डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

कहानी

सावित्री भाभी की खरीदारी
हरी चरन प्रकाश


मैं जानती थी कि यह कसरत करनी पड़ सकती है। हालाँकि, इसके लिए मुझे कोई अभिनय नहीं करना है। तकलीफ तो है ही मुझे, तन-मन में और पोर-पोर में। बस, उसे चेहरे पर लाना है। मैंने कनखियों से उन्हें देखा। दुपट्टा मुझसे पहना नहीं जाता कि आराम से आँखों पर डाल कर सो भी लूँ और जरूरत पड़ने पर छिपी आँखों से कुछ देख ताक भी लूँ। हाँ, वह सीनियर सिटीजन के कोटे लायक ही दिख रहे थे। सर से पैर तक उन पर बुढ़ापे का जाला लगा हुआ था। नीचे की दोनों बर्थें, इन्हें ही अलाट हुई थीं। इनमें से एक पर मैं लेटी हुई थी, एक बढ़ी हुई नदी की तरह बर्थ के दोनों पाटों को छूती हुई। संयोग से यही ठीक समय भी था। मैंने सिरहाने रखे बैग में से इंसुलिन की सुई निकाली और कुर्ता उठा कर कमर में घोंप ली। वह दोनों चुपचाप सामने की बर्थ पर बैठ गए। मैंने उनसे कहा, ''देखिए, मेरी बर्थ ऊपर की है। आपको जब जरूरत हो तब बताइएगा, खाली कर दूँगी।''

''अरे नहीं, आप लेटिए। छह घंटों की तो बात है, आराम से चले जाएँगे।''

मुझे नींद आ रही थी। मेरी नींद की आवाज दूर तलक जाती है। खर्राटों के ऐसे-ऐसे विरामचिह्न उसमें लगते है कि क्या बताऊँ। मेरे पति ने तो मुझे आज तक नहीं टोका लेकिन आज कल के बच्चे! भगवान बचाए। जब भी कोई आजकल के बच्चे कहता है, अपनी उम्र लगभग सही बता देता है। दो-तीन साल तक तो मैंने उंतालीस पार नहीं किया लेकिन एक दिन मेरी बेटी ने डपट ही लिया ''मम्मी, अब तो उंतालीस पार कर ही लो। मैं सत्रह की होने वाली हूँ, भय्या उन्नीस का है, आखिर कितनी कम उम्र में आपकी शादी हो गई थी। यह तो याद करो कि शादी के समय आप सोशियालजी में 'यम्मे' कर के घर पर बैठी थीं।''

आजकल के बच्चे! मेरे कभी-कभार के उच्चारण-दोष की नकल उतारते उन्हें देर नहीं लगती। मुझे नींद आ गई थी।

गाड़ी अचानक न रुकती तो मैं सोती ही रहती। मेरा भानजा मुझे ''मौसी-मौसी'' कह कर जगा रहा था। आँख खोल कर बंद करते हुए मैंने उसे देखा ताकि वह चुप हो जाए। नींद से धीरे-धीरे जागने का एक अलग ही अंदाज और मजा होता है।

''सुनिए, सुनिए, अरे बेटा, अपनी मौसी को फिर से जगाओ।''

अब मैं जग ही गई। वरिष्ठ महिला मेरी ओर देख रही थीं। मुझे लगा मैं उन्हें 'आंटी जी' कह सकती हूँ। आज कल कौन किसे बख्शता है। मैं पैंतालीस की हूँ या चव्वालीस की क्यों नहीं, लेकिन तीसेक बरस की औरतें आंटी जी कह कर लथेड़ देती हैं। अरे! समय पर शादी और बच्चे न हों तो क्या छटूला बनी रहोगी?

''क्या है,'' मैंने भानजे से पूछा।

''मैं तो बस देखने आया था, इन अंकिल जी ने कहा जगा दो।''

''क्या हुआ, अंकिल जी।''

''मैडम, माफ कीजिएगा, मैंने आपको इंसुलिन लगाते हुए देखा, पर इसके बाद आपने कुछ खाया नहीं... इससे तो बड़ी परेशानी पैदा हो सकती है।''

''हाय राम,'' मेरे मुँह से निकला। इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई। ''अरे बहुत-बहुत धन्यवाद,'' कहते हुए मैंने छटपटाकर बगल में रखे खाने के डिब्बे को देखा। खाने के बाद भी काफी कुछ बचा रहा। मैंने उसे भानजे की ओर बढ़ाया।

''मौसी, मेरा पेट तो भरा हुआ है।''

''अरे, खाओ और खाली डिब्बा फेंको, नहीं तो मेरे सिरहाने पड़ा रहेगा। न खा पाओ तो अगले स्टेशन पर किसी भिखारी को दे देना। भूखे का पेट भरेगा।''

कायदे से इतनी दया-माया काफी थी लेकिन भरपेट खाने के बाद कुछ उच्चाशयी वाक्य भी मेरे भीतर इठला रहे थे। थोड़े संयम के साथ मैंने कहा, ''अन्न का निरादर नहीं करना चाहिए, क्यों आंटी जी?'' आंटी जी ने सिर हिलाया और कुछ रुक कर कहा, ''मैं आपको खुद जगाने वाली थी, लेकिन इतने में यह भय्या आ गया।''

आंटी जी के पास भी मानवता की अच्छी खासी पूँजी थी। चलो, बाकी सफर अच्छा कटेगा। मेरे भानजे को ए.सी. थ्री की एक बोगी में जगह मिली थी। वह वापस अपनी सीट पर चला गया। अंकल जी को डायबिटीज के बारे में अच्छी खासी जानकारी थी जिसे वह सोत्साह शेयर करने लगे।

''बड़ा खराब रोग है, दुश्मन को भी न हो। एक-एक अंग पर हमला करता है।''

