घंटा
उसकी बात को कानों पर से टाल कर
तुम बन जाते हो खुदा
तुम बन जाते हो साहिब
और नाराज हो जाते हो खुदा से
तुम्हारे नाराज होने से कुछ नहीं होता
क्योंकि खुदा है ही नहीं कहीं पर
इस सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम?
 


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