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विमर्श

भाषा का स्वभाव
कृष्णमोहन


वाक्य में क्रिया की केंद्रीय भूमिका की नासमझी और उसके प्रति हमारी लापरवाही को एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। "पीना" हमारी भाषा की सबसे सहज क्रियाओं में से एक है। हम चाय या शरबत "पीते" हैं, लेकिन अँग्रेजी के सामने अपनी हीन भावना के चलते हमने अब उन्हें "लेना" शुरू कर दिया है। "टु टेक ए कप ऑफ टी" की तर्ज पर हम अब चाय या कॉफी "लेते" हैं, "पीते" नहीं। "आप चाय लेंगे या कॉफी" जैसे वाक्यांश अब आम तौर पर सुनने में आ जाते हैं। इसी क्रम में अब "ठंडा" या "गरम" लेने की बारी भी आ चुकी है। "पीना" की जगह "लेना" का प्रयोग कितना भ्रामक है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे परिवार का कोई सदस्य बाजार से चाय पीकर चला आए तो हम उससे यह नहीं कह सकते कि "बाजार से चाय लेकर आओ"। ऐसा कहने पर वह बाजार से चाय खरीदकर तो ला सकता है, लेकिन पीकर नहीं आ सकता। यानि "पीना" क्रिया को अपदस्थ करने में अँग्रेजी अभी पूरी तरह से कामयाब नहीं हुई है। अभी इस प्रदूषण को पहचान कर इसे दूर किया जा सकता है।

यहाँ किसी "उदारतावादी" विद्वान को शुद्धतावाद का खतरा दिखाई पड़ सकता है और वह "भाखा बहता नीर" जैसी किसी उक्ति की आड़ में छुपने की कोशिश कर सकता है। इस संबंध में फिलहाल इतना ही कहना पर्याप्त है कि जैसे बहते हुए पानी में दूसरे स्रोतों का पानी भी आकर मिलता है तो उसका प्रवाह बढ़ता है, उसी प्रकार दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर कोई भी भाषा समृद्ध होती है, लेकिन जब किसी भाषा पर उसके स्वभाव के विपरीत दूसरी भाषा की वाक्यरचना और क्रिया थोपी जाती है तो उस भाषा का वही हाल होता है जो हमने गंगा-यमुना के बहते हुए नीर का कर रखा है। इस मामले में भाषा की तुलना नदी के साथ उचित ही की गई है।

दूसरी बात अँग्रेजी के सामने हीन भावना की है। अँग्रेजी की इस भूमिका को समझ लेना इसलिए जरूरी है कि यह हमारी भाषा के प्रदूषण का लगभग एकमात्र स्रोत है। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। अँग्रेजी में पीने के लिए क्रिया "ड्रिंक" है, लेकिन सिगरेट का सुट्टा लगाने को वे "स्मोक करना" कहते हैं, जबकि हिंदी में इसे भी "पीना" ही कहते हैं। अब अगर अँग्रेजी के वाक्य में हिंदी की क्रिया का प्रयोग कर दें तो वाक्य बनेगा "आई ड्रिंक सिगरेट"। जब कभी मैं सामान्य पढ़े-लिखे हिंदीभाषी लोगों के बीच इस वाक्य का जिक्र करता हूँ, उन्हें हँसी आ जाती है, जबकि अपनी भाषा में "पीने-लेने" के प्रसंग में इसी तरह की गलती करते हुए वे पूरी तरह सहज रहते हैं। इससे यह पता नहीं चलता कि हमारे लोग हिंदी से ज्यादा अच्छी तरह अँग्रेजी को जानते- बरतते हैं। इससे सिर्फ यह पता चलता है कि अँग्रेजी की श्रेष्ठता और हिंदी की हीनता का भाव हमारे अवचेतन में घर कर चुका है। इसीलिए अँग्रेजी के वाक्य में हिंदी की क्रिया को घुसपैठ करते देखकर हम उसके दुस्साहस पर हँस पड़ते हैं। जबकि विदेशी भाषा होने के कारण अँग्रेजी के साथ यह बर्ताव व्याकरणिक रूप से गलत होने पर भी अधिक मानवीय और स्वाभाविक है। किसी ने कहा है कि अपनी भाषा में सामने आई क्रिया की गलती मुँह के कौर में आए बाल की तरह होती है जिसका एहसास हुए बिना नहीं रहता और जिसे नजरंदाज करना बिलकुल नामुमकिन होता है। यह हमारी रग-रग में बसी गुलामी का ही असर होगा कि हम अँग्रेजी के मामले में तो इस किस्म की संवेदनशीलता दिखाते हैं, लेकिन हिंदी के मामले में उदासीन बने रहते हैं।