मैंने सहमति में सिर हिलाया। मुझसे ज्यादा इस बात को कौन जानता है। एक तरह से मेरे पति की जिंदगी ही डायबिटीज से शुरू हुई थी। भला पैंतीस बरस की उम्र कोई उम्र होती है, डायबिटीज होने की! जिंदगी की नक्शा की बदल जाता है।

''आपके मदर-फादर में से किसी को डायबिटीज रही है?'' अंकल जी पूछ रहे थे।

''हाँ, मम्मी को थी, शायद। लेकिन कोई दवा नहीं करती थीं, बड़े परहेज से रहती थीं।''

''परहेज ही असली चीज है, इसमें।''

''जी हाँ, बस करेले का मुरब्बा ही नहीं बना घर में, बाकी करेले की हर गति होती थी।''

इस बात पर आंटी जी बड़े सलीके के साथ हँसी। उनके दाँत बहुत सुंदर थे। मैं चाहती भी थी कि यह टापिक हँसी-हँसी में ही उड़ जाए। मेरी माँ को कोई डायबिटीज-विटीज नहीं थी। पिता बचपन में ही मर गए थे। पीलिया इतना बिगड़ा कि जान लेकर माना। क्या पता कि उनमें डायबिटीज की संभावना थी या नहीं? उन्हें वक्त ही नहीं मिला।

''लगता है, आप किसी शादी से लौट रहीं हैं?'' आंटी जी ने पूछा।

''जी ऽ, आपको कैसे पता?''

''जिस डिब्बे में आपका खाना था, उस पर वर-वधू का स्टिकर चिपका था।''

''हाँ, मेरी ममेरी बहन की बेटी की शादी थी।'' मेरी अनायास मुस्कान में स्मृतियों की फुलझड़ियाँ थीं। रिश्तेदारी में कहीं भी कोई शादी हो और मैं मौजूद रहूँ तो मेरी शादी की बात जरूर होती है। मेरी शादी एक सुखद दुर्घटना थी।

कलेजे से लगा कर रखने वाले नाना-नानी के साथ मैं ननिहाल में पली। बाद में पढ़ाई के सिलसिले में रिश्तेदारियों की कभी अच्छी तो कभी कम अच्छी चौखटें लाँघती रही। मैंने हाईस्कूल मामा-मामी के साथ रह कर किया, इंटर मौसा-मौसी के साथ, बी.ए. बुआ-फूफा और अंत में एम.ए. विवाहित ममेरी बहन के यहाँ से। कोशिश थी कि मुझे किसी मास्टर को टिका दिया जाए जो कि उचित ही था क्योंकि उस समय मुझे पी.एच.डी. में एनरोल कराने का प्रयास चल रहा था। लेकिन यार जब किस्मत में लिखा हो राजरानी तो मैं क्यों कर भरती पानी। सोच-सोच कर मजा आता है। जहाँ मेरे पति की शादी तय हुई थी, वहाँ नेह निमंत्रण आदि बँट चुके थे... शुरुआती मेहमान आ चुके थे कि विस्फोट हो गया। सौभाग्यकांक्षिणी कन्या ने विवाह के तीन दिन पहले दुस्साहस किया और भाग गई अपने प्रेमी के साथ। अरे गजब किया कस्बे की उस लड़की ने। चिरंजीव और उसके पिता पहले सदमे में आए फिर गुस्से से बिलबिलाने लगे। मैं भी उसी कस्बे में रह रही थी। इतनी बेवकूफ लड़की ढूँढ़नी मुश्किल होगी। अरे! जब माँ-बाप ने मर्द-बर्द्ध का इंतजाम कर दिया तब पगहा तुड़ाकर भागने की क्या जरूरत थी। उन पर दया भी नहीं आई! कभी सुखी नहीं रहेगी, एक सुर में दीदी-जीजा ने घोषित किया।

जीजा जी वहाँ पशुचिकित्सक के पद पर तैनात थे और मिलनसार मनुष्य थे। वही यह ताबड़तोड़ प्रस्ताव लाए थे। अपमान से आहत वर के पिता यह चाहते थे कि उनके बेटे की शादी उसी दिन-तारीख को हो, बस लड़की सजातीय हो। कुंडली-फुंडली की ऐसी-तैसी। मिली तो थी और ऐसी मिली कि लौंडिया ही भाग गई।

मेरी माँ तुरंत ही तैयार हो गईं। पति मुझे देखने आए। देखने क्या आए समझिए नापने आए। यह उनकी खासियत है कि बिना नापे-जोखे वह दीवार की लंबाई-चौड़ाई बता देते हैं। देखते ही उनके चेहरे पर चाह उभरी। मुझे इसी आदमी की औरत होना था। इतनी कमाऊ नौकरी का वर और वह भी मुफ्त में। माँ तो मारे खुशी के रोने लगी और रोते-रोते बोलीं ''सावित्री, तुम्हारे पिता जिंदा होते तो भी ऐसा ब्याह न कर पाते।''

बेशक, बेख्याली में मैं कहने वाली थी कि मुझे जोरदार छींक आई। आंटी जी ने मुँह पर हाथ रखा जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उनका मुँह मेरी छींक की दिशा में था ही नहीं। मैं जानती हूँ कि यह अनायास हुआ होगा क्योंकि मेरी छींक ही ऐसी है कोदंड-भंजक, घोर ध्वनि वाली कि अगला चौंक-चौंक जाए और मु्झे सारी कहते हुए भी शर्म आए। माँ ने ससुराल के लिए मुझे विदा करते समय अन्य तमाम हिदायतों के साथ इस छींक के बारे में खास तौर से चेतावनी दी थी। लेकिन कितने दिन निभ पाता है यह सब। यूँ भी जब मियाँ-बीवी राजी हों तो यह सारी हिदायतें रोजमर्रा का कूड़ा-करकट जैसी हो जाती हैं। इस बीच देह के और भी वेग आयतन बना रहे थे। मैं उठी, पाँच फुट सात इंच की नयनव्यापी काया सहित और जग जीत कर वापस लौटी।

