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कविता

अक्स
भारती सिंह


उदास शाम की तरह
मन चला जा रहा है
एक सुनसान सी
गीली पगडंडियों पर
पैरों को पत्तों की नमी
देती है तुम्हारे छुअन का अहसास
मन बावरा-सा गाता
बढ़ता जा रहा है
कलकल झरनों की तरह
तलाशता है खुद को
उसके नीले जल मे
मन भी जंगल हुआ जाता है
कदम चले जा रहे है
एक गहरे नीले जंगल की ओर
तुमने कह रखा था
मिलेंगे एक रोज
तलाशती रहती हूँ मैं यहाँ
तुम्हारी ही आवाज को
पेड़ों की पत्तियों पर
लटकी नन्हीं बूँदों मे
हवाओं की सरसराहट मे
रंग और मासूमियत से भरे नन्हें फूलों मे
कहीं गुम है यहाँ तुम्हारी आवाज
घुलमिल जाती है इस जंगल मे
घुलीमिली आवाजों के बीच
तुम्हारी ही आवाज
क्योंकि तुमने कह रखा था
मिलेंगे एक रोज
जब फलक से चाँद उतरता है
और आसमान का सूरज
समंदर के सीने मे
अपना अक्स छिपाता है...
 


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