इस उदासीनता को देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं। हम अपने आसपास गौर करें तो पाते हैं कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर कहीं कोई बहस दिखाई नहीं पड़ती। "अनस्थिरता" शब्द को लेकर महावीरप्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त के बीच हुए लगभग सौ साल पुराने विवाद की चर्चा हम ऐसे करते हैं जैसे वे किसी और ग्रह से आए लोग थे जो ऐसी "मामूली" बातों पर अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर लगा देते थे। आजादी के पहले तो फिर भी कुछ जवाब-सवाल होते थे, लेकिन उसके बाद ये तौर-तरीके शायद संदिग्ध मान लिए गए। इधर पिछले तीन दशक के बारे में तो मैं खुद एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में कह सकता हूँ कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर न कोई किसी को रोकता-टोकता है, न कोई किसी की बात काटता है। यह सब गैरजिम्मेदाराना अशिष्टाचार माना जाता है। एक-डेढ़ दशक पहले तक अभिनव ओझा नाम के एक जागरूक पाठक की चिट्ठियाँ पत्र-पत्रिकाओं में दिखती थीं, जिनमें प्रकाशित रचनाओं में हुई भूलों की चर्चा होती थी। ऐसी कोशिशें भी हमारी उदासीनता की भेंट चढ़ गईं। ऐसा तब हुआ जबकि हिंदी में कम से कम एक अदद शिखरपुरुष, एक अदद कविकुलभूषण, एक अदद रसिक कलावंत, एक अदद दुर्वासा और लगभग एक दर्जन जनपक्षधर आलोचक सक्रिय हैं। इनके होने के बावजूद हिंदी में वैचारिक बहसों का स्तर ननद-भौजाई की हँसी-ठिठोली जैसा रह गया है। सामाजिक हलचलों और उथल-पुथल ने हमारे साहित्य को लोकतांत्रिक दिशा जरूर दी, लेकिन हमारी साहित्यिक संस्कृति ने उसका मार्ग प्रशस्त नहीं किया, उसकी राह में रोड़े ही अटकाए।

गौरतलब है कि हम अपने वाक्यों में केवल क्रिया को नहीं बदलते बल्कि उसका काल और उसकी संभाव्यता को भी बदलकर अपने वाक्यों को पूरी तरह भोथरा कर लेते हैं। एक सर्वव्यापी उदाहरण लें। किसी भी उच्चस्तरीय साहित्यिक सभा-संगोष्ठी में बड़ी आसानी से संचालक को कहते हुए सुना जा सकता है - "अब मैं बुलाना चाहूँगा अलाँ साहब को जिन्होंने फलाँ क्षेत्र में चिलाँ तीर चलाए हैं"। न बुलाता हूँ, न बुलाना चाहता हूँ, बल्कि "आई उड लाइक टु काल यू" की तर्ज पर भविष्य में कभी ऐसा करने की इच्छा की घोषणा। सचमुच बुला लूँगा ऐसा कोई वादा भी नहीं। लेकिन "खग जानै खगही की भाषा" को चरितार्थ करते हुए वक्ता महोदय माइक पर नमूदार होते हैं और फरमाते हैं -"मैं फलाँ साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जिन्होंने मेरी इतनी तारीफ की"। इस तरह हिंदी का कारोबार भविष्य की अनिश्चित संभावना के रूप में चल रहा है, अथवा स्थगित है। हिंदी जैसी बाँकी, क्षिप्र और असरदार भाषा का दम ऐसे बोझिल और जड़ प्रयोगों से घुटता है।

एक उदाहरण और देखते चलें। हिंदी में भोजपुरी के प्रभाव से परसर्ग "ने" के विलोप पर तो कभी-कभी असहमति का अनौपचारिक इजहार हो जाता है। यानी, मैंने कहा, मैंने खाया, मैंने गाया जैसे वाक्यों की जगह हम कहे, हम खाए, हम गाए जैसे वाक्यों को खासतौर पर विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता क्योंकि इससे नौकरी के इंटरव्यू आदि में उनकी ग्रामीण जड़ों की पोल खुल सकती है। लेकिन निष्क्रियता की खुली वकालत करने वाले अँग्रेजी के "पैसिव वॉइस" के दबाव में हिंदी के वाक्यों के सौंदर्य के मटियामेट होने पर मैंने किसी विद्वान को ध्यान देते नहीं देखा। हिंदी में कहते हैं कि "आपने जो किया वह मैंने देखा"। लेकिन आजकल की हिंदी में इसे कुछ यूँ कहते हैं, "आपके द्वारा किए गए कार्य को मैंने देखा"। आई सा द वर्क डन बाय यू।

कहने का आशय यह कि इंग्लैंड जैसे छोटे से द्वीप की अपनी भौगोलिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित भाषा के प्रयोग अगर भारतीय उपमहाद्वीप के विस्तृत भूभाग में जन्मी और पली-बढ़ी भाषा पर वर्चस्व स्थापित कर लेंगे तो यह किस कदर विनाशकारी होगा इसकी कल्पना भी आसानी से नहीं की जा सकती। इसे समझने के लिए हमें अपनी नदियों और उनमें गिरने वाले नालों को देखना होगा।

अंत में, हिंदी के स्वभाव की गतिशीलता और अँग्रेजी से इसके फर्क को समझने के लिए एक उदाहरण और देख लेते हैं। हिंदी में जब हम अतीत की किसी घटना का ब्यौरा देते हैं तो इसकी सूचना के साथ ही हम खुद उस काल में पहुँच जाते हैं और वह घटना हमारे लिए वर्तमान काल की हो जाती है। मिसाल के तौर पर अगर हम किसी दोस्त के घर उससे मिलने गए और उसे सोता हुआ पाकर वापस आ गए तो, अगले दिन इसका ब्यौरा कुछ यूँ देंगे - "कल मैं उसके घर गया और मैंने देखा कि वह सो रहा है"। अँग्रेजी में इस वाक्य का प्रासंगिक अंश कुछ यूँ बनेगा - "आई सॉ दैट ही वाज स्लीपिंग"। आजकल हिंदी में लगभग निरपवाद रूप से अँग्रेजी वाला ही प्रयोग चल रहा है, यानी "मैंने देखा कि वह सो रहा था"। इस तरह हम हिंदी की जीवंतता और सक्रियता पर अँग्रेजी की निष्क्रियता और अनिश्चितता को थोपकर उसके स्वाभाविक प्रवाह को रोक देते हैं।


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