बाद में मेरे पति ने मुझे बताया था कि जब उन्होंने पहली बार मुझे देखा तो खुद को दबा-दबा सा महसूस किया था।

''काहे, धत्'' मैंने स्वयंतुष्ट लाड़ से उन्हें बरजा था।

सच तो यह है कि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है वह मुझसे एक मिलीमीटर लंबे हैं या डेढ़। पहले ही दिन से मैं उनसे भारी दिखती थी और अब भी यही हाल है। मजाक में वह मुझे देसी अखाड़े का पहलवान कहते हैं जबकि मैं कोई खास मोटी नहीं हूँ और लदर-पदर तो बिल्कुल ही नहीं हूँ। ''भरीपूरी रसभरी हूँ यार, मजाक न उड़ाओ'' कहते समय मुझे बिल्कुल शर्म नहीं आती थी। काहे की शर्म, हम एक दूसरे के ओढऩा-बिछौना थे।

आंटी जी और अंकल जी बर्थ पर एक दूसरे पर कुछ लदे-फंदे से बैठे हुए थे। चाहते तो अलग-अलग कायदे से बैठ सकते थे लेकिन अंकल जी लुढ़के जा रहे थे और आंटी जी उन्हें कुहनिया कर किनारे कर रहीं थीं। थोड़ी देर बाद अंकल जी उठे, अपनी देह का समस्त भार उठाते हुए और उसी तरह से चलते हुए। उनके लौटते ही आंटी जी ने उन्हें ठुड्डी उचका कर देखा।

''साफ है'' अंकल जी बोले। ख्वामख्वाह मैंने भी हाँ में सर हिलाया। आंटी जी आँखें नीची करके चप्पल ढूँढ़ने लगीं। एक चप्पल तीरघाट तो दूसरी मीरघाट। चलती ट्रेन में चप्पलें जैसे जीवधारी हो जाती हैं।

''मेरी पहन लीजिए'' मैंने कहा।

''नहीं, नहीं, मिल गई'' अंकल जी ने चप्पल ढूँढ़ ली।

यार, चप्पल कितनी छोटी बात है लेकिन इस पर भी पति का प्रसंग पैदा हो जाए तो कोई क्या करे? कहीं कोई शादी-ब्याह, जनमदिन-सनमदिन या ऐसे ही किसी फंक्शन में जाना हो तो मेरे लिए मैचिंग 'पांय उपानह' (ई सुदमवा कहाँ से टपक पड़ा बीच बात में) का चयन वही करते हैं। घरेलू स्लीपरों को छोड़ दें तो कोई पच्चीस जोड़ा सैंडिल-चप्पल तो होंगे ही मेरे पास। (बोलने में हिंदी अंक ही सुहाते हैं। कितने दिन हो गए हिंदी में संख्या लिखे हुए, भूल ही गई हूँ फिर भी उस समय बहुत अच्छा लगता है जब बेटा-बेटी पूछते हैं पच्चीस मीन्स?)

बड़ा शौक है मुझे बेटे को विदेश में पढ़ाने का। अब तो और आसान हो गया है कि झोला भर नोट गिनो और एम.बी.ए. करने न्यूजीलैंड या आस्ट्रेलिया भेज दो। बोरा भर गिनों तो बेटी का ब्याह किसी उच्च केंद्रीय सेवारोही के साथ कर दो। पति भी अच्छी नौकरी में हैं, पैसा है, मेल-मुलाकात है लेकिन वह हनक कहाँ जो अशोक की लाट में होती है।

चलो बजा तो यह मुर्दा मोबाइल। सबेरे से नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। बेटे का फोन है। बहुत फोन करता है, मुझे। घर में कुत्ता पालना चाहता है और मेरा जरा भी मन नहीं है। बड़ा दरद होता है कुत्ते के मरने पर। जब बच्चे छोटे थे तब मैंने भी पाला था। मैं बच्चों को डाँटूँ तो वह मेरे ऊपर भौंकने लगता था। दस साल हमारे साथ रहा और फिर नहीं रहा। इस बार अगर पालना पड़ा तो लंबी उमर की नसल का ही पालूँगी। जीजा जी ने रिटायर होने के बाद कुत्तों की क्लीनिक खोल ली है। उन्होंने ही बताया कि छोटी, ब्रीड का पालो, लंबी उमर होती है।

अंकल जी के पास एक छोटा बैग था जिसमें वह कुछ ढूँढ़ रहे थे। उनकी उँगलियाँ गच्चा खा रही थीं। आजिज आकर उन्होंने कहा ''मैंने चश्मा कहाँ रखा?''

''बिना मेरे ढूँढ़े, मिलेगा?'' आंटी जी उठीं और अंकल जी की पुश्त से ढके चश्मे को निकाल लाईं।

''अभी तो टूट ही जाता। मैं कितने दिन से कह रही हूँ कि फ्रेम बदलवा लो। पता नहीं कितना महीन रंग है कि दिखता ही नहीं।''

अंकल जी कुछ नहीं बोले; चश्मा लगाते ही कामयाब जो हो गए। उनके हाथ में गैसहरण बटी की शीशी थी। एक टिकिया खुद खाई और एक आंटी जी को खिलाई। आंटी जी ने मुझसे पूछा ''लीजिएगा।''

''लाइए, मुझे बहुत अच्छी लगती है।'' मैं आयुर्वेद की गैसहरण बटिया जायके के लिए खाती थी। जहाँ तक गैस की बात है वह मेरे साथ अमर्यादित व्यवहार नहीं करती है।

