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कविता

बहता पानी
तियांहे

अनुवाद - साधना अग्रवाल


जियांगनान में पानी है बहुत
और यह शहर है पानी का
यह लाखों साल पहले भी
और लाखों साल बाद भी
बहता है एक ही दिशा की ओर
यह पानी, पहाड़ों से, घाटियों से,
उस साल बादलों, झरनों और सोतों से,
गया मैं देखने जड़ी-बूटियों को पहाड़ों में
अपने छोटे काले कुत्ते के साथ
वहाँ, मैं पीछा कर रहा था एक क्रीक का
यह नीचे ढलानों पर फैल गया
यह लोगों के बीच बहता हुआ
गाँव के सूखे तालाबों पर
फिर बीन के खेतों से होता हुआ
अचानक, एक खाद्य तेल का कोना बन गया
और फिर एक उर्वर खेत और पगडंडियों के रास्ते,
मुझे एक जंगली फूल मिल गया
और शरद ऋतु में लबालब
एक अथाह नदी का
बैरल या टैंक द्वारा कुछ पानी निकाला गया है
कुछ किसान खेतों की सिंचार्ई के लिए पानी ले रहे हैं,
लेकिन पानी, अभी भी लगातार धीरे-धीरे बह रहा है
वे यात्रा कर रहे हैं, जैसे घर लौट रहे हैं।
 


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