मैंने खिड़कियों पर पर्दा चढ़ा दिया। दिन में अँधेरे की प्रतीति कभी कभी अच्छी लगती है; रफ्तार में दौड़ती हुई ट्रेन आराम से चलती हुई लगती है। मैं थोड़ी ही देर नींद की ऊभ-चूभ से गुजर पाई कि ट्रेन के रुकने का अहसास हुआ।

''क्या हुआ,'' लगभग बंद आँखों को मैं रेख भर भी खोलना नहीं चाहती थी। या तो मेरा यह सवाल खुल नहीं पाया या अंकल-आंटी को बुरा लगा कि लेटे-लेटे मैं उनसे उत्तर की अपेक्षा कर रही हूँ। उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया। लिहाजा अधलेटे होकर मैंने पर्दा खींचा - ट्रेन एक वीराने में रुकी हुई थी।

''यह तो पता नहीं कहाँ रुकी हुई है'' मैंने पहल की। इस पर अंकल जी उठे और थोड़ी देर में टहल-टुहल कर लौट आए।

''कुछ पता नहीं चल रहा है। कोच कंडक्टर भी नहीं दिख रहा है, न और कोई रेलवे का आदमी।''

''आप नीचे तो नहीं उतरे थे?'' आंटी ने पूछा।

''अरे, नहीं भाई। बस आगे के कनेक्टेड डिब्बे से लौट आया।''

उतनी ही देर में मेरा भानजा आ गया। वह कुछ 'ब्रेकिंग न्यूज' के अंदाज में था, वही एक जैसा उत्साह, चाहे बरही हो या तेरही।

''एक आदमी कट कर मर गया।''

''आँय''

''कैसे?'' कहते हुए आंटी जी ने अंकल जी का हाथ पकड़ लिया।

''अरे, मेरे ही कोच के बगल में तो पैंट्री कार है, उसी में काम करता था। लोग बता रहे थे कि फोन आने के बाद निकलकर वह डोर पर खड़ा हो जाता था। पता नहीं उसके मोबाइल का रिसेप्शन खराब था या और कोई वजह थी।''

''आगे बताओ न।'' एकदम से आंटी जी बोलीं।

''बस वह डोर के आगे सर निकाले या कि लाइन से लगे पोल की टक्कर में आ गया। बाडी का हाल तो बताने लायक नहीं।''

''हे भगवान'' हम सबके मुँह से निकला।

थोड़ी देर की खामोशी के बाद आंटी जी बोलीं, ''देखो अब गाड़ी कितनी देर तक खड़ी रहती है।''

इस पर मेरा भानजा उठा जैसे यह पता करना उसका काम हो। उसकी पीठ देखते ही मुझसे रहा नहीं गया और लगभग शिकायत सी करते हुए मैंने कहा, ''तुमसे यह सब कैसे देखा गया।''

वह कुछ समझ नहीं पाया और चला गया। असल में इस बात का सिरा कहीं और था, मेरे ही तन-मन पर साँप की तरह रेंगता हुआ। गहरी प्रतिहिंसा की ऊर्जा से भरते हुए मैं सीधी बैठ गई। मैं सिर्फ एक दुर्घटना चाहती हूँ। ऐसे ही कहीं कट कर क्यों नहीं मर जाता, वह घुसपैठिया।

पति की बीमारी के वह शुरुआती दिन थे। हमारे यहाँ सोना बरस रहा था। यह वह समय था जब हम लोगों ने टेलर मास्टर के यहाँ जाना छोड़ कर ब्रांडेड कपड़े पहनने शुरू कर दिए थे। जो चीज जितनी महँगी होती उतनी ही हमें अच्छी लगती। पैसे का जोबन किसे कहते हैं, आपको क्या पता अंकल जी, आंटी जी। यह दस हजार निन्नानबे की सलवार-कुर्ती पहने आपके सामने कितनी लापरवाही से लेटी-बैठी रही हूँ। यह न समझिए कि मैं आपकी हैसियत नहीं समझ पा रही हूँ। अरे भाई, जिस हवाई जहाज में हम उड़ते हैं उसी में दुबई जाने वाला मजदूर भी उड़ता है। तो हम लोग बराबर तो नहीं हुए, ना। इस बात का बुरा न मानिएगा। आपको भी पता है कि हमारा समाज अगले की हैसियत नापे बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ता है।

हाय, मैं यह क्यों भूलती रहती हूँ कि इस पैसे ने हमें बहुत धोखा भी दिया। उन दिनों पति की शुगर बढ़ी हुई थी। डाक्टर हमारे पारिवारिक मित्र थे। दवा के साथ खाने-पीने की डोज भी निर्धारित कर चुके थे। टहलने की सलाह के साथ एक बार यह भी बोले की नौकरी में कोई हल्का असाइनमेंट ले लें, काम और तनाव दोनों कम होने चाहिए, लेकिन किसे इस पर अमल करना था। पति दरबार करते भी थे और दरबार में जाते भी थे। हमारे यहाँ हमेशा काम के और बेकाम के पंद्रह-बीस आदमियों का खाना बनता था। शहर के किनारे मेरे नाम पर एक फार्महाउस खरीद लिया गया था जहाँ हम ठाठ से रहते थे, जहाँ फूलों की खेती होती थी और सिर्फ हमारी जरूरत भर का आर्गेनिक अन्न उपजाया जाता था। इसके अलावा मेरे नाम पर बुटीक के व्यवसाय की सजावटी खिड़की भी खुली थी जिसके जरिए पति की भारी आय को खपा कर कुछ आयकर दिया जाता था। इस सबके बीच हम भूल ही गए कि किडनी खराब होने पर उसकी कोई दवा नहीं होती है। डायलिसिस की नौबत आने पर हम जागे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सोना अब भी बरस रहा था लेकिन उसका रंग फीका पड़ चुका था।

''आयम सारी'' कातर होकर उन्होंने कहा था।

मेरा कलेजा मुँह को आ गया। मैं इस निराले आदमी को बचाऊँगी, कैसे भी। खबरदार, अगर किसी ने यह सोचा कि मैं एक सोने की चिड़िया को मरने से बचाने की खातिर यह सब कह रही हूँ। किससे यह बात बताऊँ कि जब इसका पौरुष असफल होने लगा तो किस तरह इसका पतित्व सक्रिय हुआ। विदेश से वह मेरे लिए सेक्स ट्वायज लाया। इस भेंट को पाते ही मेरी आँखों में आँसू छलक उठे, फिर पता नहीं कहाँ का गुस्सा ज्वालामुखी की भाँति प्रकट हुआ। मैंने वह खिलौने फेंक दिए।

''क्या समझ रखा है, तुमने मुझे! यह ऐसी कौन सी नेमत है जिसके बिना में रह नहीं सकती। नसीब ने बहुत कुछ दिया, एक चीज नहीं सही।''

आदमी सर झुकाए सुनता रहा और कृतज्ञ होकर उसने मुझे गले लगा लिया। वह सिसक रहा था और सिसकते हुए ही मैंने कहा, ''काहे ले आए, ये सब? क्या मेरे ऊपर विश्वास नहीं है?''

पति के चेहरे पर एक छाया आई और गई। हे भगवान, पुरुष होने का भी क्या दुख है। सच में, मर्द जब बूढ़ा होता होगा तो कितना गल जाता होगा। आंटी जी, अगर उस समय आप मेरे पतिव्रत्य का तेज और स्त्री की ममता एक साथ देखतीं, तो देखती ही रह जातीं। लेकिन इसका बदला क्या मिला। जी चाहता है कि उस लुटेरे की हत्या करा दूँ। ऐसा नहीं है कि हम इस तरह के लोगों को नहीं जानते।

दरअसल हम तरह-तरह के लोगों को जानते हैं, हमें तमाम तरह के चंदे देने पड़ते हैं; राजनीतिक चंदे, धार्मिक चंदे, सांस्कृतिक चंदे और कुछ आपराधिक चंदे। कभी-कभी तो एक ही चंदे में सारे चंदे समा जाते हैं। अकेले इतनी कमाई कहाँ पच सकती है। मैंने यह सारा काम सम्हाल लिया था। मुझे पता था कि पति के महकमे में कौन कहाँ पोस्टेड था और कितनी चाँदी चीर रहा है।

मोबाइल बजा। उन्हीं का फोन था।

''खाना खा लिया।''

''हाँ''

''सही-सही खाया''

''ना''

''क्यों'' मेरे चेहरे पर प्यार-परवाह झलका।

''तुम्हारे हिस्से का भी खाना था।''

धत्तेरे की यह आदमी! यह मुझे मार ही डालेगा। जब से इनका परहेज शुरू हुआ तब से मेरी बदपरहेजी के दिन आए। इन्हें कितनी ही चीजें खाने की पसंद थीं जिन्हें याद कर-कर के बनवाते थे। देखिए हम लोग पिज्जा-बर्गर वाले जीव नहीं हैं और न ही जरूरत से ज्यादा होटलबाजी करते हैं। घर ही में एक से एक चीजें बनाकर खाने का शौक है। लेकिन वह दिन तो आना ही था जब खाना भी नाप जोख कर खाना था। इसके बाद से इन्हें पता नहीं क्या सनक सवार हुई कि यह चीजें बनवाते और खुद न खाकर मुझे खिलाते।

''तुम खाती हो तो मैं पा लेता हूँ'' अजब बेचारगी से ये कहते। ''अच्छा! मैं कोई पंडित-पंडा हूँ कि मेरे जरिए पितरों की तरह तुम पा लेते हो'' हाय यह मैं क्या कह गई। हे देवी माँ रक्षा करो। हमारे घर में पंडितों का बड़ा आवागमन था। तमाम तरह के जप-पूजा, अनुष्ठान चला करते थे। जहाँ पहले अच्छी पोस्टिंग के लिए यह सब काम छोटे पैमाने पर होते थे वहाँ अब बृहत्काय पूजा-अर्चना इनके स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हो रही थी। आखिर कोई करे तो क्या करे। आप बताइए, जो आदमी मांस-मदिरा छुए नहीं, पराई औरतों के चक्कर में रहे नहीं, सिगरेट-पान-तंबाकू से कोसों दूर रहे, ऐसे आदमी को ऐसा सांघातिक रोग क्यों हो। पैसा कमाने को छोड़ कर इन्हें कोई नशा नहीं रहा और कौन यह नशा नहीं करना चाहता? तो ग्रहों की टेढ़ी चाल के सिवा इस मुसीबत का और क्या कारण हो सकता है? तो देवी-देवता और साधू-संत के अलावा रास्ता क्या बचता है?

मैं कुछ ज्यादा बोल गई क्या? अंकल जी, आंटी जी, आप यह सब सुन तो रहे नहीं हैं। मन ही मन कह रही हूँ। लेकिन मन ही मन कहने के लिए भी आमने-सामने मुझे कोई चाहिए। विकट सामाजिक प्राणी हूँ, मैं। अरे, ऐसे ही नहीं पूरे विभाग में हम दोनों की धाक है। हम लोग पोस्टिंग की फंडिंग का काम भी करते हैं। आप तो जानते हैं कि मलाईदार छोटे पदों पर भी पोस्टिंग के लिए बुकिंग करनी पड़ती है। अगर किसी कारणवश किसी कर्मचारी के पास पैसों की कमी हो गई तो हम उसे ब्याजमुक्त उधार दे देते थे। यह सब लोग मुझे सावित्री भाभी कहते थे। पति कहते थे ''तुम तो पूरी डान हो, सावित्री भाभी।''

क्या कहूँ किसी की बड़ी काली नजर लग गई। ज्योतिषियों ने बताया मारकेश लगा है, डाक्टरों ने बताया गुर्दा बेकार हो गया है। मेरे लिए तो दोनों एक ही बात हैं। जब तक डायलिसिस से काम चल रहा है, चलाते हैं। ट्रांसप्लांट तो एक दिन कराना ही होगा। क्या कहूँ, इस हाल में भी यह आदमी सूखी-सादी पोस्टिंग के लिए मुश्किल से तैयार हुआ। घेर-घार कर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्ट्रेशन कराया। लगे हाथों बता दूँ कि मैंने अपनी एक किडनी आफर की थी, लेकिन मैच ही नहीं हुई। उसी समय पता लगा कि मुझे भी शुगर है। यार, पति-पत्नी के बीच इतनी मिठास भी ठीक नहीं।

कितने कठिन दिन थे, वे। रजिस्ट्रेशन क्रमांक पर चढ़ते हुए डरे-मरे लोग किसी लावारिस मृत्यु या किसी देहदानी मृत्यु की प्रतीक्षा में कीड़ों की तरह बिलबिला रहे थे कि कब-कैसे किसी का गुर्दा-कलेजा मिल जाए। बहुत जल्दी ही अस्पताल के एक टेक्नीशियन ने भाँप लिया कि इस पेशेंट में कतार तोड़ने की मंशा और हैसियत है। पहले उसने सहानुभूतिपूर्वक टोह ली और फिर इशारों-इशारों में बताया कि भगवान उसकी मदद करता है जो अपनी मदद आप करता है। गुर्दे के बाजार में घुसना बड़े दिल-जिगर का काम है। उसने एक फ्लैट रेट बताया जिसमें सारे खर्चे शामिल थे, गुर्दे का इंतजाम, अभिलेखों का निर्माण, अस्पताल और डाक्टर, थाना-तहसील आदि। जैसे कचहरी में मुल्जिम होता है वैसे ही अस्पताल में पेशेंट होता है। तो भी इतनी बड़ी रकम हम यूँ ही दाँव पर नहीं लगा सकते थे। हमने दो-चार स्रोतों से पता किया तो पता चला कि हमारे इलाज के ठेकेदार के पास जितनी जायदाद है वह मानव अंगों के बाजार में साख कमाए बिना खड़ी नहीं की जा सकती है। हममें आशा का संचार हुआ।

कनखियों से मैं देख रही थी कि आंटी जी, अंकल जी का हाथ पकड़ कर किनारे कर रही थीं और मेरी आँख बचा कर उन्हें घूर रही थीं। अरे यार, खुजलाने दो, फ्री होकर। मेरे हसबैंड तो इसे लेकर मजाक भी करते थे कि अब खुजलाने के सिवा बचा भी क्या है। आपरेशन से पहले वह बहुत सा बचा-खुचा काम पूरा कर लेना चाहते थे। जगह-जगह फैली हमारी जायदाद को बच्चों के नाम दर्ज करवाना था। मैं बीच-बीच में मना करती थी कि ऐसे इंतजाम न करो जैसे कि लौट कर ही न आना हो, बड़ा असगुन होता है।

''अच्छा चलो, छत पर स्विमिंग पूल लौट कर बनवाऊँगा'' कुछ बेपरवाही के साथ उन्होंने कहा। कहाँ मिलेगा ऐसा पति-पुरुष, मैंने उस समय पूरी तरह सोचा, आज भी अधूरे से अधिक ऐसा ही सोचती हूँ। अभी अभी फोन आया था कि वह स्टेशन लेने आएँगे।

''क्यों भाई, काहे इतना परेशान होते हैं। अरे ड्राइवर गाड़ी लेकर आ जाएगा, काफी है'' कहते समय मेरे चेहरे पर अनुराग की मद्धम पड़ती हुई चमक थी और स्वर में गंभीर होते हुए इनकार की मनुहार थी। आंटी जी मुस्करा रही थीं। इतना प्यार-परवाह पा कर क्या करूँगी जब मन में गड़ी फाँस निकल ही न रही हो। यह अकारण नहीं था कि मौत के मुँह से इन्हें छीनने के बाद मैंने स्विमिंग पूल बनवाने से मना कर दिया था।

हमसे कहा गया था कि हम फलाँ नगर के फलाँ नरसिंग होम में पहुँचें, वहीं हमारा असामी मिलेगा। वहीं मैंने उसे पहली बार देखा। किसी आहट की साँवली परछाईं से अकुलाया हुआ तन-बदन। वह हमें उसी तरह देख रहा था जैसे कोई बलिपशु मनुष्य को देखता है। हमारी भी आँखें बदल गई थीं। मुझे नहीं पता कि मैं कब और क्यों मुस्कुराई। पति की आँखें उतनी ही कातर थीं जितनी इस पैंतीस-छत्तीस बरस के अनजान आदमी की। कुछ इनसानी माहौल पैदा करने की बेतरह जरूरत थी इसलिए हमने वह सब बातें कीं जो शपथपत्रों और अभिलेखों में दर्ज थीं।

''तो, सलीम नाम है, तुम्हारा।''

''हूँ...''

''और कौन आया है तुम्हारे साथ?''

वह कुछ नहीं बोला। साथ आए दलाल ने बताया कि इसके पिता और पत्नी भी होटल में रुके हुए हैं। हे भगवान, कैसे तो पिता और कैसी तो पत्नी।

मैंने पूछा, ''कहाँ के रहने वाले हो?''

उसने जवाब दिया, ''पहले बंगाल के और अब यू.पी. के।''

अब मैं यूँ मुस्कराई जैसे कोई राज फाश हो गया हो और मेहरबान होकर बोली ''तो बंग्लादेशी हो?''

इस पर साथ आया दलाल लपक कर बोला, ''अरे भाभी जी, सब बंगलादेश से नहीं आए हैं, कुछ बंगाल और आसाम से भी आते हैं। जैसे रोजगार की तलाश में बंबई गए लोगों को भय्या या बिहारी कह दिया जाता है वैसे ही इन्हें बंग्लादेशी कह देते हैं। यह थोड़ा सा घटा दो तो पूरी तरह से भारतीय नागरिक हैं, राशनकार्ड-वोटरलिस्ट, सब फिट हैं। भारतीय नागरिक हुए बिना न इनका काम चलेगा और न हमारा-आपका।''

धीरे-धीरे मुझे लगा कि इन धुँधली नागरिकता वाले लोगों को तो अक्सर देखते हैं। नगरीय सेवकाई के बहुत सारे काम अब यह घुसपैठिए करते थे। बड़े शहरों में झुग्गी झोपड़ियों के यह नए निवासी हमारी निरीहतम परजा थे। मैंने उसी समय नेकदिली से यह फैसला किया कि ट्रांसप्लांट-पैकेज में इसके हिस्से जो भी रकम आए मैं अपनी ओर से इसे ऐसी टिप दूँगी कि जिंदगी भर याद रखेगा।

जब जैसे कुछ भी पूछने की पति की बारी थी। उन्होंने पूछा, ''क्या करते हो, भाई।'' इस पर वह हल्का सा मुस्काया। अब जब उस मुस्कान को याद करते हैं तो लगता है कि उससे उपहास और उलाहने के साथ साथ घृणा भी फूट रही थी। इसी मुस्कान के साथ वह हमसे पूरी नजर से मुखातिब हुआ और बोला, ''घरेलू काम''।

यह जवाब तुरंत समझ में आ गया। प्रारूपों, शपथपत्रों और अनेक जाँच प्रक्रियाओं से होकर गुजरी विधिसम्मत कहानी इसी घरेलू काम के नाभिकीय केंद्र से उगी थी। इस काम के कानून में निकट नातेदार और मृतक दानकर्ताओं के अलावा अन्य लोग भी भावनात्मक कारणवश अंगदान कर सकते हैं। तो कहानी यह बनी कि सलीम आज से पंद्रह बरस पहले हमारे घर में घरेलू काम करता था और लगभग दस बरस ससुराल के बुलावे पर आसाम चला गया था। फिर अभी वह साल भर पहले लौटा तो साहब की दशा देख कर रोने लगा। उसने कहा कि वह ऐसे अच्छे मालिक के लिए अपनी जान भी दे सकता है। बेशक, इसके बाद सक्षम स्तरों पर यह जाँच हुई कि वह अपना एक गुर्दा बिना किसी दबाव या लालच के दे रहा है।

''मैं जा रहा हूँ।'' सलीम ने कहा।

''कहाँ?'' हम लोग चौंके।

''अपने कमरे में।"

''ओह...'' हमारी तरह सलीम को आपरेशन से पहले की जाँचों के लिए इसी अस्पताल में रहना होगा। डोनर की देखभाल और इज्जत में कोई कमी नहीं है। बाप और बीवी होटल में और खुद होटल जैसे अस्पताल में। लेकिन यह भी एक मजबूरी है। आपरेशन के बाद डोनर की सेवा-सुश्रुषा और बकाया पैसों की वसूली के लिए घरवालों की जरूरत तो पड़ती ही है।

मैं जग रही थी और ट्रेन के रुकने की गति सुन रही थी; इस हचर-पचर की एक अलग ध्वन्यात्मकता है। पाँच मिनट का स्टापेज था, लेकिन आधा घंटा लगा। मेरा भानजा फिर उसी उत्साह के साथ आया और बोला, ''जी.आर.पी. में ऐक्सीडेंट की लिखा पढ़ी हो रही है। मरने वाला असमिया मुसलमान था।''

''तुम्हें कैसे पता?''

''अरे, उसकी जेब की तलाशी में आर.पी.एफ. वालों को वोटर आई.डी. मिली थी। जेब बच गई थी।''

''बंग्लादेशी होगा...'' जैसे कोई देर से दबी साँस छोड़े, वैसे ही मैंने कहा।

''सही कहा, आपने।'' आंटी जी ने समर्थन किया।

खैर ट्रेन खिसकी और बहुत जल्द ही धड़धड़ा कर चलने लगी। लगता है कि यह स्पीड पिछले आधे घंटे के ठहराव और ऊब को फिलहाल कम नहीं कर पा रही थी। आंटी जी दोनों पंजे सर के पीछे ले जाकर स्पांडुलाइटस की लोकप्रिय फिजिकल थेरपी करने लगीं। पता नहीं क्यों बूढ़ी औरतें स्लीवलेस ब्लाउज पहनती हैं। कितनी असावधानियाँ अनदेखी रह जाती हैं। उस रात तो मेरे पूरे शरीर में भद्दी वनस्पतियाँ उग आई थीं।

ट्रांसप्लांट-आपरेशन के एक दिन पहले की रात थी। मैं तब तक पति के कमरे में रही जब तक नर्स ने उन्हें नींद का इंजेक्शन नहीं दे दिया। मैं अपने कमरे में बेचैन करवटें बदल रही थी कि दरवाजे पर ठक ठक हुई। सुना सुनाया एक डर मन में कौंधा। मैंने सुना था कि कभी-कभी यह डोनर भी डर जाते हैं या आखिरी मौके पर कुछ और पैसा माँगने लगते हैं। अपने अनुमानों को किनारे लगाते हुए मैंने इत्मीनान भरी मुस्कान के साथ पूछा ''क्या हुआ?'' और धड़कते दिल के साथ कमरे के भीतर आ गई। देखें क्या बात है। जैसे किसी बुत के भीतर से आवाज आई ऐसे ही वह बोला ''मुझे यहाँ लेटना है।''

एक पल के लिए मुझे चक्कर सा आ गया। क्या मैंने जो सुना उसे समझा नहीं। मेरे मुँह से निकला हुआ ''क्या'' कमरे में तितर-बितर हो गया। वह मेरी समझदारी का इंतजार करने लगा।

''देखो, तुम्हारे घर में भी माँ बहन होंगी'' तड़प कर हजारों बरस पुरानी दलील का सहारा लिया।

''हैं, लेकिन किसने उन्हें छोड़ा'' उसकी सर्द आवाज मनों मिट्टी के नीचे दबी हुई थी। तब तक मैं समझ गई थी कि जमीन से खर पतवार की तरह उखाड़े गए लोगों से रिश्तों की दुहाई नहीं दी जा सकती है। मैंने अब कमर कस कर उसका मुकाबला करने की ठानी।

''देखो, दस हजार ले लो और चुपचाप अपने कमरे में जाओ।'' ईश्वर जानता है कि इतनी ही टिप देने की बात मैंने पहले सोची थी।

''यह दस हजार मैंने आपको वापस दिए।'' वह बेड पर आकर बैठ गया। लोग इतनी सफेद चादर क्यों बिछाते हैं, बड़े अजीब तरीके से मेरे मन में आया।

''पंद्रह हजार।'' मैंने खड़े-खड़े ही बोली बढ़ाई।

''वापस किया।''

पैसों के इस वाद-प्रतिवाद में मैं रकम जैसे-जैसे बढ़ाती रही वह वैसे ही वैसे उसे वापस करता रहा। यह पागल मुझे भी पागल बना रहा है। मुझे होश नहीं, शायद मैं आपरेशन पर खर्च होने वाली रकम तक पहुँच चुकी थी कि मैंने कहा, ''अब बस''।

इस बार उसने कोई जवाब नहीं दिया। मुझे तय करना था कि पति को गुर्दा दिलाना है या इस दस्यु को दुत्कार कर भगाना है। अरे यार, यह कैसा मारक विकल्प है यह सिरफिरा साढ़े तीन पग से पृथ्वी नापना चाहता है। हे भगवान, अरे ओ शैतान, हैसियतों की उस सार्वभौम समझ का क्या हुआ जिसके सहारे समाज चलता है। यह नीच जो रुपयों के लिए अपनी किडनी बेच सकता है वह उतने ही रुपये पाकर मुझे क्यों नहीं छोड़ रहा है। मन ही मन इतनी चीख-पुकार के बाद मैं बैड पर आकर बैठ गई।

नाइट बल्ब की रोशनी में, अनावृत्त मैं। यह उसकी जिद थी। जैसे छेनी से चोट-दर-चोट पत्थर छीलते हुए मूर्ति गढ़ी जाती है, ठीक उसका उल्टा करते हुए, अंग प्रत्यंगवार प्रहार करता हुआ वह मूर्तिभंजक मुझे पत्थर बना रहा था। तब से अब तक वह मेरे भीतर शिलीभूत है।

प्रत्यारोपण के लिए ले जाते समय पति गुमसुम थे जबकि कुछ देर पहले तक बिना बात की बात कर रहे थे। उनके बालों में उँगलियों से कंघी करती हुई मैं बोली ''अरे यार, कुछ नहीं होगा। मेरे सामने बस हँसते बोलते रहो।''

''हूँ'' एक कमजोर मुस्कान, दहशत से दबी हुई हल्की सी हँसी।

''हूँ, लेकिन थोड़ा खुलकर'' मैंने निश्शंक मुस्कराहट का अभिनय किया।

जवाब में मिली मुर्झाई हुई मुस्कान के साथ अब और क्या जिद करना। ''रहने दो'' मैंने कहा।

''सावित्री, मुझे कुछ कहना है।''

''बोलो...''

''सावित्री, मैंने यह देखा है कि इस हवसनाक दुनिया में भी कोई माँ या बाप अपने बेटे से यह कहता हुआ पाया जाता है कि भय्या गलत-सलत कमाई न करो। कोई-कोई भाई या दोस्त भी ऐसा कह देता है। लेकिन आज तक कोई पत्नी मैंने ऐसी नहीं देखी जो पति से यह कहे कि नहीं चाहिए ऐसा पैसा।''

मैं सन्न रह गई। अरे यह वार! पता नहीं कभी तुम्हें बता भी पाऊँगी कि नहीं कि पिछली रात मैंने यमराज से क्या डील की? उफ्फोह! गाड़ी कितनी धीमी हो गई है। स्टेशन आने ही वाला है। पूछना ही भूल गई कि दवाएँ खाना तो नहीं भूल गए। उस अजनबी गुर्दे को शरीर का सहज अंग बनाने के लिए अभी कितनी ही इम्यूनोसप्रेसेंट गोलियाँ खानी हैं। इतनी आसानी से मेरा-तुम्हारा उससे पीछा नहीं छूटने वाला है। यह खरीदारी सस्ती नहीं है, दोस्त। गाड़ी स्टेशन पर लग गई थी।

अंकल जी और आंटी जी खुद को और अपने सामान को बटोर रहे थे। मैंने उन्हें जाते हुए देखा। उनकी चाल ऐसी थी जैसे कोई गाढ़े अँधेरे पानी में जमीन की टोह लेते हुए चले। घरेलू सुख दुख के बढ़ाए-चढ़ाए बखान वाले इस संसार में मुझे भी कुछ दिन इन्हीं कदमों से चलना है। मेरे बच्चे अभी सेटल नहीं हुए हैं। प्लेटफार्म पर तुम्हें देख रही हूँ। जानती हूँ कि हम दोनों जरा जरा मुस्कराएँगे, जिंदगी का कारोबार चलाने की आदत जो पड़ गई है।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में हरी चरन प्रकाश की रचनाएँ